रामलीला के शोधक- काष्ठ जिह्वा स्वामी

रामनगर की रामलीला विश्व भर में काशी की पहचान बन गयी है। इस अद्भुत लीला का मंचन सदियों से आम जनमानस के हृदय में बसा हुआ है। शायद ही ऐसा कोई और मंचन इतना दीर्घजीवी रहा हो वह भी निरंतर अपने मूल रूप में। ‘‘चुप रहो’ सावधान‘‘ की एक आवाज कई हजार भीड़ को आज भी इस लीला में नियंत्रित करती है। कृत्रिमता आज भी इस अद्भुत  लीला से दूर है। न तो यहां पात्रों के संवाद के दौरान ध्वनि विस्तारक का प्रयोग होता है और न ही रोशनी के लिए बिजली का इस्तेमाल होता है। लेकिन एक ऐसा पक्ष भी है जो शायद कम ही लोगों को पता है। रामलीला के दौरान बोले जाने वाले संवाद नेमी-प्रेमी के दिलों में उतर जाते हैं। कुछ संवाद तो इतने प्रचलित हैं जो बहुतायत की जुबां पर रहते हैं। बेहद सरल, मार्मिक इन संवादों को संजोया है- रामलीला के संशोधक विद्वान संत काष्ठ जिह्वा स्वामी ने। इनके द्वारा पिरोये गये शब्दों की माला रामलीला के संवादों के रूप में परिणित हुई। साल दर साल ये संवाद पात्रों की जुबां से लोगों के हृदय में उतरते रहे हैं और श्रद्धा की ऐसी मिसाल बन गये जो जनमानस के अन्तर्मन से जुड़ चुकी हैं।

योगी, विद्वान, दार्शनिक, लेखक जैसे परिचयों से परिपूर्ण काष्ठ जिह्वा स्वामी विशुद्धानंद जी के समकालीन माने जाते हैं। माना जाता है कि काष्ठजिह्वा स्वामी की प्रेरणा से ही विशुद्धानंद ने सन्यास ग्रहण किया था। इसी वजह से विशुद्धानंद इनको अपना गुरू मानते थे। काशी के एक और संत महादेव श्रमजी थे। काष्ठ जिह्वा स्वामी के निकटस्थ रहे। कहा जाता है कि दोनों संत जब मिलते तो सहज ही शास्त्रार्थ करते और उसी को अपने मनोरंजन का आधार बनाते। काष्ठ जिह्वा स्वामी के प्रारम्भिक जीवन का प्रामाणिक साक्ष्य तो नहीं मिलता है। हालांकि उनके ऊपर अध्ययन करने वाले कुछ विद्वानों का मानना है कि वे फतेहपुर जिले में कानपुर के पास असनी गांव के रहने वाले थे।

माना जाता है कि असनी गांव में एक शिव मंदिर की स्थापना स्वामी जी ने ही की है। तथ्यों को माना जाये तो स्वामी जी कान्यकुब्ज त्रिपाठी ब्राह्मण थे। माना जाता है कि काशी का आकर्षण स्वामी जी को असनी से यहां खींच लाया। यहां आने पर स्वामी जी ककरमत्ता में रूके थे। रामनगर के कुछ लोग मानते हैं कि स्वामी जी ककरमत्ते के ही निवासी थे। हालांकि इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता है। शिक्षा-दीक्षा की बात की जाय तो काष्ठ जिह्वा स्वामी की औपचारिक शिक्षा के बारे में कोई प्रमाण नहीं मिलता है। लेकिन उनका हिन्दी, संस्कृत, मराठी, उर्दू में ज्ञान अद्भुत था। उन्होंने न केवल मराठी में ‘रेखता संग्रह’ लिखा बल्कि उर्दू में उनकी रचना ‘दिल्ली बिन्दु’ उच्चकोटि की थी। इन्हें तन्त्र शास्त्र का भी अच्छा ज्ञान था।

कैसे पड़ा काष्ठ जिह्वा नाम – स्वामी जी का व्यक्तित्व विराट था। वे न केवल बड़े विद्वान थे बल्कि उच्चकोटि के साधक भी थे। सरल हृदय और सन्त स्वभाव स्वामी जी के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खासियत थी। माना जाता है कि एक बार उनके मुंह से कोई अप्रिय बात निकल गयी। जिससे वे इतने दुःखी हुए की फिर कभी नहीं बोलने की प्रतिज्ञा कर अपनी जीभ पर काठ (लकड़ी) की खोल चढ़ा ली। इनके नाम को लेकर और भी कई जनश्रुतियां प्रचलित हैं।

चांडाल को भी झुक कर करते थे प्रणाम। काष्ठ जिह्वा स्वामी विद्वान तो थे ही, शास्त्रार्थ भी करते थे। एक बार किसी विषय पर शास्त्रार्थ के दौरान किसी पण्डित का उनसे अपमान हो गया। उस अपमान से वह पण्डित इतनी पीड़ा से ग्रसित हो गये कि कुछ ही दिनों में उनकी मृत्यु हो गई। यह सुनकर स्वामी जी को अपार कष्ट हुआ और उन्होंने फिर कभी इस तरह के वाद-विवाद न करने का प्रण लिया। साथ ही इस घटना के बाद जब वे सुबह उठते थे तो सामने चांडाल भी होता तो उसका वे झुककर प्रणाम करते।

ऐसे हुआ रामनगर व रामलीला से जुड़ाव – काष्ठ जिह्वा स्वामी की मेधा शक्ति अद्भुत थी इन तमाम गुणों का बखान जब काशी नरेश महाराज ईश्वरी नारायण सिंह को हुआ तो उन्होंने इनसे मिलकर अपना गुरू बना लिया। इस तरह काष्ठ जिह्वा स्वामी का रामनगर के किले में प्रवेश हुआ। उस समय रामनगर में रामलीला शुरू हो चुकी थी लेकिन अव्यवस्थित रूप में थी। रामलीला को व्यवस्थित कलेवर देने के लिए महाराज ईश्वरीनारायण सिंह ने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, रीवां नरेश रघुराज सिंह और काष्ठजिह्वा स्वामी का सहयोग लिया। रामलीला को सजीव रूप देने के लिए तीनों विद्वानों ने लीला स्थल और उसके मंचन का वैज्ञानिक ढंग से निर्धारण किया। भारतेन्दु जी ने लीला के प्रदर्शन पर काम किया तो काष्ठजिह्वा स्वामी और रीवां नरेश ने लीला के अंशों तथा संवादों को गढ़ा। आज भी काष्ठजिह्वा स्वामी की रामलीला अभिनय के लिए तैयार की हुई पुस्तक रामनगर दुर्ग में सुरक्षित है। कहा जाता है कि रामनगर की रामलीला में स्वामी जी हाथी पर बैठकर उसे देखने आते थे।

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