रामनगर रामलीला का नेपथ्य

रामनगर की रामलीला मात्र रामलीला न होकर एक महाआयोजन है और किसी भी आयोजन में अलग-अलग लोगों की महत्वपूर्ण भूमिकाएं होती हैं। रामनगर की रामलीला में भी व्यास, पात्र के अलावा कुछ ऐसे भी लोग हैं जो रामलीला की परम्परा और भव्यता को बनाये हुए हैं। रामलीला की विश्व प्रसिद्धि के पीछे एक बड़ा कारण है 200 से भी अधिक वर्षों से रामलीला को यथावत बरकरार रखना। मशाल की रोशनी में रामायण पाठ, पंचलाइट की रोशनी में लीला, आरती के समय लाल और सफेद महताबी में प्रभु का दर्शन करने का आनन्द लीला प्र्रेमियों को सहज ही आकर्षित करता है। इन सभी भूमिकाओं का निर्वहन भी परम्परागत रूप से चला आ रहा है और वंशानुगत रूप से इस कार्य को किया जा रहा है। रामलीला में एक तरह से नेपथ्य में भूमिका निभाने वालों में मुख्य रूप से हैं मशालची, महताबी और पुतला बनाने वाले, तोपची और पालकी ढोने वाले। रामलीला के सम्बन्ध में लिखते समय इनका उल्लेख न करना उसी प्रकार है जैसे बिना महताबी के आरती देखना। प्रस्तुत है रामलीला से जुड़े इन महत्वपूर्ण पक्षों का

संक्षिप्त परिचय

मशाल एवं मशालची- रामनगर की रामलीला में मशाल की रोशनी में ही रामलीला सम्पन्न करायी जाती है। निश्चित रूप से रामनगर की रामलीला जब शुरू हुई होगी तो उस समय आज की तरह विद्युत व्यवस्था नहीं रही होगी और मशाल से ही लीला सम्पन्न होती रही होगी। आज भी वही परम्परा विद्यमान है। यह भी रामनगर की रामलीला को विश्व प्रसिद्ध बनने में एक बड़ा कारण है। रामलीला के दौरान कुल चार मशालों का प्रयोग होता है। जिनमें 2 मशाल रामायणी दल के लिए तथा दो मशाल पात्रों के पास जलते रहते हैं। मशाल जलाने व बनाने के लिए मशालची का काम रामनगर के ही राधेश्याम प्रजापति द्वारा किया जा रहा है। इस सम्बन्ध में पूछे जाने पर राधेश्याम प्रजापति ने बताया, ‘‘जब से रामलीला का प्रारम्भ हुआ है तब से यह कार्य हमारे परिवार द्वारा किया जा रहा है। वर्तमान में राधेश्याम प्रजापति (स्वयं), श्याम सुन्दर प्रजापति (भाई), रवि प्रकाश प्रजापति (पुत्र) तथा सुनील प्रजापति इस कार्य को कर रहे हैं।’’ वंशानुक्रम के सम्बन्ध में राधेश्याम प्रजापति ने बताया कि इनके पूर्व यह कार्य उनके पिता स्व0 बिहारी लाल प्रजापति, उनसे पूर्व दादा केदार प्रजापति तथा उनके पूर्व नजदू प्रजापति द्वारा किया जाता रहा है। मशालची की वेशभूषा पर उन्होंने बताया कि इनके लिए साफा अनिवार्य है।  यह मशाल इस परिवार को रामलीला से पूर्व दिया जाता है। शेष  समय रामनगर किले में सुरक्षित रहता है। मशाल बनाने व सामग्री के सम्बन्ध में राधेश्याम प्रजापति ने बताया कि मशाल पीतल का होता है जिसके ऊपरी सिरे को पुराने सूती कपड़े व बीच में बांस की पतली फरहटी लगाकर तैयार करते है जिसे तिसी के तेल द्वारा जलाया जाता है।

पारिश्रमिक  और वर्तमान समय में रोजगार की दौड़ भरी जिन्दगी के सम्बन्ध में पूछने पर इनका कहना था कि रामजी की सेवा में जो मिल जाता है वह  बहुत है। यह प्रभु का कार्य है और यह परम्परा हमारा परिवार निभा रहा है यही हमारा सौभाग्य है।

