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रामलीला में साधु संत एवं नेमीजन

‘पद सरोज पद पायनी, भक्ति सदा सत्संग‘‘

भक्ति और भाव के पारस्परिक सम्बन्ध में य्ाूँ तो दृष्­िटकोंण को सर्वोच्चता प्राप्त है परन्तु निरन्तरता का अभाव कहीं भी, किसी भी प्रारुप में विसंगति के जन्म का कारण भी बनता है। फिर चाहे शान्त जल के निश्चल प्रवाह में निरन्तरता का अभाव हो या फिर दार्शनिक गूढ़ चिन्तन में निरन्तरता का अभाव। परिणति विसंगति ही होगी…… जल प्रलय या शंकाग्रस्त विवेक की परिणति। प्रश्न उठता है निरन्तरता किसमें हो? भक्ति में निरन्तरता या भाव में निरन्तरता? जिज्ञासा की शांति के पूर्व हमें जीवन में भक्ति और भाव के उद्गम को समझना नितान्त आवश्यक है। भाव के प्रमुख रूपों मंे सेवक भाव, सखा भाव, बन्धु भाव, दया भाव, आकर्षण भाव, माधुर्य भाव प्रमुख हैं, इन्हीं भावों में निमग्नता ही भक्ति है। भावोदय से ही भक्ति का जन्म है। निःसंदेह भाव में निरन्तरता और भक्ति में प्रतिबद्धता से ही मनुष्य साकार ब्रह्म की प्राप्ति का दावा करने में सक्षम हो सकता है। प्रश्न पुनः उठता है निरन्तरता और प्रतिबद्धता की प्राप्ति कैसे हो? एकमात्र उत्तर है- दर्शन। दर्शन का शाब्दिक अर्थ देखना है लेकिन व्यवहारिक अर्थ देखने के साथ आत्मसात् करना है। कुछ ऐसी ही देखने के साथ आत्मसात् करने की प्रवृत्ति रामनगर की पुण्यसलिला रामलीला में देखने को मिलती है। दावे अनेक हैं…. साक्षात् प्रभु दर्शन के, कष्टहरण के, रहस्यमयी चमत्कार के, वियोग-हरण संयोग के, धर्म और विज्ञान के मेल तक के दावे श्रीरामलीला महानुष्ठान में भक्तो द्वारा किये गये हैं। इन दावों-साक्ष्यों की सम्पूर्ण पवित्रता को अक्षुण्ण रखते हुए मूलाधार तटस्थ भाव की अनदेखी करना वैसी ही भूल होगी जैसे ज्ञान के नेपथ्य में अनुभव को महत्वहीन समझना।  सोलहों संस्कारों से भी अधिक पुण्यफलदायक श्रीरामलीला के महात्म्य को शब्दों में गढ़ना बेहद जटिल है, इस महात्म्य को श्रीरामलीला मंचन के दौरान उपस्थित लोगांे के मुख पर सहज ही पढ़ा जा सकता है। दो सौ वर्ष प्राचीन श्रीरामलीला मंचन का अपरिवर्तित स्वरूप संभवतः ब्रह्माण्ड के उस सार्वभौमिक नियम का विरोध करता है जिसके अनुसार परिवर्तन अवश्यम्भावी है। इस अखिल ब्रह्माण्ड के नियंता का एक माह का रामनगर मंे प्रवास ही सार्वभौमिकता के विरोध का कारण बनता है, ऐसा कई वर्षों से नियमित आ रहे भक्तों का दृढ़ विश्वास है। एक माह की इस आत्मावलोकित लीला में साधु-सन्तों की टोलियां दूर-दूर से आकर रामनगर में प्रवास करती हैं और प्रभु सानिध्य के आनन्द में भजन-कीर्तन का निरन्तर प्रवाह करती रहती हैं।

