रामनगर की रामलीला में पात्र चयन एवं व्यास परम्परा

रामनगर की रामलीला के प्रारम्भ मं दो व्यास की परम्परा नहीं थी। रामलीला के प्रारम्भ में व्यास की गद्दी एक ही थी, दूसरा पद सिंगारिया का होता था। परन्तु श्रीराम पदारथ पाण्डेय, प्रधान व्यास की मृत्यु के पश्चात उनके दो शिष्य पंडित राजाराम सिंगारिया और विन्ध्येश्वरी मिश्र उर्फ गज्जू प्रधान व्यास हुए। तभी से रामलीला में दो व्यास की परम्परा बनी। इस परम्परा में श्री चन्द्र दत्त शर्मा इनके पुत्र काशी दत्त शर्मा इनके पुत्र श्री पुरूषोत्तम दत्त शर्मा और धर्मदत्त शर्मा तथा अब रघुनाथ दत्त शर्मा कार्यरत हैं। साथ ही रघुनाथ दत्त की सहायता के लिए उनके पुत्र श्री शिवदत्त भी सहायक की भूमिका में रहते हैं। यह गुजराती औदिच्य ब्राह्मण परिवार बड़ौदा से वाराणसी और वाराणसी से आकर रामनगर में बसे। गुजराती औदिच्य बाह्मण परिवार के रघुनाथ दत्त व्यास बनने से पहले रामनगर की रामलीला में राम, लक्ष्मण, शत्रुध्न की भूमिका का भी 9 साल तक की उम्र तक निर्वहन किया। सन् 1955 से रघुनाथ दत्त पंच स्वरूपों के व्यास की भूमिका में है।

पंच स्वरूपों का चयन एवं प्रशिक्षण– रामनगर की रामलीला के सभी पात्र ब्राह्मण होते हैं। केवल रावण की सेना में अन्य जातियों के छोटे-छोटे बच्चों को शामिल किया जाता है। मुख्य स्वरूपों का हर साल क्रमानुसार परिवर्तन भी किया जाता है। पांच स्वरूपों (राम, सीता, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न) के चुनाव में सर्वप्रथम वरीयता उनके बाल सुलभ आवाज को दी जाती है। साथ ही उनकी कमनीयता, रंग रूप का भी ध्यान रखा जाता है। पंच स्वरुपों के चयन का उपक्रम रथयात्रा के बाद पड़ने वाले रविवार से प्रारम्भ हो जाता है।

पंच स्वरूपों की स्वर परीक्षा रामनगर किले में महाराज के सम्मुख रामलीला के अधिकारी और व्यास की उपस्थिति में होती है। प्रत्येक उपस्थित बालक से संस्कृत के श्लोक का सस्वर पाठ कराया जाता है। चयन की यह प्रक्रिया दो चरणों में पूरी होती है। अंतिम चरण के पांच नामों पर महाराज द्वारा स्वीकृति प्रदान की जाती है। साथ ही इन बालकों का उपनयन संस्कार होना भी अति आवश्यक है। प्रथम गणेश पूजन के साथ ही इन पात्रों का प्रशिक्षण बलुआ घाट स्थित धर्मशाला में प्रारम्भ हो जाता है। पहले प्रशिक्षण अवधि के दौरान इनके परिवार का कोई सदस्य साथ नहीं रह सकता था, लेकिन वर्तमान में यह बाध्यता हटा दी गई। प्रशिक्षण अवधि के दौरान बालकों को पूरी तरह सात्विक रहना पड़ता है तथा खान-पान पर पूर्ण नियंत्रण रखा जाता है। प्रशिक्षण के दौरान व्यास द्वारा इनको संवाद शैली, हाव-भाव, हाथ पैर का संवाद के अनुरूप संचालन सिखाया जाता है। पात्रों में प्रशिक्षण काल से ही रामादि की भावना और गौरव का प्रारम्भ हो जाता है।

पंच स्वरुपों को उनके नाम यथा राम, सीता, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न ही पुकारा जाता है। पात्रों में परस्पर वैसा ही व्यवहार भी प्रारम्भ हो जाता है जैसे श्रीराम के उठ खड़े होने पर अन्य सभी पात्र भी उठ खड़े होते हैं और संवाद समाप्त होने या श्रीराम के बैठने पर सभी शेष पात्र वरिष्ठता के अनुसार श्रीराम को प्रणाम कर ही बैठते हैं। रामलीला के दौरान अनुशासन यथा, राम जी के खड़े होने पर सभी पात्रों का खड़ा हो जाना, जहां कही भी भोजन करने का प्रसंग आये ‘आपोसान’ करके खाना, किस पदार्थ का भोग हाथ से खाना है, किसे चम्मच से; इन बातों का प्रशिक्षण दिया जाता है। आरती के दौरान स्वरूपों का मूर्ति के रूप में भाव व्यक्त करने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है।

स्वरूपों को प्रतिदिन संवाद याद करके व्यास जी को सुनाना पड़ता है। पिछले लगभग 20-25 सालों से पात्रों को 2 घंटे के लिए किले में भी संवाद के प्रशिक्षण के लिए ले जाया जाता है, जहां महाराज स्वयं स्वरूपों के संवाद प्रशिक्षण का निरीक्षण करते हैं। इन बालकों की भूमिकाओं में परिवर्तन होता रहता है और नये बालक भी चुने जाते हैं।

