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रामनगर की रामलीला : परम्परा एवं अनुशासन

रामनगर की रामलीला में पारम्परिक रूप से समस्त प्रक्रियाओं को आज दो सौ से अधिक सालों बाद भी यथावत दोहराया जा रहा है तथा इनके पालन में यथोचित सावधानियां भी बरती जाती हैं। रामलीला की परम्परा के अनुपालन में  पारम्परिक स्वरूप को लीला के प्रारम्भ से ही देखा जा सकता है। जैसे- पंचस्वरूपों का चयन, प्रथम गणेश पूजन, द्वितीय गणेश पूजन, रामलीला पक्की पर रामचरित मानस का पाठ, पात्रों की वेशभूषा, साज सज्जा, पात्रों का खान-पान, आचरण, प्रशिक्षण सब कुछ एक निश्चित परम्परा के अनुसार चल रहा है।

        रामलीला के पांच मुख्य पात्रों का चयन रामनगर किले में स्वर परीक्षा के बाद महाराज करते हैं, जिनमें राम सीता, भरत, लक्ष्मण शत्रुघ्न के स्वरूपों का चयन, अनेक बार चालीस, पचास यज्ञोपवीती ब्राह्मण कुमारों के बीच से होता है। जिनमें बालकों को उनके वाणी, वर्ण, आयु शारीरिक कोमलता (वपु) आदि के अनुसार चयनित किया जाता है। पंचस्वरूपों का स्वर परीक्षण व चयन की समस्त प्रक्रिया अब तक परम्परा के अनुसार महाराज बहादुर के समक्ष होता है। इसके अनन्तर श्रावण मास (सावन) के कृष्ण पक्ष में गणेश चतुर्थी के दिन ज्योतिर्विदों द्वारा निर्धारित मुहूर्त में प्रथम गणेश पूजा की जाती है। रामनगर चैक स्थित ‘पक्की‘ पर यह पूजन सम्पन्न होता है। जिसमें हनुमान और गणेश के मुखौटे को नये पीढ़े पर रखकर उसके बगल में लाल वस्त्र में बंधी रामलीला की पोथी, लिखित संवाद पुस्तक, दर्जी की कैंची, बढ़ई का बसूला, हथौला आदि, रंगसाज की रंग कूचिका, तूलिका आदि शिल्प सामग्री (औजारों) रखी होती है। साथ हीं पांचो स्वरूप राम, सीता, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न के साथ वशिष्ठादि पूज्य महर्षि पात्रों की भी पूजा की जाती है। किले के प्रतिनिधि के तौर पर ट्रस्ट का मैनेजर या लीलाधिकारी (वर्तमान में डाॅ0 जय प्रकाश पाठक) पूजा पर बैठते हैं तथा  लीला के व्यास पं0 लक्ष्मी नारायण पाण्डेय पूजन सम्पन्न कराते हैं। पंचस्वरूपों को तिलक लगाकर माला पहनाई जाती है। ब्रह्मा का एक संवाद- ‘ऐ पुत्र। तुम मन इच्छित वर मांगो…..’ होता है। जिसका तात्पर्य है कि पोथी पढ़ने का शुभारम्भ हो गया है। पूजन के अन्त में पोथी, गणेश तथा हनुमान के मुखौटों की आरती की जाती है। इस पूजा के साथ ही पांचों मुख्य स्वरूपों का प्रशिक्षण बलुआ घाट स्थित धर्मशाला में प्रारम्भ हो जाता है। पात्रों में प्रशिक्षण काल से ही रामादि की भावना और गौरव का प्रारम्भ हो जाता है। पंचस्वरूपों को उनके नाम से यथा- राम, सीता, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न ही पुकारा जाता है। पात्रों में भी परस्पर वैसा ही व्यवहार प्रारम्भ हो जाता है। जैसे- राम के उठ खड़े होने पर अन्य सभी पात्र भी खड़े हो जाते हैं। पंचस्वरूपों को संवाद प्रशिक्षण के दौरान संवाद समाप्त होने पर गुरू (पंचस्वरूपों के व्यास) के समक्ष सिर झुकाकर प्रणाम करना होता है। जो रामलीला मे अनुशासन का अद्भुत उदाहरण है।