श्रीरामलीला का संदेश पूर्णतः सामाजिक है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। अयोध्या और काशी की भौगोलिक दूरी कैसे इस एक महीने के दौरान अदृश्य रहती है साथ ही कैसे अवध पति काशी नरेश बनते हैं, यह विशुद्ध सामाजिक संप्रेषण ही कहा जायेगा। ‘लोक‘ समग्र श्रीरामलीला का एक ऐसा पक्ष है जो वैशिष्ट्यता को दर्शाता है न कि स्थानीयता को। रामनगर, वाराणसी तथा आस-पास के गाँँवों से नियमित रूप से श्रीरामलीला के दर्शनानुभव के साक्षी बनने के लिए आने वाले ‘नेमी‘ कहलाते हैं। यद्यपि ‘नेमी‘ नियमित का अपभ्रंश है लेकिन लोकाचार में साधु-सन्तों के साथ ‘नेमी‘ भी भक्तों की एक वर्गीकृत श्रेणी है। कहते हैं भक्त-भगवान की एकरूपता ही चिन्मयानन्द की अनुभूति का कारण बनती है, ऐसे में भक्त चिन्मयानन्द की प्राप्ति के लिए भगवत्रुप धारण करते हैं। कुछ ऐसी ही तैयारी नेमिजन भी करते हैं। लीला पूर्व ही नये-स्वच्छ वस्त्रों, इत्र और सजी-धजी छड़ी के साथ हाथ में रामचरितमानस पोथी लिये नेमियों की लाखों लोगों की भीड़ में पहचान करना बेहद आसान है। विभिन्न व्यवसायों-कार्यालयों में कार्यरत ये नेमीजन अपना एक पूरा महीना प्रभु श्रीराम को समर्पित करते हैं। आज की अर्थ केन्द्रित सोच-समझ पर आधारित जीवन के विपरीत नेमीजनों की यह श्रद्धा समर्पण विश्व को शांति का संदेश भी दे जाता है।  ‘‘हिम्मत नहीं हठ है मेरी यहां आने की‘‘…. 85 वर्षीय श्रीराम मोहनी शरण ‘‘मौनी बाबा‘‘ की यह उक्ति लीला दर्शनातुर साधुआंे-नेमियों की आस्था का प्रतिनिधित्व करती है जिसमें भक्ति की प्रतिबद्धता स्पष्ट झलकती है। उम्र के सम्बन्ध में यहां बताना आवश्यक है कि नेमीजन सहज ही 9 से 90 साल तक की दिखाई दे जायेंगे। प्रश्न उठना लाजिमी है कि आखिर दर्शनार्थी और नेमी में अन्तर क्या है? अन्तर दृश्यास्वादन और रसास्वादन का है। दर्शनार्थी नियमित लीला दर्शन नहीं करते। वे किसी विशेष लीला का दर्शनार्थ चयन करते हैं और दृश्यास्वादन में रूचि लेते हैं। जबकि नेमी नियमित रूप से श्रीरामलीला में उपस्थित होते हैं और यदि किसी कारणवश लीला दर्शन से वंचित हो गये तो भी एक माह अनवरत लीला आरती तो अवश्य ही लेते हैं। इस प्रकार नेमीजन श्रीरामलीला के आध्यात्मिक-सामाजिक संदेशों का रसपान पूरे एक महीने करते ही हैं। तमाम पारिवारिक, सांसारिक झंझावतों को दरकिनार कर रामनगर में एक महीने श्रीरामलीला में साक्षात् रामानुभव करने की भक्तों की यह साधना ‘हठयोग‘ का ही रुप है जिसमें संवेदना की जीवन्तता का गूढ़ संदेश निहित है।

भक्तों के सहज दृष्टिकोंण को समझना उतना ही आवश्यक है जितना मानस के पावन संदेश को समझना। प्रस्तुत है रामनगर की श्रीरामलीला में कई वर्षों से अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे साधु-संतो, नेमियों का भावानुभव जिसमें प्रभु श्रीराम के प्रति अटूट श्रद्धा है तो वहीं मानस की चैपाइयों के कंठस्थ होने के साथ दार्शनिक निहितार्थ की गूढ़ समझ भी है…… जिसमें श्रीरामलीला में प्रभु श्रीराम के साक्षात् दर्शन होने का आध्यात्मिक दावा है तो वहीं श्रीरामलीला के सामाजिक सरोकार की सांसारिक भावना भी है….. जिसमें पीढ़ियों से चले आ रहे संस्कारों का वर्णन है तो वहीं नित नये अनुभव होने का रहस्योद्घाटन भी है…. जिसमें श्रीरामलीला की अखण्ड पवित्रता को लेकर निश्चिंतता है तो वहीं 200 सौ सालों से अपरिवर्तित श्रीरामलीला के स्वरूप को लेकर आस्थावान मन में उत्साही खनक भी है…

डाॅ0 सर्वेश्वर दास (पीला बाबा) – अयोध्या निवासी साधु डाॅ0 सर्वेश्वर दास (पीला बाबा) के रामनगर की रामलीला में आने का क्रम 1983 से ऐसा बना कि अब ये लगातार एक महीने रामनगर में रूककर प्रभु सेवा में लगे रहते हैं। मौनी बाबा के शिष्य श्री पीला बाबा बताते हैं कि- ‘‘मैं मौनी बाबा की प्रेरणा से पहली बार रामनगर रामलीला देखने आया, श्री मौनी बाबा पड़ाव पर रहते थे और उनकी उम्र 200 वर्ष थी, जो हमेशा ही केले के छाल की लंगोटी लगाये रहते थे। तब से इस रामलीला के आकर्षण ने मुझे इस कदर सम्मोहित किया कि प्रत्येक वर्ष एक महीने के लिए रामलीला में उपस्थित होकर श्रीराम के चरणों की सेवा का संकल्प जाग गया।’’ रामलीला के दौरान रामनगर में एक महीने के प्रवास के दौरान पीला बाबा की दिनचर्या में सुबह सर्वप्रथम रामजानकी आदि की भूमिका कर रहे बालक पात्रों की चरण सेवा शामिल है। बडे ही श्रद्धा एवं प्रेमपूर्वक पीला बाबा इन पात्रों के चरण दबाते हुए मिल जायंेगे। रामलीला के नेमियों-प्रेमियों के प्रति आत्मीयता एवं अपार स्नेह का भाव पीला बाबा की पहचान बन चुकी है। पीला बाबा आगे बताते हैं कि 1967 में मैं पहली बार अपने आश्रम (रामकुंज कथा मण्डप, रामघाट, अयोध्या) से यहां आया तो पम्पासरोवर के पास रूका था। तब से अब रामलीला में हुये परिवर्तनों पर सवाल पूछने पर चिकित्साशास्त्र में स्नातक डाॅ0 सर्वेश्वर दास जी कहते हैं कि यहां की विश्व प्रसिद्ध रामलीला में कुछ परिवर्तन जरूर आया है जैसे- ‘‘पहले साधु संतों की बड़ी टोली बाहर से एक महीने के लिए रामनगर में रूककर प्रवास तथा कीर्तन-भजन करते हुए रामलीला मैं सहभागिता करती थी लेकिन अब समय के बदलाव ने साधु-संतों की संख्या में कमी आ चुकी है जिसका कारण है कि पहले साधुओं को व्यापक राजाश्रय और संसाधन उपलब्ध कराये जाते थे, उनके रूकने एवं आहार-व्यवहार के लिए विशेष प्रबन्ध की चिंता की जाती थी।’’ पीला बाबा कहते हैं कि एक महीने के रामलीला दर्शन के उपरांत अयोध्या लौटने पर मुझे वर्षभर के लिए नई ऊर्जा प्राप्त होती है। मौनी बाबा के शिष्य डाॅ0 सर्वेश्वर दास (पीला बाबा) रामलीला के मर्म को इंगित करते हुए बताते हैं कि ‘‘जब कभी आप आरती के समय ध्यान देंगे तो उस समय भगवान श्रीराम शून्य की ओर देखते हैं, वास्तव में तत्समय पात्र के अन्दर देवांश आ जाता है, उस समय देवता का पलक नहीं झुकता। यह लक्षण आपको केवल रामजी बने पात्र में परिलक्षित होगा।’’