भरत बना पात्र अगले वर्ष राम की भूमिका निभा सकता है। शत्रुध्न भरत का पात्र निभा सकते हैं लेकिन राम की भूमिका निभा चुका पात्र लक्ष्मण आदि की भूमिका नहीं निभा सकता। बशर्ते वह राम की पात्रता पर खरा पाये जाने पर अगले वर्ष पुनः राम बनाया जा सकता है।

पंच स्वरुपों के अतिरिक्त पात्रों का प्रशिक्षण व व्यासः

रामनगर की रामलीला में पंचस्वरुपों को छोड़कर शेष समस्त पात्रों के व्यास श्री लक्ष्मी नारायण पाण्डेय हैं। इनके पूर्व इस व्यास परम्परा में क्रमशः स्व0 राम पदारथ पाण्डेय, रामजी सिंगारिया, अनिरुद्ध पाण्डेय थे।

व्यास श्री लक्ष्मी नारायण पाण्डेय अन्य पात्रों को संवाद सम्प्रेषण में सहायता देते हैं। इनके द्वारा ही रामलीला के विविध पात्रों यथा- अष्ट सखी संवाद के लिए अष्ट सखी, विवाह के लिए पात्र तथा अन्य सभी प्रमुख पात्रों को संवाद प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके लिए पात्रों का चयन व प्रशिक्षण व्यास जी द्वारा रामलीला के एक माह पूर्व ही कर लिया जाता है। रामलीला के दौरान लक्ष्मी नारायण पाण्डेय के हाथ में ही सभी पात्रों के संवाद सहित मानस की पोथी होती है और यही रामायणी दल को रामायण शुरू करने का संकेत देते है। साथ ही ‘‘चुप रहो! सावधान!’’ की आवाज के साथ लीला प्रेमियों को संवाद से पूर्व सचेत भी करते हंै।

रामलीला में पंचस्वरूपों के अलावा अन्य सहायक पात्र वंश परम्परा से ही इस भूमिका को निभा रहे है। इन पात्रों में से किसी का भी अभिनय आदि में अन्यथा व अन्यत्र रुचि न होने के बावजूद अपनी भूमिका को निभाना निःसंदेह ही भगवतकृपा का ही प्रमाण माना जा सकता है। पात्रों में कोई सरकारी नौकरी करता है तो कोई राजनीति,  कोई वैवाहिक कर्मकाण्ड कराकर जीवन यापन करता है तो कोई कृषि जैसे निषाद राज की भूमिका निभाने वाले श्री बाल किशुन दीक्षित जूनियर हाईस्कूल डढ़िया, राजगढ़ में प्रधानाध्यापक हैं, तो वही हनुमान बनने वाले पुलिस विभाग में कांस्टेबल के पद पर हैं, जामवन्त बनने वाले रमेश पाण्डेय नगर पालिका सभासद रह चुके हैं और राजनीतिक कार्यकर्ता भी हैं। वहीं बरसों तक हनुमान बनने के बाद वर्तमान में बाल्मीकि व भारद्वाज की भूमिका निभाने वाले रामनारायण पाण्डेय ज्योतिष व कर्मकाण्ड में निष्णात हैं।

पात्रों में रामलीला में अपने निभाये जाने वाले चरित्र के प्रति भी बहुत लगाव है। जैसे- राजा दशरथ की भूमिका निभाने वाले सुधीर उपाध्याय रामलीला शुरू होने के दो माह पूर्व से दाढ़ी रखना शुरू कर देते हैं। रामलीला भर सिर्फ राजा की भूमिका निभाने वालों को छोड़ कोई भी पात्र रामलीला में जूता-चप्पल धारण नहीं करता है। प्रस्तुत है रामलीला के कुछ प्रमुख पात्रों का परिचय-

दशरथ– दशरथ की भूमिका श्री सुधीर उपाध्याय निभाते हैं। इनको दशरथ की भूमिका विरासत में मिली है। इनके पिता स्व0 जय मूरत उपाध्याय ने दशरथ की भूमिका लगभग 37 वर्षों तक निभायी। दादा स्व0 रमाशंकर उपाध्याय भी रामलीला में दशरथ की भूमिका निभाते थे। अपनी भूमिका की तैयारी के सम्बन्ध में इन्होंने बताया कि इनके पिता दशरथ की भूमिका के लिए वास्तविक दाढ़ी बढ़ाते थे और इस कारण वह रामलीला में काफी प्रसिद्ध भी थे। पिता की इस विरासत को बनाये रखने के लिए सुधीर भी तीन महीने पहले दाढ़ी बढ़ाना शुरू कर देते हैं। युवावस्था में ही इस तरह की भूमिका को निभाने के प्रश्न पर कहा कि ‘‘अभी भी लोग मेरे घर का पता दशरथ जी के नाम से ही पूछते हैं और हमें उसके लिए सम्मान भी मिलता है। अपने इस सम्मान और परिवार की परम्परा को निभाने के लिए ही मैं भी दशरथ बनता हूँ।’’ कोप भवन की लीला को अपने पसंदीदा लीला में से एक बताते हुए इन्होंने कहा कि जब पहली बार मैंने संवाद बोला था तो लगा कि पिताजी ही अन्दर से बोल रहे हैं। संवाद के दौरान श्रीराम वियोग में आंसू स्वाभाविक रूप से आ जाते हैं। पहली बार राज सिंहासन का पैर छूकर उस पर बैठना रोमांचित कर देने वाला क्षण था।