        इसके बाद फिर भाद्र पद के कृष्ण पक्ष को द्वितीय गणेश पूजा आयोजित की जाती है जिसमें गणेश की मूर्ति के अतिरिक्त रामचरितमानस की पूजा होती है। इसके बाद से रामलीला के शुरूआत तक इसी पक्की पर बारह रामायणियों का दल बालकांड के उन 175 दोहों का सस्वर पाठ करता है जिनका मंचन रामनगर की रामलीला में नहीं किया जाता है। प्रधान रामायणी की अगुवाई में 12 रामायणी एवं एक मृदंग वादक के दल द्वारा झांझ की आवाज में ‘‘नारदी‘‘ या नारद वाणी में सस्वर रामचरितमानस का पाठ किया जाता है। विनय पत्रिका का आदि विनय (गाइए गणपति जगबन्दन) का ताल सहित सस्वर पाठ कर गणेश जी को प्रणाम करते हैं। तदोपरान्त मानस बालकाण्ड के आदि मंगलाचरण ‘वर्णानाम् अर्थसंघानाम्‘ इत्यादि का मंगल श्लोक पाठ करके इस पारायण अनुष्ठान का श्रीगणेश होता है। दस दिनों तक होने वाले इस रामचरितमानस पाठ में क्रमशः प्रथम दिन 7 दोहे बालकाण्ड के प्रारम्भ से सातवें दोहे तक दूसरे दिन 13 दोहे- बालकाण्ड के आठवें दोहों के प्रथम चैपाई से 20वें दोहे तक, फिर 20 दोहो के हिसाब से तीसरे दिन बालकाण्ड के 21वें की प्रथम चैपाई से 40वें दोहे तक चैथे दिन 41वें दोहे के प्रथम चैपाई से 60वें दोहे तक पाँचवे दिन 61वें दोहे के प्रथम चैपाई से 80वें दोहे तक 6वें दिन बालकाण्ड की 81वें दोहे की प्रथम चैपाई से 101वें दोहे तक 7वें दिन बालकाण्ड के 101वें दोहे की प्रथम चैपाई से 120 (घ) सोरठा तक 8वें दिन बालकाण्ड के 121वें दोहे के प्रथम चैपाई से 140वें सोरठा तक 9वें दिन बालकाण्ड के 141वें दिन के प्रथम चैपाई से 160दोहे तक तथा 10वें दिन बालकाण्ड के 161 दोहे की प्रथम चैपाई से 175वें दोहे तक। प्रतिदिन प्रसंग समाप्त होने पर कर्पूर की आरती होती है। यह गायन आदि से अन्त तक केवल नारद वाणी में होता है। इस रामलीला के अनुष्ठान के प्रथम प्रतिष्ठा संकल्प मे प्रजा, परिजन, पुरजन, राष्ट्र, देश, कोष, सेना, सचिव तथा पुत्र-पत्नी सहित राजपरिवार के कल्याण की कामना और रामभक्ति की प्राप्ति की योजना रहती है। अतः इसे कामना अनुष्ठान भी कहा जा सकता है। इसके बाद बालकांड के 176वें दोहे से रामनगर की रामलीला की विधिवत शुरूआत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष में अनंत चर्तुदशी से होती है और आश्विन मास के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तक अनवरत चलती है।

        रामनगर की रामलीला की कुछ ऐसी परम्परायें हैं जिनको किसी भी हाल में तोड़ा नहीं जाता और इसलिए ही इस रामलीला का महत्व और बढ़ जाता है। यहाँ की रामलीला पूरी तरह रामचरित मानस के पाठ पर आधारित है। पूरा रामचरित मानस पढ़ा जाता है। लेकिन जिस पाठ को रामलीला में अभिनीत नहीं किया जाता उसको अलग से पढ़ा जाता है। जैसे रामनगर की रामलीला में दशरथ मरण का प्रसंग नहीं मंचित किया जाता है अतः इस हिस्से का पाठ रामलीला के दौरान नहीं किया जाता लेकिन प्रधान रामायणी यह पाठ रामलीला समाप्ति के बाद प्रभु नारायण इण्टर कालेज के सामने स्थित प्रसिद्ध कूप के पास बैठकर पूरा करते हैं। श्रीरामचन्द्र के राज्याभिषेक के बाद अयोध्या में जाने पर मंगलाचरण के बाद उत्तर काण्ड समाप्त हो जाता है। श्रीराम जी की आरती के बाद चरित्र प्रदर्शन और पारायण दोनों की समाप्ति हो जाती है। इस लीला को निर्वघ्न पूर्ण होने के लिए अनंत चर्तुदशी से आश्विन शुक्ल पूर्णिमा तक दुर्ग स्थित देवी मंदिर में दुर्गा सप्तशती का ब्राह्मण द्वारा पाठ भी कराया जाता है इसके अनन्तर कार्तिक कृष्ण पक्ष में प्रथम या द्वितीय मंगलवार को पूरी लीला के दौरान रामचरित मानस के पाठ में हुई गलती को सुधारने के लिए पूरी रामलीला के समाप्त होने के बाद रामचरितमानस का एक आवृŸिा पारायण पुनः ब्राह्मण द्वारा कराया जाता है। यह पाठ दुर्ग के दक्षिण खिड़की के हनुमान जी के मंदिर पर होता है। जिसके समाप्त होने पर रामलीला के व्यास पं0 लक्ष्मीनारायण पाण्डेय अयोध्या जी के लीला भूमि में श्री हनुमान जी का मुखौटा रखकर गणेश आदि पूजन पूर्वक हवन करके श्री रामलीला अनुष्ठान की पुर्णाहुति करते हैं। इस प्रकार रामचरितमानस के गूढ़ अनुष्ठान का प्रारम्भ और उसकी समाप्ति होती है।