रामलीला प्रेमियों के निष्ठा को बताते हुए कहते हैं कि यहां पर सबकी अपनी-अपनी अलग-अलग तरीके की आस्था है जिसके कारण नेमीजन रामलीला में आते हैं। यह सभी रोचक और कहानी के रूप में आपको प्रतीत होगा। यहां हर नेमी की अलग-अलग कहानी है। एक यादव बंधु की कहानी बताते हुए पीला बाबा ने बताया कि वे सज्जन अपने भैंस को चारा और पानी खिलाते हैं तो वह नहीं खाती है इसी बात से गुस्साकर वो रामनगर की रामलीला में चले जाते हैं, लौटने पर देखते हैं कि भैंस पूरी तरह से स्वस्थ हो गयी है और वह चारा भी ठीक ढंग से खा रही है और दूध भी पर्याप्त मात्रा में देना शुरू कर दी, तब से यादव बंधु को लगा कि सब कुछ राम की कृपा पर आधारित है। उनके आस्था की इस नियमितता ने उन्हें नेमी बना दिया।

इसी ढंग से एक बुढ़िया नेमी की कहानी बताते हुए पीला बाबा कहते हैं कि उस बूढ़ी माता ने बताया कि वह बहुत दिनों से परेशान थी कि उनका किरायेदार मकान हड़पने को तैयार था तथा किसी भी प्रकार छोड़ने को तैयार नहीं था। खिन्नता में उन्होंने संकल्प लिया कि अब मैं नियमित लीला में जाना छोड़ दूंगी जब तक किरायेदार द्वारा मानसिक उत्पीड़न खत्म नहीं हो जाता। पीला बाबा कहते हैं कि इसे रामजी की कृपा ही कहेंगे कि रामलीला शुरू होने के चन्द दिनों के पहले ही उस बूढ़ी माता का किरायेदार अचानक से मकान पर अपना कब्जा छोड़ अन्यत्र चला जाता है। फिर उस बूढ़ी नेमी का आस्था निरन्तर बनी रहती है। अपने बारे में बताते हुए पीला बाबा कहते हैं कि हर वर्ष ऐसा प्रतीत होता है कि अगली बार पुरूषार्थ काम नहीं करेगा शायद रामलीला में न जा पाऊं लेकिन न जाने कहां से इतनी शक्ति आ जाती है मैं अयोध्या से खींचा हुआ सीधे रामनगर की विश्व प्रसिद्ध रामलीला में आ जाता हूँ। वे कहते हैं कि यह मेरा परम सौभाग्य है जो रामचन्द्रजी की आरती का साक्षात् दर्शन करता हूँ जब तक शरीर  में जान रहेगी तब तक आता रहूंगा। ऐसा पीला बाबा का दृढ़ संकल्प है। इस बार भी तबीयत बहुत खराब थी। आश्रम के लोग पीला बाबा को कहीं हिलने के लिए मना कर रहे थे लेकिन वो रामनगर की रामलीला के लिए निकल पड़े।