राजा जनकवर्तमान में यह भूमिका विजय नारायण पाण्डेय द्वारा निभाई जा रही है जो पिछले कई वर्षों से इस भूमिका में हैं इसके पूर्व यह भगवान शंकर की भूमिका निभा चुके हैं, रामलीला में आवश्यकतानुसार अन्य कई भूमिकाएँ आप सहजता पूर्वक अदा कर लेते हैं । आप से पहले आप के पिता श्री हरिनारायण पाण्डेय बनते थे। इनसे पहले आप के दादा जी लक्ष्मण पाण्डेय जी जनक की भूमिका का निर्वहन करते थे। आप राम जन्म की लीला में बाल राम, पुरबालक, देवता, कौशल्या, पुरवासी आदि बन चुके हैं। लीला में पहले दिन की आकाशवाणी आप ही के द्वारा सम्पन्न होती है। आप अपनी सबसे यादगार लीला को बताते हैं कि आप को लीला में एक वर्ष अंगद का अभिनय करना पड़ा वह अभिनय इतना सुन्दर हुआ कि उससे प्रभावित हो कर महाराजा बनारस ड़ाॅ0 विभूति नारायण सिंह ने उन्हें 51रू का पुरस्कार दिया।

हनुमान- रामनगर की रामलीला मे इस चरित्र का निर्वाह बिहार पुलिस में कांस्टेबल के पोस्ट पर कार्यरत बृजेश कुमार तिवारी करते हैं। रामलीला से जुड़ाव पर वे बताते हैं कि ‘‘ग्राम-वशोरी पो0- कोरी, जिला-भोजपुर, आरा का रहने वाला हूँ और धर्म से मेरा जुड़ाव बचपन से ही रहा है, जिस कारण मैं काशी अक्सर आता रहता था। उसी दौरान मैं रामजानकी मठ, अस्सी पर महन्त राज कुमार दास से जुड़ा और उनके सान्निध्य में धर्म-कर्म करने लगा और काशी में आना जाना विशेष हो गया और महन्त राज कुमार दास की प्रेरणा से इस लीला में सेवा करने का अवसर मिला।’’ इस चरित्र के निर्वहन के लिए ये हर वर्ष अपने विभाग से एक माह की छुट्टी लेकर आते हैं। आप मैथिल बोलते हैं और यहाँ संवाद अवधी में बोला जाता है, ऐसे में आप को कोई परेशानी नहीं होती तो वे झट से बोलते हैं ‘अजी राम काज में परेशानी काहे की। शुरूआत में थोड़ी समस्या बोलने में होती थी पर वह धीरे धीरे ठीक हो गयी।’ इसके पूर्व इस भूमिका में पंजाबी बाबा (1 वर्ष), पं0 राम नारायण पाण्डेय, दया पाण्डेय, नागा रामलखन दास, पंडित बद्री नाथ, बलिकरन, भगेलू रह चुके हैं।

जामवन्त

यह भूमिका वर्तमान में रमेश पाण्डेय द्वारा निभाई जाती है। जो पिछले 42 साल से इस भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। अब तो पूरे नगर में इनका मूल नाम भूलकर लोग इन्हें ‘जामवन्त गुरु’ के नाम से ही जानते हैं। इनके पूर्व देवेन्द्र पाठक और सीताराम मिश्र जामवन्त बनते थे। रमेश पाण्डेय जी ने बताया कि यह बचपन से ही रामनगर की रामलीला में भूमिकाएं निभा रहे हैं; जिनमें सनकादिक, सखी, पुरवासी, देवता, कौशल्या, मुनि, कोल-भील इत्यादि की भूमिकाएँ रही हैं। जनसेवा के अलावा अपनी आजीविका चलाने के लिए रामायण पाठ, देवी जागरण आदि धार्मिक कार्यों के लिए मण्डली का नेतृत्व करते हैं।

वशिष्ठ– यह भूमिका आजकल रवीन्द्र नाथ उपाध्याय द्वारा निभाई जा रही है जो सन् 1968 से इस भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। इनके पूर्व यह भूमिका इनके पिता स्व0 रामनाथ उपाध्याय निभाते थे तथा उनके पूर्व भोला उपाध्याय यह भूमिका निभाते थे। रविन्द्रनाथ उपाध्याय जी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के सेवा निवृत्त  कर्मचारी हैं।

रामलीला के प्रति लगाव के सम्बन्ध में इन्होंने बताया कि ‘‘श्रीराम का गुरू बनना किसी के लिए भी सौभाग्य की बात है। तमाम व्यस्तताओं के बावजूद भी यही प्रयास रहा है कि जीवन पर्यन्त इस भूमिका में रहूं। इसके पीछे श्रीराम के प्रति प्रेम और श्रद्धा ही प्रेरणा है। ’’

विभीषण- विभीषण की भूमिका वर्तमान में रामजी पाठक निभाते हैं। जो पिछले 7 वर्षों से इस भूमिका में हैं। इसके पूर्व यह भूमिका इनके पिता स्व0 राममूरत पाठक द्वारा निभायी जाती थी। इनके पूर्व हरिराम मिश्र, रामलखन दूबे, लक्ष्मी नारायण पाण्डेय इस भूमिका को निभा चुके हैं। श्री रामजी पाठक ने बताया कि विभीषण के पूर्व वह महिला, पुरबासी, कैकेयी, मंथरा और अन्य कई भूमिकाएं कर चुके हैं। रामनगर की रामलीला में उनके परिवार की तीन पीढ़ियाँ विभिन्न पात्र बन चुकी हैं जिसमें तीसरी पीढ़ी में सबसे छोटे बालक शिवांश पाठक पुरबालक की भूमिका निभाते हैं। रामलीला के प्रति गहरी आस्था व्यक्त करते हुए कहा कि- ‘‘अपने इस पैतृक परम्परा का निर्वहन एक अद्भुत अनुभव है और धर्म के प्रति निष्ठा रामलीला में भूमिका का मूल कारण है। ’’