        रामलीला में राजसी परम्पराओं का पूरा ख्याल रखा जाता है। परम्परा के अनुसार काशिराज कई लीलाएं नहीं देखते जैसे कैकेयी कोपभवन, सीताहरण आदि। ऐसी मान्यता है कि एक राजा दूसरे राजा का दुःख नहीं देख सकता। उसी तरह श्रीराम राज्याभिषेक के दिन काशिराज पैदल चलकर लीला स्थल पहुँचते है और श्रीराम को राजतिलक लगाते है क्योंकि कोई राजा ही किसी होने वाले राजा का राजतिलक कर सकता है।

        रामलीला की कई ऐसी विशेषतायें है जो निर्वहन होते-होते परम्परा का रूप ले चुकी हैं और इन्हें बखूबी और कड़ाई से निभाया जा रहा है। श्रीराम और सीता के विवाह के पूर्व एवं सीताहरण के बाद तक श्रीराम, सीता अलग-अलग रहते हैं और लीला स्थल तक भी अलग-अलग साधनों (रथों से) जाते हैं। बनगमन के बाद भरत शत्रुघ्न को श्री राम, सीता और लक्ष्मण से अलग रखा जाता है। बलुआ घाट में जब इनका प्रशिक्षण रघुनाथ दŸा व्यास के सानिध्य में चलता है तो वहाँ एक परिवार की मर्यादा निभाई जाती है। जैसे-सो कर सबसे पहले राम उठेंगे उसके बाद क्रमानुसार और सब शीश नवाकर ही बैठते हैं। प्रशिक्षण के दौरान ही सभी मुख्य पात्रों को चारित्रिक नामो से पुकारा जाता है। जैसे-रामजी, जानकीजी इत्यादि।

        रामलीला के दौरान भी समाज में प्रचलित मान्यताओं को दुहराया जाता है, जैसे-श्रीराम के जन्म के समय गवनहारियों द्वारा सोहर गाना, श्रीराम और उनके भाईयों की शादी पर बारात का जाना वहाँ खिचड़ी खाना और जनकपुर में उपस्थित महिलाओं द्वारा मंगल गीत गाया जाना और खिचड़ी के दौरान जनक जी दहेज भी देते हैं, चाहे वह सांकेतिक रुप में ही सही।

        सम्प्रेषण के माध्यम के रुप में रामलीला का यह प्रभाव पड़ता है कि रामलीला के दौरान पूरा नगर जैसे राममय हो जाता है। पूरे माह तक धर्म और अध्यात्म की नदी बहती है और ऐसा लगता है जैसे हर कोई इस नदी में गोते लगाने को आतुर हो। किसी भी पात्र के संवाद बोलने के पहले व्यास द्वारा यह कहना कि, ‘‘चुप रहो…..सावधान…..‘ इतने पर हजारों की भीड़ शान्त हो जाती है और उस पात्र का संवाद दूर तक सुनाई पड़ता है।

        श्रीराम के साथ लीला देखते-देखते ऐसा तादात्म्य स्थापित हो जाता है कि कई जगहों पर मार्मिक संवाद को सुनकर लोग रो पड़ते हैं। श्रीराम बनगमन के दौरान संवाद, अशोक वाटिका में सीता का विलाप, भरत का चित्रकूट जाकर श्रीराम को वापसी के लिए मनाना आदि ऐसे प्रसंग है जिसमें उपस्थित लोग रो पड़ते हैं। राम का जीवन पूरी तरह से इस एक महीने में लोगों के साथ घुल-मिल जाता है। हर संवाद के बाद ‘बोल दे राजा राम की जय’ और ‘हर हर महादेव’ का उद्घोष ही यह प्रमाणित कर देता है कि प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में राम और शंकर वास कर रहे हैं।