महताबी एवं पुतला- रामनगर की रामलीला का मुख्य आकर्षण है वहां प्रतिदिन होने वाली आरती। आरती के समय लाल और सफेद महताबी की जगमग करते ही समूचा जनसमूह ‘‘बोल दे राजा रामचन्द्र जी की जय’’ और ‘‘हर-हर महादेव’’ के उद्घोष से गूंज उठता है। कई लीला प्रेमी जो दूरी की वजह से दर्शन नहीं कर पाते या आरती के समय आगे नहीं पहुंच पाते वह महताबी के रोशनी से ही श्रीराम के दर्शन को सफल मान लेते हैं।

रामनगर की रामलीला में पुतलों का भी मुख्य आकर्षण है, जिनमें रावण, मेघनाद, कुम्भकरण, सुरसा, ताड़का, खरदूषण और शेषनाग के पुतले प्रमुख हैं। इनके अलावा हंस, गाय, चूहा, जटायू के पुतले भी बनते हैं। रामलीला के महताबी एवं पुतलों से सम्बन्धित कामों को भी परम्परागत ढंग से वर्तमान दौर में भी निभाया जा रहा है। इस कार्य को मौजूदा समय में राजू खान द्वारा किया जा रहा है। परिवार से ही जुड़े सदस्य मोहम्मद सिराज ने इस कार्य के सम्बन्ध में बताया कि लगभग रामलीला के प्रारम्भ से ही उनके खानदान द्वारा महताबी, पटाखा और पुतले का काम किया जा रहा है। राजू खान के पहले यह ठेका हाजी अली हुसैन को मिला था। राजू खान के सहयोगियों में इस समय जमील खान, फिरोज खान, आबादी खान, हलीम खान, मुन्ना खान, शेरू खान, सैफुद्दीन खान, लालू खान, गोलू खान, बच्चा खान, शकील खान, कालिया प्रमुख हैं। मुहम्मद शिराज ने बताया कि रामलीला में आरती के समय प्रतिदिन छोड़े जाने वाले लाल एवं सफेद महताबी का निर्माण इनके द्वारा होता है। इसके अलावा रामबाण (तीर के रूप में छोड़े जाने वाले पटाखे) विजयादशमी के दिन छूटने वाले पटाखे बनते हैं। इसके अलावा रामलीला के सभी पुतले, आत्मा के रूप में छोड़े जाने वाले ‘पैराशूट’ इत्यादि बनते हैं।

पुतला निर्माण- शिराज ने बताया कि इन पुतलों के निर्माण में बांस, कागज, तांत (बगरदंत) लेई इत्यादि का प्रयोग होता है। जिसमें 2 कंुतल कागज, 300 बांस, 2.5 बोरा मैदा खर्च हो जाता है। इसके निर्माण में पहले ढरकार बांस को छीलकर सांचा तैयार करते हैं। जिन्हें तांत की सहायता से बांधकर कागज चिपकाकर और रंगकर पुतलों को तैयार किया जाता है। पारिश्रमिक और फायदे के सम्बन्ध में पूछने पर बताया कि इस कार्य में नफा तो नहीं होता लेकिन यह परम्परागत रूप से चला आ रहा है और इसे आगे भी निभाते रहना है। वर्तमान में आरती के समय महताबी जलाने के लिए जमील खान प्रतिदिन लीला में रहते हैं।

रामनगर की रामलीला में मुस्लिम परिवारों द्वारा भी सहभागिता की जाती है जो कि साम्प्रदायिक सौहाद्र्र का बेहतरीन मिसाल है। पुतला, महताबी, पटाखा के कार्यों को मुस्लिम परिवार द्वारा किया जाता है। इसके अलावा एक दिन रामलीला में मुस्लिम युवकों द्वारा लंका मैदान पर रणभूमि में शस्त्र प्रदर्शन भी किया जाता है। जिसमें बाना पाटा, तलवारबाजी एवं लठबाजी का प्रदर्शन होता है। यह परम्परा गोलाघाट स्थित उन मुस्लिम परिवारों द्वारा निभायी जाती है जो मुहर्रम के दौरान महाराज का ताजिया बिठाते हैं।