बाल्मीकि- यह भूमिका वर्तमान में पं0 रामनारायण पाण्डेय निभाते हैं। इसके पूर्व स्व0 अनिरूद्ध पाण्डेय इस भूमिका को निभाते थे। पं0 रामनारायण पाण्डेय पूर्व में रामलीला में 40 वर्षों तक हनुमान की भूमिका को निभा चुके हैं। अपनी भूमिका से सम्बन्धित अनुभव के प्रश्न पर आपने कहा कि-‘‘हनुमान श्री राम का बोध कराते हैं। अगर श्री राम का पराक्रम देखना है तो हनुमान का कर्तव्य देखिये।’’ श्री रामलीला के भाव एवं महात्मय के सम्बन्ध में इन्होंने कहा कि- ‘‘रामलीला; जिसमें दर्शक लीन हो जाये, लय हो जाये, विलय हो जाये उस क्रिया का नाम है।  सारे लोग भक्ति के निमित्त अपने समय और कार्य को अवरुद्ध करकर रामलीला में उपस्थित होते हैं। वे भगवान का दर्शन व भगवान के चरित्र को देखते हैं। देखने के उपरान्त वे जब घर जाते हैं पुनः दूसरे दिन की लीला का चिन्तन करते हैं और समय पर लीला में उपस्थित होकर भगवान का पुनः चरित्र देखते हैं। इस क्रम से 30 या 31 दिन तक वह एक व्रत व अनुष्ठान में दर्शक और लीलामय हो जाते हैं और फिर लीला के विश्राम होने के बाद दूसरे वर्ष का चिंतन करके एक-एक दिन इस चिन्तन में बिताते हैं, कि कब वह दिन आयेगा कि पुनः लीला में उपस्थित हों। यह रामनगर की रामलीला का महात्म्य है।’’

सुग्रीव- वर्तमान में सुग्रीव की भूमिका शिवजी पाठक निभाते हैं जो पिछले 9 साल से इस भूमिका में हैं। इसके साथ ही आप कोल, पुुरवासी, जनक दूत, सेवरी, अन्सुईया ,खरदूत, मारीच, जती, गंवार, गंवारिन का रोल भी करते हैं। शिवजी पाठक रामनगर की रामलीला में चयनित उन एक दो पात्रों में से हैं जो एक साथ दर्जनों भूमिकाएँ निभाते हैं। आवश्यकता पड़ने पर सदैव किसी नये चरित्र की भूमिका निर्वहन करने की चुनौती  सहर्ष स्वीकार करते हैं ।

निषादराज-

लगभग 30 वर्षों से इस भूमिका को श्री बालकिशुन दीक्षित निभा रहे हैं। इस भूमिका में गौरी  शंकर उपाध्याय, पंडित कन्हैया, विजय नारायण पाण्डेय रह चुके हैं। इनके द्वारा वन गमन की रामलीला के दिन बोला गया संवाद और विलाप लीला प्रेमियों के जेहन में वर्षभर रहता है। अपनी इस भूमिका  में

निषादराज द्वारा जिस तरह से संवाद प्रस्तुति की जाती है, वह लीला के प्रति उनके भाव व समर्पण का द्योतक है। आज आप के इस रोल के करने के कारण तथा इसके प्रति आप की आसीम श्रद्धा की वजह से आप के मूल नाम से इतर आप को लोग निखाद राज के नाम से ही पुकारते हैं। उत्कृष्ट शैक्षिक कार्यों हेतु श्री बालकिशुन दीक्षित राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं तथा वर्तमान में जूनियर हाईस्कूल में प्रधानाचार्य के रुप में कार्यरत हैं आप बताते है कि लीलाप्रेमी आप से कहतें हैं कि ‘‘जो माह भर लीला देखनेे में असक्षम है वह भी निखाद राज की लीला प्रसंग को देखने के लिए अवश्य आना चाहता है।’’

अंगद- इस भूमिका को वर्तमान में बैकुण्ठ नाथ उपाध्याय निभाते हैं। पिछले 26 वर्षों से भूमिका निभा रहे हैं, रामलीला से जुड़ाव के संदर्भ में इन्होंने कहा कि ‘‘रामलीला से जुड़े मुझे 65 वर्ष हो गये। दशरथ को छोड़कर मैं लगभग सभी पात्र बन चुका हूँ। हमारे परिवार से ही दशरथ, अंगद, नारद, शंकर, वशिष्ठ बनते रहे हैं। यहाँ की रामलीला में ईश्वर की साक्षात् कृपा है। रामलीला के इस महाअनुष्ठान में जब तक देह में प्राण रहेगा अपनी भूमिका अदा करते रहेंगे ।’’ इस भूमिका को मेरा पुत्र मेरी अश्वस्थ्ता में निभा रहे हैं