        रामनगर की रामलीला की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ नित्य प्रति होने वाली आरती है। ऐसी मान्यता है कि आरती के समय साक्षात् विष्णु भगवान का वास इन स्वरुपों में हो जाता है इसलिए उस समय इनका दर्शन करना पुण्य देता है। इसलिए इसकी महŸाा सर्वाधिक है और यह बात भी देखने में आई है कि बाहर से आने वाले दर्शनार्थी और विशेष कर स्थानीय लोग और कुछ बनारसी  सिर्फ आरती के लिए हीं रामनगर की रामलीला मंे आते हैं।

        इस आरती को लेने के लिए जो भागम-भाग होती है यह अवर्णनीय और अकल्पनीय है। आरती को पाने के लिए दोपहर दो बजे से ही श्रद्धालुओं का आगमन तथा रामनगर स्थित रामबाग पोखरे, रतनबाग पोखरे, सगरा और गंगा नदी पर साफा पानी लगाना और भाँग-बूटी छनना शुरू हो जाता है। पूरे एक महीने यहाँ बहरी अलंग का मजा  लिया जाता है और दो बजे से जारी तैयारी 5 बजते-बजते पूर्ण हो जाती है। सब लोग लीलास्थल पहुँचने लगते हैं और जिनको सम्पूर्ण लीला देखनी होती है वह तो देखते हैं, लेकिन जिनको आरती लेनी होती है वह भी लीला स्थल के आस-पास ही रहते हंै।

        यहाँ की लीला का समापन प्रतिदिन आरती से होता है। आरती स्वरुपों या देवमूर्तियों के समक्ष दीप जलाकर की जाती है। जो भी हो आरती प्रतिदिन होनी ही है। बरसात आदि के कारण अगर उस दिन विशेष की रामलीला नहीं हो पाती है तो नियत समय पर आरती करा दी जाती है और उस दिन की छूटी रामलीला दूसरे दिन वही से शुरू होती है। इसके बाद में किसी दिन समायोजित कर लिया जाता है। यह समायोजन विजयादशमी की लीला से पहले ही पूर्ण कर लिया जाता है। जब रामलीला बाधित होती है और आरती के समय में अगर परिवर्तन किया जाता है तो इसकी सूचना श्रद्धालुओं को दी जाती है ताकि किसी की आरती न छूटे।

        आरती प्रारम्भ होने से पहले स्वरुपों को गजरा पहनाया जाता है, स्वरुपों को कमल का फूल दिया जाता है और फिर रामलीला का ही कोई पात्र स्वरुपों की आरती उतारता है। जैसे अयोध्या में होने वाली सारी आरती राजमाता कौशल्या करती हैं, जनकपुर जाते समय रास्ते में दो दिन कोई साधु आरती करता है, जनकपुर में राजा जनक की पत्नी सुनयना आरती करती है, वनगमन के दौरान कभी निषाद राज तो कभी सुग्रीवजी तो कभी विभीषण आरती करते हैं। जयंत नेत्र भंग तथा सीताहरण के दिन होने वाली आरती इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है कि लक्ष्मणजी स्वयं श्रीराम की आरती करते हैं। लंका पहुंचने से पहले रामेश्वर की स्थापना के बाद खुद भगवान राम शंकरजी की आरती करते हैं और यह पूरी रामलीला में पहली बार होता है जब आरती के दौरान ‘सीता-राम, सीता-राम‘ की जगह ‘हर हर महादेव‘ का जाप श्रद्धालु करते हैं।

        श्री रामलीला की कुल आरती 31 दिनों की होती है। रामलीला प्रारम्भ होने से पहले दस दिन श्रीरामचरितमानस का  जो पाठ रामलीला पक्की पर होता है तो उसमें ‘‘आरती श्री रामायण जी‘‘ की गायी जाती है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि आरती के दौरान कुल तीन प्रकार की आरती गायी जाती है जो परिस्थितिजन्य होती है। जैसे जब श्री राम की बिना सीता के आरती होती है तो रामायणी ‘‘राम आरती होने लगी है‘‘ का पाठ करते हैं। जब श्रीराम का विवाह सीता से हो जाता है तो ‘‘आरती करिये सियावर की‘‘ गायी जाती है। तीसरी आरती ‘‘आरती श्री रामायण जी की’’ रावण जन्म के दिन गायी जाती है।