श्री राममोहनी शरण जी – विघ्न हरण हनुमान मंदिर, लक्सा वाराणसी के 85 वर्षीय साधु श्री मौनी शरण जी लगभग 50 वर्षों से अनवरत लीला दर्शन को आते हैं। अपने गुरु श्री रघुनाथ शरण जी महाराज से दीक्षा प्राप्त श्री मौनी शरण जी का राम नाम से असीम प्रेम है। अपने बारे में बताते हैं कि- ‘‘हर महीने वृंदावन जाता हूँ। यह प्रभु कृपा ही है कि राम भक्त हनुमान के मन्दिर में प्रतिदिन भोर में 3ः30 बजे अपनी हाजिरी लगवा देता हूँ।’’ श्रीरामलीला के संदर्भ में अत्यन्त उत्साही होकर मौनी बाबा कहते हैं, ‘‘रामनगर की रामलीला में जो व्यवस्था है अन्यत्र कहीं नही। यहां लीला स्थल अलग-अलग है। अब देहात से ज्यादा लोग आते हैं परन्तु फिर भी शान्ति बहुत है। साधु-सन्तों की सेवा में कमी है। राजा की अरुचि भी प्रमुख कारण है। पूर्व काशी नरेश विभूति नारायण सिंह जी को लीला, नेमियों तथा साधु-सन्तों से विशेष लगाव था। फिर भी एक लाइन सी चली आ रही है। मर्यादा कायम है। लोगों की भावुकता भी अत्यंत अद्भुत है।’’ श्री रामलीला दर्शन हेतु अपनी अपार निष्ठा को व्यक्त करते हुए बलपूर्वक कहते हैं कि- ‘‘हिम्मत नही, हठ है मेरी यहां आने की। जब संसार है, तो आध्यात्म क्यों नही।’’ प्रभु श्रीराम एवं भक्त हनुमान के चरणों में अनन्य श्रद्धा रखने वाले श्री मौनी शरण जी लोक संग्रह के द्वारा लक्सा पर एक हनुमान मन्दिर का निर्माण करा चुके हैं। जहां जाड़े व गर्मी में दो महीने अखण्ड कीर्तन चलता है तथा रामलीला स्थल पर प्रत्येक दिवस लीला प्रारम्भ होने से लगभग 30ः00 मिनट पहले अपनी पूरी टोली के साथ भावपूर्ण श्रीराम कीर्तन करते हैं। पुराने लोग बताते हैं कि रामनगर की रामलीला में पहले साधु-संतों की अनेक टोलियां आकर एक महीने तक प्रवास करती थीं तथा लीला पूर्व व अन्तराल में हरिकीर्तन होते रहते थे। श्री मौनी शरण के नेतृत्व में यह कीर्तन की टोली इस परम्परा का अलख जगाये हुए है।

श्री गणेश दास जी – 16 वर्षों से अनवरत लक्ष्मण बने पात्र के वाहन के रूप में साधु गणेश दास जी श्रीराम लीला में सन्नद्ध हैं। रामनगर से आपका जुड़ाव जन्म से है। यहां की लीला के प्रति अपने विचार व्यक्त करते हुए श्री गणेश दास जी कहते हैं कि- ‘‘धर्मचन्द्र, करमचन्द्र दो भाई थे। करमचन्द्र नास्तिक था। परंतु धरमचन्द्र की आस्तिकता ने करमचन्द्र को सांख्ययोग की शिक्षा दी। यहां की लीला लीला नहीं साक्षात् भगवत् दर्शन है। वैदिक रीति से गणेश पूजन के द्वारा लीला सिद्ध होती है। यह मेला नहीं लीला है केवल आस्था ही यहां की साज-सज्जा है, घट-घट वासी होने का सबसे बड़ा प्रमाण है कुछ लोग इसे कहानी समझते हैं। धर्म की स्थापना डंडे से नहीं होती है धर्म स्व-भाव है, सम-भाव है।’’

श्री राजकुमार दास- बलुआ घाट, रामनगर, वाराणसी निवासी साधु श्री राजकुमार दास जी का रामलीला से पुराना जुड़ाव है। पूर्व में आप रामायणी भी रह चुके हैं। वर्तमान में आप श्री रामचन्द्र जी की भूमिका का निर्वहन कर रहे बालपात्र के वाहन हैं। लीला के प्रति इनसे श्रद्धा व भावपक्ष जानने की कोशिश की गयी तो इन्होंने विनम्रतापूर्वक बताया कि- ‘‘रामेच्छा से होश संभालने के साथ ही रामलीला के साथ प्राकृतिक प्रेम पनपा। 20 सालों से मूर्ति उठा रहा हूँ। भक्त और भगवान एक दूसरे के पूरक हैं। भगवान की लीला अलौकिक है आप एक पैर बढ़ायेंगे, भगवान आपके पास दौड़े चले आयेंगे। यहां साकार रूप दिखाया जाता है। जबकि भगवत् रूप निराकार है। सभी लीलाएं समान हैं। दरअसल प्रतिदिन शाम होने का बेसब्री से प्रतीक्षा रहती है। यह जादुई छड़ी नहीं तप है। ‘‘जे जाने तई देहि जनाई, तुमहि जानत, तुमहि हो जाई।’’ परमात्मा ने स्वयं अखिल ब्रह्माण्ड को अपने कंधे पर उठाया है, ऐसे में स्वयं परमात्मा को कंधे पर बैठाना अपने आप में अलौकिक अनुभव है। बदलाव प्रकृति का शाश्वत नियम है। लौकिक दृष्टि से प्रभु दर्शन अलौकिकता की अनुभूति है। वास्तव में परिवर्तन प्रभु लीला में नहीं बल्कि कलयुग में होना चाहिए। ‘‘दुर्गुण छोड़ सगुण की यात्रा, इस युग का सबसे बड़ा चमत्कार माना जायेगा।’