भगवान शंकर– वर्तमान में यह भूमिका शांत नारायण पाण्डेय निभाते हैं। इनके पूर्व विजय नारायण पाण्डेय (वर्तमान में जनक की भूमिका) रामसूरत उपाध्याय तथा उनके पूर्व रमाशंकर उपाध्याय निभाते थे।

विश्वामित्र- प्रारम्भ में विश्वामित्र की भूमिका रामहर्ष मिश्र अदा करते थे। उनके बाद ब्रजदत्त, धर्मदत्त और श्याम जी पाठक ने उपरोक्त चरित्र  निर्वाहन  किया। वर्तमान में सदाफल पाण्डेय इस भूमिका को निभाते हैं।

नारद- वर्तमान समय में नारद की भूमिका कृष्ण चन्द्र द्विवेदी निभाते हैं। रामनगर के ही डहियाँ गांव में रहने वाले कृष्ण चन्द्र द्विवेदी नारद के अलावा राम जन्म लीला के दिन विराट रूप की भूमिका भी निभाते हैं। आप को यह सेवा कार्य आप के परिवार से पारम्परिक रूप में प्राप्त हुआ है। इनसे पूर्व नारद की भूमिका में भोलानाथ उर्फ ‘बम बम गुरू’ तथा पण्डित सुखदेव रह चुके हैं। आप नारद की भूमिका के अलावा लीला में सुतीक्षण मुनि, सतानन्द (राजा जनक के कुल गुरू) तथा ब्रह्मवाणी आदि भूमिकाओं का निर्वहन करतें हैं। आप से पहलें सतानन्द का अभिनय आप के पिता श्री श्याम सुन्दर द्विवेदी करते थे तथा विराट रूप की भूमिका आप के दादा श्री शालिग्राम द्विवेदी निभाते रहे। आप के परदादा श्री ठाकुर प्रसाद द्विवेदी रामलीला के मंत्री पद को भी सुशोभित कर चुके हैं।

ब्रह्मा जी – वर्तमान में ब्रह्मा का चरित्र श्री शीतला  प्रसाद त्रिपाठी निभाते हैं इनके पूर्व इनके नाना श्री बद्री पाठक, इनके पूर्व बद्री पाठक के पिता श्री दल्लन पाठक ब्रह्मा की भूमिका निभाते थे। इस भूमिका के संदर्भ में श्री शीतला प्रसाद जी ने बताया कि लंका स्थित रामेश्वरम् मंदिर का पुजारी ही ब्रह्मा की भूमिका निभाता है। मंै स्व0 श्री बद्री नाथ पाठक के देहांत के बाद सन् 2009 से इस भूमिका में हूं। कृषि तथा पूजा -पाठ द्वारा जीवनयापन करते हुए अपने नाना के विरासत को संभाले हुए हैं।

बालि- पुराना रामनगर निवासी 70 वर्षीय श्री मनमोहन पाण्डेय वर्तमान में बालि की भूमिका निभाते हैं। बालि की भूमिका के अलावा रामनगर की रामलीला पिछले 12 वर्षों से चंदन एवं टीका भी लगाते हैं। 20 वर्षों से बालि के भूमिका के अलावा पूर्व में सुनैना, मंदोदरी, बालहनुमान की भूमिका भी निभा चुके हैं। पण्डित अनिरूद्ध पाण्डेय व्यास के समय से आपका आगमन हुआ। रामलीला में पहले से आये बदलाव के सम्बन्ध में कहना है कि- ‘‘बहुत बदलाव आया है! कोई फोटो नहीं खींच सकता। आधे मेले में साधु एवं आधे में बनारसी रहते थे। अब साधुओं की संख्या बहुत कम हो गयी है। उसके पीछे कारण भाव का कम होना है। पहले राजा की तरफ से बहुत सी सुविधायें मिलती थी। हां! बनारसियों की संख्या ठीक-ठाक है।’’

सुमंत जी– रामलीला में राजा दशरथ के मंत्री के रूप में सुमंत की भूमिका श्री संतराम पाठक निभाते हैं। इनका निवास स्थान रामनगर के भीटी गांव में है। रामलीला में सुमंत जी की यह भूमिका पिछले 3 वर्ष से मिली हुई है। पूर्व में श्री महेन्द्र पाठक (किले में स्थित काले हनुमान जी के भूतपूर्व पुजारी) निभाते थे। श्रीरामलीला के सम्बन्ध में अपने भाव को व्यक्त करते हुए आपने कहा कि- ‘‘रामनगर की रामलीला एक धार्मिक धरोहर है और मुझे इस बात की बहुत खुशी है कि मैं रामलीला में भूमिका अदा करता हूं। जब तक मेरा पुरूषार्थ रहेगा और मुझे अवसर दिया जायेगा, तब तक मैं अपनी सेवा श्रीराम के चरणों मंे समर्पित करता रहूंगा।’’

