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रामनगर का इतिहास

इतिहास लेखन को लेकर विद्वानों में तमाम मतभेद समय पर उभरते रहे हैं कभी तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों की उपेक्षा के रूप में तो कभी उद्गम काल के संदर्भ में संदेह के रूप में। हांलाकि तार्किक रूप से वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर ऐसे संदेह कम तो जरूर हुए हैं। कुछ यही स्थिति कमोबेश बनारस के इतिहास को भी लेकर है। इतिहास-साहित्य के मेल ने एक बीच का रास्ता निकाला, यह था ‘प्राचीनतम् से भी प्राचीन‘ का।

दूसरी तरफ पौराणिक आधार स्वयमेव सदैव से निश्चित रहा है-‘शिव की काशी‘ के रूप में। कुल मिलाकर तथ्य यह है कि हमें जब भी बनारस के इतिहास की बात करनी होगी तो इतिहास-साहित्य के साथ वैदिक-पौराणिक साक्ष्यों को भी समान महत्व देना पड़ेगा। अर्द्धचन्द्राकार रूप में गंगा तट पर बसी यह नगरी न सिर्फ अपनी संरचना के आधार पर बल्कि अपनी वैविध्यपूर्ण संस्कृति के आधार पर भी प्राचीनतम लेकिन अनोखेपन की दास्तां बयां करती है। जब बात ‘वैविध्यपूर्ण संस्कृति‘ के साथ ‘अनोखेपन‘ की हुई है तो नगर के दक्षिणी-पूर्वी छोर की बात करना महत्वपूर्ण हो जाता है। दक्षिण दिशा में गंगा नदी के दूसरे किनारे पर एक ‘उपकाशी‘ भी बसती है जिसका आधार औघड़दानी शिव नहीं बल्कि अयोध्यापति प्रभु राम हैं…. यह नगरी रामनगर है। काशी का रामनगर।

वैज्ञानिक-पुरातात्विक साक्ष्य जो भी हों, रामनगर का इतिहास यहां की रामलीला का इतिहास है, ऐसा कहना अतिशयोक्ति नहीं। कानों सुनी आंखो देखी बातों पर विश्वास करें तो हां समय काल के बन्धन में जरूर इस नगरी को बांट सकते हैं। लेकिन चीजें कल्पना से परे भी अस्तित्व में रहती हैं, यहीं यथार्थवाद है यहीं एकमात्र सत्य है। इस स्थान की पवित्रता की गवाह कोई और नहीं स्वयं निजबोध रूपा माँ गंगा हैं जो अपने दूसरे छोर पर सिर्फ प्रभु राम की गाथा गाती इस नगरी को सहेजे हुए हैं। पौराणिक साक्ष्य काशी क्षेत्र में गंगा के दोनों किनारों के अधिपतियों को निर्धारित करते हैं- वामाधिपति शिव हैं तो दक्षिणाधिपति राम।

काशी और गंगा का संबंध सदियों से रहा है। यह नदी काशी के लिए सिर्फ जलस्रोत के रूप में नहीं रही है बल्कि गंगा काशी के सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और धार्मिक आधार का केंद्र बिंदु रही है। भौगोलिक रूप से भी इस शहर की जो सूरत हमारे सामने है वह गंगा की वजह से ही है। क्योंकि अनेकों सहस्त्राब्दियों से निरंतर प्रवाहित होने वाली धारा के साथ आयी मिट्टी ने यहां के भौगोलिक रूप को परिवर्तित किया है। भौगोलिक संरचना की दृष्टि से काशी क्षेत्र मध्य गंगा घाटी में स्थित है। गंगा जो भारत के उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की ओर हिमालय की विशाल श्रृंखला के लगभग समानान्तर बहती है। इस प्रवाह के साथ ही गंगा हिमालय क्षेत्र से अपने साथ लाती हैं खनिजों से युक्त मिट्टी। काशी में गंगा के बायें तट पर स्लेटी बालू व दोमट के रूप में पहचाना गया है, जबकि दक्षिण यानी विन्ध्य व कैलाश क्षेत्र से आयी मृदा का जमाव रामनगर (गंगा के दाहिने तट) पर लाल जमाव के रूप में देखा जा सकता है। गंगा का दाहिना तट, जहाँ रामनगर स्थित है, कुछ नीचा है। काशी की जीवनरेखा गंगा नदी रामनगर से बहती हुई उत्तर दिशा में अद्र्वचंद्राकार घुमाव रूप लिए हुए है। इसकी वजह से पूरा शहर जो गंगा के घुमाव पर बसा हुआ है वह रामनगर के सामने घाटों पर देखा जा सकता है। वैज्ञानिक अध्ययनों से प्राप्त साक्ष्यों से तिथियों के आधार पर यह माना जा सकता है कि आज से लगभग 40000 वर्ष पूर्व गंगा काशी में प्रवाहित होने लगीं थीं। लगभग सात हजार वर्ष पहले काशी की भूसंरचना में आमूल बदलाव आया।