श्री सन्त दास – बलिया निवासी 65 वर्षीय साधु श्री सन्त दास जी भरत जी के वाहन हैं। विश्व  प्रसिद्ध रामलीला के आकर्षण पर प्रकाश डालते हुए श्री सन्त दास जी बताते हैं कि-यहां जनरेटर, माइक, इलेक्ट्रिानिक लाइट का प्रयोग नही होता है। दूसरे संवाद स्तर की दृष्टि से अलौकिक है। मुकुट पहनकर प्रभु की अनुपम छवि दिखती है। भगवद् कृपा से समय के अनुसार परिवर्तन हुआ है। कलिकाल के प्रकोप से दिव्यात्माओं के आगमन की कमी हुई है। अब संासारिक छवि के आकर्षण से साधु कोई नही बनना चाहता है।’’भरत मिलाप की लीला आपके लिए विशेष आकर्षण एवं भाव विभोर कर देने वाली लीला है।

श्री जगदेव दास- प्रहलाद घाट, वाराणसी के निवासी 55 वर्षीय जगदेव दास 1980 से नेमी हैं भावुक होकर कहते हैं कि- ‘‘शरीर भाव से समझेंगे तो नही पता चलेगा। इसके लिए आत्मीय भाव जरुरी है। गुरु कृपा से चारों दिशाओं का मालिक बना जा सकता है, ऐसा श्रीराम लीला से संदेश मिलता है। तमोगुण से लीला के संदेश को ना ही जाना जा सकता है, आत्मसात् करना दूर की बात है। जानकी उपासक हूँ। उस छवि को लेकर सोने पर स्वप्न में भी छवि दर्शन होता है।….किन्तु दुःखद है कि आज भक्ति का स्थान शौक ने ले लिया है।’’

श्री धरमदास – माता जानकी में अटूट श्रद्धा रखने वाले श्री धरमदास जानकी जी के वाहन हैं । ज्यादातर समय लीला में मौन रहते हैं, लीला के समय प्रभु से अपनी अन्तर आत्मा को साक्षात् प्रभु को दर्शन का माध्यम मानते हुए अपने सेवा के अवसर को परम सौभाग्य बताते हैं। उनका कहना है कि जबतक शरीर साथ देगा लीला में आना होता रहेगा ।

बाबा मस्तराम जी- रामनगर में पंचवटी स्थित खास चौक के बाबा मस्तराम जी के लिए इस विश्व प्रसिद्ध रामलीला की सादगी ही आकर्षण का केन्द्र है। वे बताते हैं कि पहले साधुओं की बहुत टोलियाँ होती थीं, जो रामलीला के दौरान एक महीने प्रवास तथा भजन- कीर्तन के साथ इस विश्व प्रसिद्ध रामलीला को चार चांद लगाते थे अब वो संख्या बहुत कम हो चुकी है। पहले किसी प्रकार का व्यवधान नहीं था। अब उन्हें मर्यादा भी नहीं प्राप्त होती। राजाश्रय में कमी को भी वह साधुओं की कमजोर उपस्थिति का एक कारण मानते हैं पुरानी बातों को याद करते हुए बाबा कहते हैं कि पहले कई स्थानों पर कीर्तन होते थे जिसमंे साधुगण अलग-अलग टोलियों में रामलीला शुरू होने से एक घण्टे पहले अपनी मण्डली के साथ कीर्तन करते थे। रामलीला स्थल साधुओं के कीर्तन मण्डली से गुलजार होता था।

श्री हर-हर महादेव जी – कटेसर ग्राम के निवासी 67 वर्षीय साधु श्री हर-हर महादेव पिछले 12-13 वर्षों से लगातार शत्रुध्न जी के वाहन रह चुके हैं परंतु अब स्वास्थ्य ठीक नहीं रहने के कारण दर्शनार्थी के रूप में उपस्थिति रहती है। तब से अब में हुये परिवर्तन व श्रीरामलीला के प्रति उनके भाव जानने की कोशिश में वह दार्शनिक अंदाज में कहते हैं कि- ‘‘ भोर की पावन आरती में पाँच राजाओं का दर्शन होता है। ये पाँच राजा प्रतीक हैं- क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा। स्थूल रूप में किष्किन्धा के राजा सुग्रीव, लंका के राजा विभीषण, राजा जनक, अयोध्या के राजा रामचन्द्र और काशी नरेश का दर्शन एक साथ होता है। इस दर्शन से एक अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है, यहीं खिंचाव का कारण है। मंचन के रूप में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। यह भगवान राम की महती कृपा है कि लीला का स्वरूप आज भी अपरिवर्तित है।’’ सदैव साथ में त्रिशूल रखने के बारे में पूछने पर कहते हैं कि- ‘‘त्रिशूल महाकाल का प्रतीक है इसके तीनों शूल भूत, भविष्य, वर्तमान को उद्घाटित करते हैं।’’ ये सुन्दरकाण्ड का सम्पूर्ण मंचन नहीं छोड़ना चाहते। इनके अनुसार रामलीला का प्रथम और अंतिम उद्देश्य आत्म दर्शन है।