परशुराम – रामलीला में वर्तमान मंे परशुराम जी की भूमिका श्री संतोष पाठक पिछले 5 वर्षों से निर्वहन कर रहे हैं। इनसे पूर्व इनके पिता श्याम जी पाठक इस भूमिका का निर्वहन करते थे। परशुराम की भूमिका इनके परिवार को वंश परम्परा में मिली हुई है। श्री श्याम जी पाठक ने इस संदर्भ में बताया कि पूर्व में परशुराम की भूमिका निभाने वाले श्याम सुन्दर पुजारी जी ने हमारे पिता विश्वनाथ पाठक को महाराज आदित्य नारायण सिंह से मिलवाया और संवाद सुनने के बाद वहां उपस्थित महाराज विभूति नारायण सिंह ने उनको ईनाम दिया था। परशुराम की भूमिका में स्वयं के भागीदारी के संदर्भ में बताया कि- ‘‘पिताजी का पैर खराब हो गया था और किले से भूमिका के लिए उनको बुलावा आया तो उन्होंने असमर्थता जाहिर करते हुए मुझे जाने को कहा। मेरी आवाज पिताजी जैसी नहीं थी और मैंने भी असमर्थता व्यक्त की जिस पर पण्डित श्री राम नारायण पाण्डेय ने मुझे प्रेरणा देते हुए कहा कि ‘आपके स्वरूप का चुनाव किला से होता है। मैं कहता हूं कि आप यह संवाद कह लेंगे क्योंकि शेर के घर पड़रू नहीं पैदा होता’ और मैंने संवाद ले लिया। जानकी जी की प्रेरणा से संवाद सकुशल अदा किया। इस प्रकार 1981 से मैं लगातार परशुराम की भूमिका में रहा। इनके पूर्व खदेरन पाठक, रामलगन पाठक, जगरनाथ पाठक बनते थे।

व्यास सहायक- रामनगर की रामलीला में दो मुख्य व्यासों के अतिरिक्त व्यास जी के सहायकों की भूमिका महत्वपूर्ण है। रामलीला में प्रतिदिन होने वाले आरती पंचस्वरूपों के पीछे चंवर डोलाते व्यास सहायक सम्पत व्यास जी को इस भूमिका में देखा जा सकता है। स्वयं एक वर्ष शत्रुघ्न बन चुके सम्पत राम शर्मा बताते हैं कि व्यास जी के साथ सन् 1960  से  ही सहायक की भूमिका में हैं। लगभग 20 वर्ष पहले व्यास रघुनाथ दत्त शर्मा की अस्वस्थता में हमने एक वर्ष रामलीला कराई भी है। आरती के समय चंवर डोलाने के अतिरिक्त सहायक के रूप में पंचस्वरूपों को संवाद प्रशिक्षण, श्रृंगार एवं निर्देशन में भी सहायक की भूमिका रहती है। श्रीराम की सेवा में लगे हुए 73 वर्ष बीत चुके हैं और यही इच्छा है कि जब तक शरीर में प्राण रहे श्रीराम जी की सेवा करता रहूं।

नल-नील – रामलीला में नल एवं नील की भूमिका क्रमशः  धर्मराज दास एवं बाबा रमेश दास निभाते हैं। भीटी गाँव के दोनों सगे भाई पिछले नौ वर्षों से भूमिका निभा रहे हैं।

रावण- इस भूमिका में विश्वेश्वर पाठक, रामनारायण पाठक, कौशल पाठक थे, और वर्तमान में यह भूमिका स्वामी नाथ पाठक द्वारा निभाई जा रही है जो लगभग 20 साल से इस भूमिका में हैं। हांलाकि इनके पुत्र श्री राजीव कुमार पाठक भी पिछले 8 वर्षों में बीच-बीच मंे इस भूमिका का निर्वहन करते रहे हैं।   कृतिदेव यहां रावण- इस भूमिका में विश्वेश्वर पाठक, रामनारायण पाठक, कौशल पाठक थे, और वर्तमान में यह भूमिका स्वामी नाथ पाठक द्वारा निभाई जा रही है जो लगभग 20 साल से इस भूमिका में हैं। हांलाकि इनके पुत्र श्री राजीव कुमार पाठक भी पिछले 8 वर्षों में बीच-बीच मंे इस भूमिका का निर्वहन करते रहे हैं।  रावण की भूमिका से जुड़ाव के सम्बन्ध मंे श्री पाठक इसे प्रभु राम की श्रद्धा से जोड़ते हैं। दो सौ सालो से अपरिवर्तित श्रीरामलीला के स्वरूप से अभिभूत श्री पाठक श्रद्धा की चरम स्थिति को श्री रामचरितमानस के आधार पर होने वाले प्रसंगीय मंचन से जोड़ते हैं।  श्री रामलीला को वह आर-पार की माला की संज्ञा देते हैं। इसके पीछे वह तर्क देते हैं कि इस वृहद लीला का स्वरूप ऐसा है कि भक्त चाहे जितना प्रयास करे कोई न कोई मंचीय प्रसंग उनसे छूटता जरूर है। प्रभु राम के चरित्र को वह मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में पूजते हैं।

केवट- रामलीला में केवट की भूमिका निभाने वाले पात्र का नाम श्री श्याम दास है। ये पुराने रामनगर के रहने वाले हैं और सन् 1972 से लगातार रामलीला में केवट की भूमिका निभा रहे हैं। श्याम दास काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में सीनियर कारपेन्टर के रूप में कार्यरत थे। वैसे नौकरी के समय इनका अधिक समय भारतकला भवन में व्यतीत हुआ।  रामलीला में काम करने के लिए उनको दक्षिणा के रूप में क्या मिलता है ऐसा पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि, ‘‘जब भगवान राम को नदी पार कराने का कुछ नहीं लिया तो मैं महाराज से क्या लूंगा।’’ रामलीला में इनकी अगाध भक्ति है। ये केवट का प्रसंग बड़े ही भाव विभोर होकर पूरे समर्पण के साथ निभाते हैं। मानो ऐसा प्रतीत होता है कि वही त्रेतायुग के ही केवट हों। इनके पहले रामलीला में इनके चाचा वैद्यनाथ बहुत सालों तक केवट की भूमिका निभा चुके हैं। रामलीला में केवट की भूमिका लगातार पीढ़ी दर पीढ़ी इनके परिवार के द्वारा ही निभाया जाता है।