        गंगा के दाहिने तट यानी रामनगर का अध्ययन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और ज्ञानप्रवाह के संयुक्त तत्वावधान में श्रीमती विदुला जायसवाल के निर्देशन में वर्ष 2005 तथा 2006 में किया गया। इस अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष निकला कि लगभग 3 किलोमीटर का गंगा तट प्राचीन भूमिगत आवासीय अवशेषों से युक्त है। राजा बनारस का आवास रामनगर कोट प्राचीन किले के पूर्वी भाग पर स्थित है। साथ ही यह पूरा जमाव कई स्थानों पर प्राकृतिक कारणों से भी कटे हुए हैं। जैसे- कुत्ता घाट, गोलाघाट, उड़िया घाट है। इनमें से दो घाट ओड़िया व गोला-पुरातात्विक व भूगर्भ शास्त्रीय अन्वेषण के प्रमुख क्षेत्र हैं। रामनगर व्यापार का भी केंद्र रहा है। उड़िया घाट पर हुए उत्खनन से यह प्रमाणित है कि जनपदकालीन विशिष्ट मृदा-पात्र जिनका व्यापार किया जाता था, यह पात्र उत्तर कृष्ण मार्जित मृदभाण्ड परम्परा के नाम से जाने जाते हैं। प्राचीन रामनगर अर्द्धमूल्यवान पाषाण मनकों के उत्पादन का महत्वपूर्ण केन्द्र था जो अन्य नगरों में निर्यात किये जाते रहे होंगे।

        रामनगर किले के पास दक्षिणपश्चिमी भाग में गोला घाट तथा उड़िया घाट का उत्खनन कर लगभग 30 मीटर के जमाव का यहाँ दो खण्डांे में अध्ययन किया गया। ऊपरी सतह से लगभग 10 मीटर का जमाव पूरे अवशेषों से युक्त था, जो पुरातात्विक विधि से खोदा गया, जबकि नीचे का 20 मीटर मोटा जमाव मानवीय आवास के पहले का था तथा गंगा नदी के इतिहास से लिए महत्वपूर्ण था।रामनगर का इतिहास        रामनगर भौगोलिक रूप से आयात-निर्यात के लिए बेहद उपयोगी था क्योंकि यह स्थान गंगा के तट पर बसा होने के कारण जल मार्ग से दूर क्षेत्रों व अन्य राज्यों से जुड़ा था। उत्तर में राजघाट एवं सारनाथ (जनपद काल, मौर्यकाल, गुप्तकाल में अति समृद्ध था) वहीं बीस किलोमीटर दक्षिण में स्थित अहरौरा अशोक अभिलेख इस बात का प्रमाण है कि यहां व्यापार मार्ग अथवा समृद्ध स्थलीय मार्ग रहा होगा जिसके बीच रामनगर का क्षेत्र एक व्यापार केन्द्र या बर्तनों के निर्यात का तत्कालीन केन्द्र रहा होगा।

        ‘‘रामनगर का सांस्कृतिक व ऐतिहासिक महत्व जातक कथाओं से भी प्रमाणित है। एक जातक कथा कच्छप जातक में बोधिसत्व को कुम्भकार के गांव में जन्मा बताया गया साथ ही इनको मृदभाण्ड के व्यापार द्वारा पत्नी व दो बच्चों के पालन का श्रेय भी दिया गया है। उनको कई सेवक/सेविकाओं का स्वामी तथा अमूल्य सोने का स्वामी बताया गया है। वर्णन के अनुसार उनका गांव वाराणसी की विशाल नदी के तट पर स्थित एक विशाल झील के पास स्थित था। यह झील नदी के इतने पास थी कि अधिक वर्षा के समय नदी व झील का जल एक दूसरे में मिल जाता था। ऐसे में झील के जीवजंतु नदी में चले जाते थे। कथा का मुख्य पात्र एक कछुआ था। कथा आगे एक उपदेश के रूप में बढ़कर समाप्त हो जाती है। इस जातक कथा में, काशी राज्य में वाराणसी के पास कुम्भकारांे के गांवों का उल्लेख है। साथ ही मृदा पात्र के समृद्ध व्यवसाय व व्यापार का भी स्पष्ट उल्लेख मिलता है। रामनगर के पुरातात्विक साक्ष्यों में इन जातक कथाओं की झलक मिलती है।’’