तोप एवं तोपची- काशी में होने वाली रामलीलाओं में एकमात्र रामनगर की रामलीला है जहाँ कई लीलाओं के समय तोप से सलामी दी जाती है। जहां लीला में पात्र अपनी भूमिका को जीते है वहीं पाश्र्व रूप में कई लोग अपने दायित्व के निर्वहन को लेकर प्रतिबद्ध रहते हैं। तोपची का कार्य करने वाले जंग बहादुर सिंह बताते हैं कि वह लगभग 36 वर्ष से यह कार्य कर रहे हैं। इनके पूर्व उनके पिता केदार सिंह और दादा महादेव सिंह भी यह कार्य करते थे। धनुष यज्ञ, नक्कटैया व लक्ष्मण शक्ति लीला में तोप छोड़ा जाता है। पहले दशहरा पर भी 21 तोपों की सलामी होती थी। लेकिन एक दुर्घटना हो जाने के बाद यह बन्द हो गया। तोप छोड़ने के लिये दो तोपों में बारूद भरकर तैयार किया जाता है लेकिन केवल एक को छोड़ा जाता है। बारूद काशीराज दुर्ग की ओर से उपलब्ध कराया जाता है।

जंगबहादुर ने बताया कि विजय कुमार बघेल, छैबर कुमार सिंह, जितेन्द्र सिंह, मनराज बघेल उनके सहयोगी के रूप में कार्य करते हैं। तोप छोड़ने का समय भी सटीक होता है। सहयोगी द्वारा ऊँचे स्थान से ध्वज दिखाये जाने पर ही तोप के बारूद में आग लगायी जाती है। उन्होंने कहा कि जब बारूद को भरते है तो बहुत डर लगता है इस कार्य के लिये कितना पारिश्रमिक मिलना चाहिये यह बताया नहीं जा सकता। यह अमूल्य है। बस परम्परा को निभाया जा रहा है।

तोप से सम्बन्धित कार्य करने वाले सभी लोग काशीराज दुर्ग के स्थायी कर्मचारी होते हैं। तोप छोड़ने के अतिरिक्त वे दुर्ग में चैकीदारी का कार्य भी करते हैं।

पालकी- रामनगर की रामलीला के दौरान पात्रों को एक स्थान से दूसरे स्थान या लीला स्थल तक लाने के लिये पालकी का प्रयोग किया जाता है। पालकी से लाने वाले मजदूरों में से एक हैं पंचवटी के सुख्खू। 31 वर्षीय सुख्खु बताते हैं कि उनका पूरा परिवार (लगभग 20 लोग) पूरी रामलीला के दौरान पालकी उठाते हैं। यह तीसरी पीढ़ी है। उनके पिता (केरा, 63 वर्ष) व दादा भी यह कार्य करते थे। इस दौरान उनको पोशाकें काशी राज दुर्ग की तरफ से उपलब्ध करायी जाती हैं। पालकी सरायनाका के रहमान से किराये पर लिया जाता है। मेहनताना के प्रश्न पर उन्होंने बताया कि प्रभु का कार्य है, सेवा भाव से करते हैं, जो भी पारिश्रमिक मिले उसे स्वीकार करते हैं।

नाव- रामनगर की रामलीला में भगवान राम को गंगाजी, यमुनाजी पार कराने व भगवान विष्णुु के क्षीरसागर की आरती के समय नाव की आवश्यकता होती है। इस नाव की सेवा को पिछले 10 वर्षों से बबलू साहनी करते हैं। आपके साथी के रूप में आपके बड़े भाई सोपाल साहनी और सुख्खु साहनी आप का साथ देते हैं। आप रामलीला के प्रथम दिन से पहले ही अपना नाव रामबाग पोखरा पर ला देते हैं, जिसे शेषनाग के रूप में सजाया जाता है और पहले दिन की आरती इसी नाव पर होती है। इसके बाद राम वन गमन के समय एक नाव गंगा जी में जो प्रतीक रूप में सगरा पोखरा पर होता है और दूसरी यमुना जी में (रामबाग के पीछे) होती है। इसके बाद यह भरत जी के आगमन पर भी इसी प्रकार की सेवा करते हैं। मेहनताना के प्रश्न पर कहते हैं कि ‘‘जो भी कुछ आज हमारे पास है वह सब राम जी की सेवा का ही फल है।’’