अन्य बाल पात्र

प्रिंस उपाध्याय – कैकेयी, छोटे हनुमान, सुनैना, सखी आदि भूमिकाओं को  निभाने वाले 19 वर्षीय प्रिंस उपाध्याय सुपुत्र श्री बनवारी लाल उपाध्याय जगतपुर पी0जी0 कालेज, वाराणसी में बी0काम0 अन्तिम वर्ष के छात्र हैं। पिछले 8-9 वर्षों से पिं्रस विविध भूमिकाओं का निर्वहन कर रहे हैं। रामलीला के प्रति अपने भावोद्गार व्यक्त करते हैं कि- ‘‘रामलीला ने मुझे बहुत कुछ दिया है। जब मैं बचपन में बालरूप का अभिनय करता था तब अपने नाना (श्री रमेश पाण्डेय, जामवन्त गुरू) के सानिध्य में बहुत कुछ सिखा और मेरा यह सपना है कि मैं भी जामवन्त बनूँ। रामलीला ने जो मुझे सम्मान दिया है उसे मैं वापस नहीं कर सकता।

अजीत नारायण उपाध्याय – 21 वर्षीय अजीत लगभग 10-12 वर्षों से विविध भूमिकाओं का निर्वहन करते आ रहे हैं। जिसमें कौशल्या, छोटे हनुमान, सखी, जटायु, विप्र रूप आदि हैं। श्री महेन्द्र नाथ उपाध्याय के सुपुत्र अजीत काशी इंस्ट्टिूयट के बी0टेक0 के विद्यार्थी हैं।

रामलीला के प्रति भावना व्यक्त करते हुए कहते हैं, ‘‘रामलीला मेरे लिए बस एक लीला ही नहीं यह मेरे लिए शिक्षा का केन्द्र है। मैंने अपने दादा जी (श्याम नारायण उपाध्याय) से रामलीला के बारे में बहुत कुछ सीखा है। रामलीला में छोटी-छोटी बातें भी हमें बहुत शिक्षा देती हैं जैसे हमारे व्यास जी (लक्ष्मी नारायण) के मुख से यह वाणी, ‘‘चुप रहो, सावधान’’ यदि इसको अपने जीवन में अनुसरण किया जाय तो हम अपने जीवन में बहुत आगे जा सकते हैं। हम लीला को हृदय से देखते हैं ना कि दिमाग से।

अमित नारायण उपाध्याय– 18 वर्षीय अमित गाजियाबाद से बी0टेक0 की पढ़ाई कर रहे हैं तथा अपने भाई अजीत के साथ समय≤ पर विभिन्न भूमिकाओं का निर्वहन करते हैं। फुलवारी के प्रसंग वाली लीला में इन्हें सखी के पात्र से विशेष लगाव है। पात्र बनने को लेकर अपनी भावना बताते हैं- ‘‘रामलीला में अभिनय मेरे लिए सपनों के पूरा होने जैसा है, मैं अपने अभिनय को बहुत मस्ती से लेता हूँ। जब कोई हम लोगों से मिलता है तो रामलीला के कारण ही हम लोगों को बहुत सम्मान मिलता है। हम किसी रुपये (द्रव्य) के लिए रामलीला में अभिनय नहीं करते, सेवा की भावना से अभिनय करते हैं। रामलीला मेरे लिए पूजा, आस्था, शिक्षा का केन्द्र है।’’

शुभम तिवारी- रामलीला में सखी, देवता व अन्य पात्रों की भूमिका निभाने वाले 17 वर्षीय शुभम तिवारी सुपुत्र श्री प्रकाश तिवारी पिछले 7 वर्षों से अभिनय कर रहे हैं। इण्टरमीडिएट फाईनल के विद्यार्थी शुभम अपने पात्र बनने को लेकर बताते हैं कि- ‘‘जब मैं छोटा था तब अपने नाना जी और भाईयों को रामलीला में अभिनय करता देखता था। खासकर जब बाबा जी (जयमूरत उपाध्याय जी), दशरथ जी बनते थे तब मेरा भी मन करता था। रामलीला में अभिनय करना मेरे लिए गर्व की बात है। मैं जब अपने विद्यालय में पढ़ने जाता हूँ और मेरे मित्र और अध्यापकगण मुझे रामलीला पात्र के नाम से ही बुलाते हैं तो मुझे अच्छा लगता है। रामलीला ने हमें बहुत कुछ दिया है। ’’

विवेकानन्द पाण्डेय – नोएड़ा से बी0टेक0 कर रहे 18 वर्षीय विवेकानन्द पाण्डेय सुपुत्र श्री नर नारायण पाण्डेय पिछले 8 वर्षों में सखी, देवता, पुरबालक आदि पात्रों का अभिनय कर चुके हैं। रामलीला में अपनी आस्था प्रकट करते हुए कहते हैं कि- ‘‘रामलीला के प्रति मेरी भावना बहुत ही आस्थापूर्ण है। हमारी रामलीला में छोटी-छोटी बातों को दिखाया जाता है जो हमें शिक्षा ही देती है जैसे रावण के दरबार में राजा का ऊपर बैठना, मंत्रियों को उनसे नीचे बैठना। रामलीला मेला नहीं है, राम के चरित्रों का वर्णन है और कहीं भी ऐसी रामलीला नहीं होती। मुझे इस बात का दुख है कि रामलीला एक महीने मात्र होती है क्योंकि सुख के दिन बहुत जल्दी चले जाते हैं; काश रामलीला पूरे साल होती।’’