श्री गोपाल दास- पापड़िया मठ, उड़ीसा के 70 वर्षीय साधु श्री गोपाल दास 32 वर्षों तक भगवान श्रीराम बनने वाले बालपात्र के वाहन रहे हैं। ‘‘हमारा चरित्र आदर्श राम की तरह होना चाहिए। कर्म से ज्यादा चरित्र की प्रधानता अपरिहार्य है, ऐसा भाव जागृत रखना चाहिए।’’ इस प्रकार की भावना रखने वाले श्री गोपाल दास जी के लिए यह रामलीला कोई नौटंकी नहीं है। यहां सचमुच मंे राम का अवतार होता है। हर छवि में भगवान महसूस होते है। जब मन भगवद् भजन में लगा है तो परिवर्तन की कोई बात ही नही है।

रामलीला के नेमी एवं प्रेमीजन 

मन प्रसन्न है तो ठीक है पर यदि मन खिन्न है तो मन प्रसन्न होना चाहिए; किन्तु यह हो कैसे? इसके लिए मनोयोग होना चाहिए। किसी कार्य में मन रमने का बहाना या प्रेरणा होनी चाहिए और यदि ऐसा कार्य, धार्मिक निष्ठा से जुड़ा हो, भक्ति और उपासना से जुड़ा हो तब तो फिर सच्चिदानन्द की अनुभूति ही हो जाती है। तो फिर चलते हैं ऐसे ही माध्यम की ओर अर्थात् रामनगर की मास पर्यन्त रामलीला की ओर। ऐसी रामलीला, जिसके बारे में बहुत कुछ लिखा, सुना गया है, विशेषताएँ सर्वत्र व्याख्यायित हैं; इसे फिर एक नयी दृष्टि से देखने का प्रयास करते हैं। आखिर किस प्रकार से एक नाट्य मंचन का उपक्रम जीवनचर्या, (वह भी सैकड़ो-हजारों) की बन जाती है, दैनिक कार्यक्रम एवं क्रिया-कलाप को अनुशासित कर देता है।मन प्रसन्न है तो ठीक है पर यदि मन खिन्न है तो मन प्रसन्न होना चाहिए; किन्तु यह हो कैसे? इसके लिए मनोयोग होना चाहिए। किसी कार्य में मन रमने का बहाना या प्रेरणा होनी चाहिए और यदि ऐसा कार्य, धार्मिक निष्ठा से जुड़ा हो, भक्ति और उपासना से जुड़ा हो तब तो फिर सच्चिदानन्द की अनुभूति ही हो जाती है। तो फिर चलते हैं ऐसे ही माध्यम की ओर अर्थात् रामनगर की मास पर्यन्त रामलीला की ओर। ऐसी रामलीला, जिसके बारे में बहुत कुछ लिखा, सुना गया है, विशेषताएँ सर्वत्र व्याख्यायित हैं; इसे फिर एक नयी दृष्टि से देखने का प्रयास करते हैं। आखिर किस प्रकार से एक नाट्य मंचन का उपक्रम जीवनचर्या, (वह भी सैकड़ो-हजारों) की बन जाती है, दैनिक कार्यक्रम एवं क्रिया-कलाप को अनुशासित कर देता है। इन सबके मूल में लोगों की निष्ठा के साथ-साथ अपने अनोखे और सहज रूप में लीला दर्शन-श्रवण में मिलने वाला रस ही वह कारण है जिसके विधिवत् (रस) पान हेतु लोग लगन से तैयार होते हैं। कुछ ऐसे तुलना करके देखा जा सकता है कि एक ओर यदि आप किसी उत्सव या मनोरंजन के लिए तैयार होते हैं और एक लीला देखने के लिए। दोनों ही प्रकार के मनोभावों का अन्तर दन्तचित्त होने का परिणाम देता है। आप अच्छे वस्त्र, इत्र, सुगन्ध, रूप-सज्जा किसी अन्य उत्सव के लिए करते हैं तो भी एक अजीब से उहापोह में कि यह रंग कैसा लगेगा, इस डिजाइन का पहनूं कि उसको, चिन्ता भी रहती है कि कहीं खराब तो नहीं लगेगा, लोग क्या कहेंगे आदि-आदि। किन्तु इसके उलट लीला के लिए तैयार होते समय एक सुखद निश्चिन्तता रहती है। कोई ड्रेस कोड तो लीला के लिए बना नहीं है किन्तु इसकी पुरातनता ने ही कहीं न कहीं इसका निर्धारण कर दिया है। पहले जब पैण्ट-शर्ट नहीं था पाश्चात्य वस्त्रों का प्रचलन कम था ना के बराबर था और कुर्ता-पाजामा या धोती-कुर्ता सिर पे पगड़ी या साफा ही अपने यहाँ के पहनावे थे, तब से लेकर समय के और फैशन के बदलने के बावजूद यह देशी पहनावे, लीला देखने वालों खासकर नेमीजन के ड्रेस कोड बन चुके हैं। सुगंध, खुशबू के लिए वर्तमान के ‘डियो’ (क्मवकनतमदज) और ‘सेन्ट’ आज भी लीला में प्रयुक्त इत्र और खस के आगे त्याज्य हैं। जलपान के लिए भी आज के फास्ट फूड और ‘रोल’ कल्चर पर नेमीजन का पारम्परिक कचैड़ी, जलेबी, खीरमोहन, देशी घी के बने अनेकों खालिस देशी पकवान सदा ही भारी पड़ते हैं। ऊपर के सभी उपक्रम, अर्थशास्त्र की भाषा में उत्पादक और उपभोक्ता सभी को अनुशासित कर देते हैं। जैसे कि सायंकाल प्रारम्भ होने वाली लीला के लिए अनेक नेमीजन दोपहर से ही तैयारियों में लग जाते हैं। रामनगर से दूर-दराज विशेषकर गंगा पार-बनारस से आने वाले अपने काम-धन्धे को आधे दिन (12 बजे तक) समेटना शुरु कर देते हैं या दूसरे को जिम्मेदारी देकर खुद निवृत्त हो जाते हैं और इसके बाद पूरे मनोयोग से बचे समय को अपनी लीला की दिनचर्या में लगा देते हैं। ऐसे नेमीजन मास पर्यन्त दोपहर के बाद रामनगर पहुंुचना शुरू हो जाते हैं। रामबाग के पास (दुर्गा मन्दिर) के पोखरे पर नहा-धोकर शाम की लीला के लिए तैयार होने का काम बिना नागा पूरे महीने चलता है। नहा-धोकर अल्पाहार के रूप में भांग-बूटी, ठण्डई, मलाई आदि का सेवन करते हैं और फिर सम्बन्धित दिन की लीला जहाँ होनी होती है, वहाँ के लिए प्रस्थान करते हैं। यह ध्यान देने योग्य बात है कि इस तैयार होने में नेमीजन अपने कपड़े धोकर सुखने से लेकर बूटी और ठण्डई पीसने तक का काम खुद ही करते हैं। रात में लीला समाप्त होने पर नेमीजन अपने-अपने पसन्द की दुकानों पर अल्पाहार लेकर घर को प्रस्थान करते हैं और दूर-दराज के ये लोग देर रात तक घर पहुंचकर अपनी इस लीला की दिनचर्या को विराम देते हैं। फिर ये नेमीजन सुबह उठने के बाद और पुनः दोपहर में ही लीला के लिए निकल जाने के बीच अपने परिवार और कार्य के बीच कितना समय व्यतीत कर पाते होंगे, यह स्वतः ही समझ में आ जाता है। इसी तरह लीला के दौरान क्षेत्र के दुकानदार भी सामाग्री तैयार करने और दुकान लगाने अर्थात् अपनी तैयारी में उलझे रहते हैं। यह उलझन खिन्न करने वाली न होकर सन्तुष्टि और लाभ देने वाली होती है।इस तरह से यह स्पष्ट पता चलता है कि लीला में जो भी नेमीजन पूरे महीने एक रंगरूट की जीवनशैली में रहता है और हर क्षण जबान पर वजह के रूप में सिर्फ और सिर्फ ‘लीला’ ही होती है। नेमीजनों को अन्य कोई दुःख, कष्ट, चिंताए नहीं रहती है बस एक ‘करज’ रहता है। इस दौरान यह निष्ठा लोगों के जीवन को गजब के अनुशासन और लगाव से भर देती है और हर कोई ऐसी परिश्रम वाली जीवनचर्या बिताने के लिए आतुर सा रहता है क्योंकि इसे ‘लीला’ समाप्ति के बाद उन सभी नेमीजनों की अगली ‘लीला’ के इन्तजार की व्यग्रता, लालसा, उत्कण्ठा में खूब भली प्रकार से देखा जा सकता है। रामलीला की इन्हीं विशिष्ट लीला प्रेमियों में से प्रस्तुत है कुछ लीला प्रेमियों का संक्षिप्त परिचय एवं रामलीला के दौरान की जीवनशैली-