नृत्य कलाकार

रामलीला में रामजन्मोत्सव व राम जी की विवाह पर नृत्य करने के लिए ग्राम सुल्तानपुर की मुन्नी देवी को बुलाया जाता है। इनके पति का नाम विजय कुमार है। ये रामलीला में ढोलक बजाते हैं। रामलीला में मुन्नी देवी ही एक ऐसी महिला हैं जो कार्य करती हैं, नहीं तो बाकी सारे कार्य पुरुष वर्ग ही करते हैं। इन लोगों के साथ हारमोनियम संगत राधेश्याम करते हैं। ये आकाशवाणी में अंशकालिक रूप में काम करते हैं। मुन्नी देवी को रामलीला में काम करते हुए लगभग 25 साल हो गए हैं। इनके पहले उर्मिलाबाई जो कि रामनगर रामपुर में स्वामी जी की कुटिया के पास की रहने वाली थीं, कार्य करती थीं।

रामलीला में मुन्नी देवी की विशेष श्रद्धा है। उनका कहना है कि भगवान के जन्म के समय एवं उनके शादी के समय मुझे नृत्य करने का सौभाग्य प्राप्त होता है, इससे बढ़कर मेरे लिए और क्या हो सकता है।

दैनिक आरती हेतु पुष्प व गजरा – (श्री नारायण झा)

रामनगर की रामलीला में प्रतिदिन की आरती में प्रयोग होने वाले माला (गजरा) को उपलब्ध कराने का दायित्व श्री नारायण झा वर्षों से निभाते आ रहे हैं । आप बाला त्रिपुर सुन्दरी मन्दिर, रतनबाग के पुजारी हैं । नेपथ्य में वर्षों से अपनी भूमिका निभाने वाले झा जी बताते हैं कि ‘‘रामलीला से हमारे परिवार का जुड़ाव परम्परागत् रुप से है। महाराज श्री विभूतिनारायण सिंह जी  के समय पिता स्व0 श्री चक्रधर झा एक वर्ष के लिए हनुमान की भूमिका भी निभाए थे। पिताजी कभी वस्त्र नही पहनते थे, जिसके कारण हनुमान की भूमिका को छोड़ना पड़ा। रामलीला के पंच स्वरुपों के माला बनाने का कार्य पिछले 25 वर्षों से मेरे द्वारा ही किया जा रहा है। पूर्व में वाराणसी के केदार मारवाड़ी पंच स्वरुपों को माला देते थे।’’

श्री नारायण झा दैनिक आरती में प्रयोग होने वाले मालाओं के निर्माण व तैयारी के सन्दर्भ में आगे बताते हैं कि – ‘‘रामनगर की रामलीला में पंच स्वरुपों के कुल मालाओं की संख्या 108 या 111 तक हो जाती है। तिथि में परिवर्तन के कारण यह विभेद आता है। यह माला चांदनी या टेंगरी के फूल द्वारा बनाया जाता है। एक माला बनाने में मुझे दो घण्टे लगते हैं और किसी अन्य सदस्य को तीन से चार घण्टे का समय लगता है। करीब डेढ़ लाख से अधिक फूलों द्वारा एक माला तैयार होता है। मालों में सफेद रंग के फूलों एवं तुलसी के पत्तों का प्रयोग होता है। सिर्फ भोर की आरती में राम और सीता जी की मालाओं में हल्का बदलाव किया जाता है, जिसकी वजह से वो हल्के गुलाबी रंग के दिखायी पड़ते हैं। दोनों स्वरुपों के मालाओं में लाल रंग के फूलों का प्रयोग किया जाता है। साथ ही भोर की आरती में फूलों से बने जो कुण्डल पहनाए जाते हैं वह भी मेरे द्वारा ही तैयार किया जाता है।’’

काशी नरेश के यहां हम दस पीढ़ी से हैं। पूर्व में हम माला नही बनाते थे। महाराज विभूति नारायण सिंह जी के कहने पर और श्रीराम कार्य होने की वजह से इस कार्य को स्वीकार किया  और यथाशक्ति इसका निर्वहन करते रहेंगे।’’

रमेश पाठक- रामलीला के दौरान पंचस्वरूपों को लगभग 3 माह तक बलुआ घाट स्थित धर्मशाला में प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रारम्भ में इन स्वरूपों के प्रशिक्षण के दौरान शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में आने वाले व्यवधान पर ध्यान नहीं दिया जाता था, परन्तु आधुनिक शैक्षणिक परिवेश में ज्यादातर स्वरूप आधुनिक शिक्षा माध्यम से शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। स्वरूप बने बालकों के अभिभावकों द्वारा बालकों के पढ़ाई छूटने और व्यवधान के सम्बन्ध में आपत्ति करने पर किले की तरफ से इन स्वरूपों के लिए एक शिक्षक की व्यवस्था की जाती है। जिसे पिछले 10 वर्षों से रामपुर, रामनगर निवासी श्री रमेश पाठक निभा रहे हैं। इस सम्बन्ध में बताते हैं कि-‘‘स्वरुपों को पढ़ाने में बहुत ही गर्व का अनुभव होता है। उस समय भी मैं इनको स्वरूपों के रूप में देखता हूं और इनका गुरु बनने का अवसर मेरे लिए सौभाग्य की बात है। नेमी के रूप मैं 1986 से लगातार रामलीला का दर्शन कर रहा हूं।’’