सच्चिदानंद पाण्डेय– 15 वर्षीय सच्चिदानंद पिछले 8 वर्षों में सखी, छोटे हनुमान, मंदोदरी इत्यादि कई भूमिकाओं का निर्वहन कर चुके हैं। रामप्यारी देवी इण्टर कालेज के कक्षा-11 के विद्यार्थी सच्चिदानंद और विवेकानंद पाण्डेय दोनों भाई हैं। सच्चिदानंद बताते हैं कि- ‘‘रामलीला में मुझे छोटे हनुमान बनना बहुत अच्छा लगता है। ऐसा लगता है कि हनुमान जी की शक्तियाँ आ गयी हैं और रामलीला में जो भगवान के दर्शन रूप को दिखाते हैं चतुर्भुज रूप, विराट रूप, आठों स्वरूप, भोर की आरती ये सब किसी भी अन्य जगहों की रामलीला में नही दिखाया जाता है। रामलीला ने हमें सम्मान दिलाया है। पूरा श्रेय मैं रामजी को देता हूँ।’’

सिद्धार्थ उपाध्याय– 15 वर्षीय सिद्धार्थ उपाध्याय सुपुत्र श्री प्रकाश कुमार उपाध्याय पिछले 7-8 वर्षों में पुरबालक, सनकादिक आदि बाल पात्रों की भूमिका निभा चुके हैं। बालपात्र के रूप में भूमिका निभाने को लेकर अपनी अनुभूति व्यक्त करते हुए सिद्धार्थ बताते हैं कि- ‘‘जब पहली बार पुरबालक की भूमिका निभानी थी तब मंै काफी डरा हुआ था। रामलीला में उपस्थित इतनी बड़ी भीड़ के सामने ऊँचे आवाज में संवाद अदायगी कैसे की जाय, इसको  लेकर मेरे नाना श्री बालकिशुन दीक्षित (जो कि निषादराज की भूमिका निर्वहन करते हैं) ने मेरा मार्गदर्शन व उत्साहवर्धन किया। तब से मैं बाल पात्र के रूप में कई बार भूमिका निर्वहन कर चुका हूँ। रामनगर की इस विश्व प्रसिद्ध रामलीला में अभिनय से जुड़ना वास्तव में किसी के लिए भी गौरव की बात है।’’

विकास पाण्डेय- पुत्र श्री चन्द्रधर पाण्डेय, कृषि, बटाऊबीर, कक्षा-12, पी0एन0 कालेज, रामनगर, इस वर्ष चैथी सखी, देवता, सरस्वती, पुरवासित इत्यादि बने।

आशीष पाण्डेय- पुत्र श्री चन्द्रधर पाण्डेय, कृषि, पिछले 12 साल से अभिनय कर रहे हैं। इस वर्ष सुमित्रा, मंथरा, मेघनाथ, पहली सखी इत्यादि बने। विद्यापीठ से बी0ए0 द्वितीय वर्ष के छात्र।

अवतन्स दीक्षित– पुत्र श्री उमेश दीक्षित, कक्षा-3 डी0ए0वी0 कालेज, रामनगर, इस वर्ष पुरबालक, सनकादिक आदि बने।

अंकित झा– पुत्र श्री आदित्य नारायण झा, पुरोहित, निवास-बटाऊबीर, पशु अस्पताल के पास, कक्षा-9, सिद्धार्थ पब्लिक स्कूल, दो वर्ष से बन रहे हैं। इस वर्ष कौशल्या, गणेश, तीसरी सखी, दासी, देवता इत्यादि बने।

रितेश पाण्डेय- पुत्र श्री अशोक पाण्डेय, बटाऊबीर पशु अस्पताल के पास, कक्षा-7 डी0ए0वी0 पब्लिक स्कूल, पहली वर्ष बने देवता, छठी सखी, राक्षसनी, दासी और सनकादिक इत्यादि।

ज्ञानेन्द्र पाण्डेय- पुत्र श्री अशोक पाण्डेय, इस वर्ष शत्रुघ्न की पत्नी बनेे।

प्रह्लाद पाठक– पुत्र श्री कैलाशनाथ पाठक, गोलाघाट, रामनगर, वाराणसी, कक्षा-8 सिद्धार्थ पब्लिक स्कूल, दो वर्षो से अभिनय कर रहे हैं। इस वर्ष पुरबालक और दासी बने।

कोमल पाण्डेय- पुत्र श्री कैलाशनाथ पाठक, कक्षा-9 पी0एन0 कालेज, तीन वर्षों से अभिनय कर रहे हैं। इस वर्ष देवता, सखी इत्यादि बने।

शिवांश पाठक- पुत्र श्री रामजी पाठक (वीभिषण)- कक्षा-5, भारतीय बाल विद्यालय, रामनगर, दो साल से अभिनय कर रहे हैं। इस वर्ष पुरबालक, सनकादिक एवं दुल्हन आदि बने थे।

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