श्री अप्रमेया प्रसाद सिंह – रामलीला में नेमियों का अपना अलग ही महत्व है। रामलीला के दौरान प्रसंगों के मंचन में महाराज के सबसे नजदीक हाथी के पास खड़े अप्रमेया प्रसाद सिंह सहज ही लीला प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहते हैं। एपी सिंह के पूर्वज रामनगर महाराज के बेहद करीबी रहे हैं। एपी सिंह बताते हैं कि राजपरिवार से हमारा संबंध राजा बलवंत सिंह के समय से है, जो महीपनारायण सिंह के समय भाई-भतीजे के रिश्ते में कायम रहा है। बताया कि ‘आज भी हमारे परिवार को राजपरिवार की तरह किले से रामलीला देखने के लिए हाथी मिलता है जिस पर मेरे बड़े भाई ज्योत्सना प्रसाद सिंह उर्फ ज्योति बाबू बैठते हैं।’ हालांकि एपी सिंह खुद कभी हाथी पर बैठकर लीला नहीं देखे। उनका मानना है कि भगवान राम पैदल वनगमन करते हैं। इसलिए हाथी पर बैठकर लीला देखना उचित नहीं है। आपने बताया कि ‘‘रामलीला में हाथी और हौदे का भी बहुत महत्व है। हौदे से ही ओहदे की पहचान होती है। हमारे परिवार को हाथी पर बैठने के लिए नीमखासा हौदा मिलता है।’’