दयाशंकर प्रजापति- रामनगर की रामलीला में तरह-तरह के रंगे हुए पुतले, मुखौटे रामलीला में प्रयुक्त साजो-सामान जिन पर विशेष प्रकार की कलाकारी व रंगाई हुई रहती है, जो आकर्षण का केन्द्र रहते हैं; इनकी रंगाई एवं कलाकारी के पीछे एक बहुत ही सहज व्यक्तित्व है जो पिछले 40 वर्षों से इस कार्य को कर रहे हैं। 55 साल के दयाशंकर प्रजापति उर्फ ‘सपाटू’ बताते हैं कि-‘‘प्रभु श्रीराम का यह कार्य करने में मुझे सुखद अनुभूति एवं आत्मिक संतोष प्राप्त होता है। श्री रामजी की कृपा से ही मेरा काम धंधा चल रहा है। पारिश्रमिक के नाम पर जो कुछ भी मिलता है सब रामजी का प्रसाद है।’’

रामअधार यादव- सीहाबीर रामनगर के रहने वाले रामअधार यादव पिछले 14 वर्षों से स्वरुपों को ले जाने वाले रथ के वाहक हैं। अपने इस कार्य के बारे में बताते हुए इन्होंने कहा कि- ‘‘पहले 3 वर्ष रामायणी दल के रथ, 3 वर्ष जानकी जी के रथ और पिछले 8 वर्ष से मैं श्री रामजी के रथ को चला रहा हूं। प्रभु श्रीराम के इस कार्य को करने को अपना परम सौभाग्य मानते हुए इसे अपना सबसे बड़ा मेहनताना बताते हैं।

शत्रुघ्न सिंह – यहां रामलीला के उस पक्ष की भी चर्चा करना जरूरी है जिसका संबंध प्रत्यक्ष रूप से तो नहीं लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से जरुर है। रामलीला के दौरान लीलास्थल पर होने वाली साफ-सफाई, रंग-रोगन और मौलिकता प्रदान करना अपने आप में बड़ा कार्य और दायित्व होता है। इस दायित्व को निःस्वार्थ भाव से पूरा करते हैं शत्रुघ्न सिंह। रामभक्ति से ओतप्रोत शत्रुघ्न का मानना है कि लीलास्थल की साफ-सफाई या रंग-रोगन व्यवस्था कोई काम नहीं है बल्कि भगवान राम की सेवा है। कहते हैं कि- ‘‘इस काम को करने में मुझे पारिश्रमिक के रूप में रामभक्ति का प्रसाद मिलता है। शत्रुघ्न के इस सेवाकार्य में चंद्रशेखर शर्मा ‘पप्पू’ पिछले दस वर्षों से सहयोग कर रहे हैं।’’

पंचलाइट– पंचवटी निवासी संजय रामलीला के दौरान लीला स्थल को प्रकाशित करने का काम करते हैं।  प्रतिदिन लगभग पचासों पंचलाइट की प्रकृति से निकटस्थ लगने वाली रोशनी से लीला मंचन न सिर्फ सुलभ होता है अपितु भक्तजनों को भी लीला के दौरान भ्रमण करने में सहायता मिलती है। एक माह की इस वृहद रामलीला के कई प्रसंगों में एक दिन में कई स्थानों पर लीला मंचित होती है, ऐसे में उस दिन सभी स्थानों पर एक साथ कई पंचलाइट एक ही समय में लीला स्थल को दैदीप्यमान करती हैं। इसे प्रबंधन की कुशलता ही कहेंगे कि अपने दो सौ साल पुराने प्राचीनतम स्वरूप को अपरिवर्तित रखते हुये रामनगर की यह रामलीला मंचित हो रही है, जिसे पंचलाइट के प्रयोग ने अक्षुण्ण रखा है, ऐसा कहना अतिशयोक्ति नहीं।

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