(प्रो0 विदुला जायसवाल के लेख में वर्णित)

        रामनगर का उड़िया घाट गंगा के दाहिनी तट पर वाराणसी के पास स्थित है। ओरियाघाट के उत्खनन में झील का स्पष्ट अस्तित्व मिलता है। एक झील के सूखने के बाद उसकी तलहटी पर रामनगर का प्रारम्भिक स्थान स्थित था। महत्वपूर्ण बात यह है कि झील के सूखी तलहटी के ऊपर स्थित आवासीय स्तर ई0पूर्व तृतीय शताब्दी के हैं। इसके अनुसार जनपदकालीन प्रथम बस्ती झील पर स्थित थी। जनपदकालीन विशिष्ट पात्रों की कार्यशालायें भी उड़िया घाट में अत्यन्त सक्रिय थी। जिनके उत्पाद का भी निर्यात होता था।

ं      काशी-राजघाट की तरह ही रामनगर का उड़िया घाट मुहल्ला भी जनपद काल से स्थापित था। कुषाण काल का पूर्वार्द्ध (लगभग ईसवी के प्रारम्भ से द्वितीय शताब्दी ई0 तक) रामनगर के इतिहास का गौरव काल था, क्योंकि यहाँ के चतुुर्थ सांस्कृतिक काल से काशी-राजघाट के समान ही ईटों की वास्तु संरचनाएं सामने आई हैं। पुरावस्तुओं के स्वरूप तथा सिक्कों व मुहरों के आधार पर यह बस्ती भी व्यापारिक केन्द्र प्रतीत होती है। रामनगर के राजनैतिक इतिहास को जानने के लिए राजवंश का जानना आवश्यक है। क्योंकि यहां के राजनीति में राजवंश के अलावा किसी का हस्तक्षेप नहीं रहा है। काशी से 5 कोस दक्षिण कशवार परगने के थिथरिया (वर्तमान गंगापुर) में श्री ‘मनोरंजन सिंह नाम के एक गौतम भूमिहार जमींदार रहते थे जिनके बड़े लड़के मनसाराम ने मीर रुस्तम अली के यहां नौकरी कर ली। ये बड़े योग्य, चतुर और बुद्धिमान् थे। कुछ ही समय में ये मीर रुस्तम अली के विश्वासपात्र हो गये। मीर रुस्तम अली के संबंध में लखनऊ में नवाब सआदत खां के कान भरे जाने लगे। उधर मालगुजारी का रुपया देर से जाने लगा जिससे रुष्ट होकर नवाब ने अपने नायब सफदर जंग को सन् 1738 ई0 मी मीर से रुपये लेने को भेजा, जिसने जौनपुर में अपना पड़ाव डाला। बुद्धिमान श्री मनसाराम ने इस अवसर पर मीर की आज्ञानुसार जौनपुर जाकर नायब को बहुत कुछ समझा बुझा कर उनका क्रोध शान्त किया। इधर मनसाराम के विपक्षियों ने मीर को उनके खिलाफ भड़काना शुरू कर दिया। जब इस बात का पता मंशाराम को चला तो वे सोच में पड़ गये। चतुर मंशाराम ने एक नया प्रस्ताव नायब के सम्मुख रखा जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। मनसाराम ने तेरह लाख वार्षिक पर बनारस, जौनपुर, और चुनार के परगनों को अपने पुत्र श्री बलवंत सिंह के नाम लिखा लिया। पिता का सब कार्य कर बलवंत सिंह ने इलाहाबाद के सूबेदार अमीर खां के द्वारा अपना एक आदमी दिल्ली भेजा जिसने श्री बलवंत सिंह के दिये 21,775) रुपये नजर बादशाह मुहम्मदशाह को भेंट किये और उनसे राजा की पद्वी तथा तीन जिलों का पट्टा लिखवा लिया। अब राजा बलवंत सिंह ने गांव का नाम बदल कर गंगापुर रखा और वहां पर एक किला बनवाना आरंभ किया जिसके तीन तरफ खाई खोदी गई और एक तरफ से रास्ता रखा गया। राज्य को दृढ़ करने और उसका विस्तार बढ़ाने में यह सदा लीन रहते थे। सन् 1750 ई0 में गंगा के दाहिने किनारे पर रामनगर का किला बनवाया। 22 अगस्त सन् 1770 ई0 में प्रतापी राजा बलवंत सिंह की मृत्यु हो गई। वर्तमान में इसी राजवंश के लोगों का रामनगर किले पर अधिकार है। साथ ही रामलीला सहित अन्य परम्पराओं को राजवंश की ओर से निभाया जा रहा है।