लखन लाल जौहरी- रामनगर की रामलीला में महाराज के हाथी के पास रामायणी दल के ठीक बगल में हाथ में शेर के मुंह वाली आकृति की चांदी के मुठिया वाली छड़ी और ठेठ बनारसी वस्त्र (गंजी धोती) पहने मुंह में सुगन्धित बनारसी पान दबाये और इत्र की खुशबू बिखेरते लखन लाल जौहरी को स्वतः ही देखा जा सकता है। हाथ में रामायण का गुटका लिये चैपाई दर चैपाई रामायणी दल के साथ रामायण पाठ करते देख वह सहज ही लोगों को आकर्षित करते हैं। रामलीला में अपने लगाव और आने के बारे में बताया कि सन् 1962 से वह रामलीला में लगातार आ रहे हैं। सितम्बर माह 71 वर्ष के हुये लखन लाल जौहरी ने अपनी निरंतरता का श्रेय भगवान श्रीराम के प्रति अगाध श्रद्धा को दिया। दादा चुन्नी लाल हीरा तराश से मिली प्रेरणा और बड़े पिता सीताराम जौहरी और रामशरण जौहरी के विरासत को सम्भालना लखन लाल जौहरी परम सौभाग्य की बात मानते हैं। रामलीला में आने के लिए प्रत्येक वर्ष लखन लाल एक माह के लिए भोपाल और हैदराबाद में स्थापित हीरे और आभूषण के अपने कारोबार को छोड़ काशी में ही रहते हैं। रामलीला में आने के लिए प्रतिदिन की तैयारी के सम्बन्ध में बताया कि 12 बजे दिन से ही रामनगर चलने की तैयारी शुरू कर देते हैं जिसमें धोती, गंजी, साफा बनाना, पान का डिब्बा, इत्र की शीशी तैयार करना और नहा धोकर ठंडई छानकर 4ः30 बजे तक लीला स्थल पर पहुंच जाते हैं। पुत्र विशाल जौहरी उर्फ बोबू भी अपने इस परिवार की परम्परा को पिता के साथ निभाना आरम्भ कर दिये हैं। पिछले 15 वर्षों से वह भी रामलीला में नियमित आ रहे हंै।

श्री फूलचन्द यादव– रामनगर की रामलीला जितनी विशिष्ट है उतने ही विशिष्ट है उसमें लीला प्रेमी प्रभु के प्रति श्रद्धा व्यक्त  करने  के  लिए  इनके अलग-अलग माध्यम हैं। इन्हीं में से एक हंै फुलचन्द यादव। बनारस के बीबी हटिया मोहल्ले में रहने वाले फुलचन्द रामनगर की रामलीला में दौड़कर जाते हैं और दौड़कर ही वापस आते हैं। जाने वाले और न जाने वाले सभी के लिए उत्सकुता का केन्द्र बनने वाले फुलचन्द यादव को राह में लोग अपने साथ बैठाकर या साधनों द्वारा ले जाने के लिए कहते भी हैं तो ये उन्हें मना कर देते हैं। अपने इस अनोखे समर्पण और रामलीला में आने की शुरूआत के सम्बन्ध में फुलचन्द ने बताया कि बचपन में कक्षा 2 की किताब में ‘सीता की खोज’ कहानी पढ़ी और फिर दादा नानक सरदार के साथ रामलीला आना शुरू हुआ पहले नाव से दादा जी के साथ आते थे फिर साईकिल से आना शुरू हुआ। दौड़कर आने व पैदल आने की शुरूआत एक घटना से हुई जब 1973-74 तक यह कुछ लोगों के साथ आते थे। इस बीच एक बार रामजन्म की आरती छूट गई। आरती छूटने का दुःख इतना ज्यादा हुआ कि उसी दिन तय कर लिया कि अब किसी का साथ नहीं लेंगे और अकेले ही जायेंगे। रामलीला के दौरान 12 बजे दोपहर में घर से निकल जाते हैं और 1ः30 बजे तक रामनगर दुर्गा जी पोखरा पर पहुंचना होता है। जहां दुपट्टा, धोती धोकर सुखने के लिए फैला दिया जाता है और फिर शुरू होता है नहाने, निपटने और ठंडई पीने का क्रम इन सभी कार्यों से निवृत्त हो 4ः30 बजे तक लीला स्थल पर पहुंचना होता है। अपनी धुन के इतने पक्के की आरती समाप्त होना, रामायण बन्द होना, स्वरूपों का माला उतरना, हाथी का घुमना और फुलचन्द जी का वापस घर की तरफ चल देना लगभग एक साथ होता है। फुलचन्द ने बताया कि पहले यह दूरी 25 से 30 मिनट में तय करते थे पर अब अवस्था के कारण 40 मिनट तक समय लग जाता है। महीने भर की अपनी इस दिनचर्या के लिए फुलचन्द ने बताया कि खान-पान ठंडई पर 10 हजार रूपये से अधिक खर्च हो जाते हैं। वर्तमान में 63 साल के फुलचन्द की इस ऊर्जा और आस्था के लिए उन्हें सम्मानित भी किया जा चुका है। पिछले वर्ष 24 नवम्बर को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में राजकुमारी जी द्वारा बुलाये जाने पर कुलपति ने सम्मानित किया था। फुलचन्द ने अपने यादगार दिन के बारे में बताया कि एक बार काशी नरेश विभूति नारायण सिंह से उनकी मुलाकात पंचगंगा घाट पर हुई थी। जहां महाराज ने अपनी माला उतारकर उनके गले में पहना दी थी और कहा कि ‘रामनगर आना मत छोड़ना’।