        इस तरह दूसरे दिन (रामजन्म) की लीला से पाँचवे दिन (धनुष यज्ञ) की लीला तक ‘राम आरती लगी है‘ और छठवें दिन (श्रीराम विवाह) से पन्द्रहवें दिन (श्रीराम का पंचवटी निवास) तक ‘आरती करिये सियवर‘ आरती गायी जाती है। सोलहवें दिन (सीताहरण) से सŸााइसवें दिन (विजयादशमी) तक ‘राम आरती होने लगी है‘ आरती गायी जाती है। अट्ठाइसवें दिन (श्रीराम के अवध प्रयाण) से आखरी दिन तक ‘आरती श्री रामायण जी की’ गायी जाती है। इस पूरी रामलीला के दौरान चैदहवें दिन, जब भरत राम को मनाने में असफल हो कर अयोध्या वापस आते हैं और नन्दी ग्राम निवास करते हैं तो उस दिन दो आरती होती है। पहली आरती-श्रीराम की चित्रकूट में, उसके बाद दूसरी आरती नन्दी ग्राम में निवास करते भरत की होती है। रामलीला का प्रतिदिन आरती का समय रात्रि लगभग 9 बजे का होता है लेकिन विजयादशमी के दिन लगभग रात्रि 11 बजे और भरत मिलाप की आरती रात्रि 12 बजे होती है। रामलीला की सर्वाधिक पुण्यदायी और महत्वपूर्ण आरती श्री रामराज्याभिषेक की भोर की आरती होती है। जब श्रीराम का राज्याभिषेक कर दिया जाता है तो रात्रि भर श्रद्धालुओं को उनके दर्शन का अवसर मिलता है और रात्रि के बाद जैसे ही अँधेरा छँटता है और सुबह की पौ फटती है, इस रामलीला की सर्वाधिक नयनाभिराम आरती शुरू होती है। इस आरती को लेने महाराज पैदल चलकर ही रामलीला स्थल तक आते हैं। इस दिन भी राजमाता कौशल्या आरती करती हैं। फूलों से सुसज्जित शानदार राजसिंहासन पर श्रीराम सीता सहित विराजमान रहते हैं उनके पीछे हनुमान चँवर ड़ोलाते रहते हैं अगल-बगल भरतजी, लक्ष्मणजी, शत्रुघ्नजी, गुरु वशिष्ठ बैठे रहते हंै। इधर श्रद्धालु दोनों हाथ जोड़े ‘सीताराम जय सीताराम‘ के जाप के बीच श्रद्धावनत दर्शन करते रहते हैं। रामायणी आरती गाते हैं और पहले लाल महताबी और फिर सफेद महताबी जलायी जाती है। चारों ओर घण्टे-घड़ियाल और शंख की प्रतिध्वनि गंूजती रहती है। सफेद महताबी की रोशनी आरती का चरम् क्षण होता है और ऐसा लगता है जैसे इस दैदीप्यमान प्रकाश में सब स्नान कर रहे हों। आरती जैसे ही समाप्त होती है रामलीला व्यास श्रीराम के गले का पुष्पाहार लाकर महाराज को पहनाते हैं और अब चारो ओर ‘हर हर महादेव‘ का उद्घोष गंुजायमान होता है। लीला स्थल से बाहर निकलने के बाद महाराज परम्परानुसार हवाखोरी के लिए निकलते हैं और एक परम्परा यह है कि श्रीराम के राजगद्दी मिलने की खुशी में भक्त ‘बहरी अलंग‘ का आनन्द उठाते हैं। रामनगर का कोई भी तालाब, पोखरा, बगीचा ऐसा नहीं बचता जहाँ खाना बनाना-खाना न होता हो। रामनगर किले में स्थित ‘दक्षिणामुखी हनुमान‘ की काली प्रतिमा भी आम लोगों के दशनार्थ आज के ही दिन सुलभ हो पाती है। दर्शन का क्रम दोपहर दो बजे से सायं सात बजे तक चलता है।

        रामलीला में आज भी परम्परागत तरीके से महाराज की सवारी निकलती है। जब अयोध्याजी में लीला होती है तो महाराजा की सवारी हाथी से निकलती है तथा दूर की लीला में सवारी बग्घी से निकलती है और लीला स्थल पर जाकर महाराजा हाथी पर सवार हो जाते हैं और वहीं से रामलीला का अवलोकन करते हैं। यह सवारी भी पूरी तरह शाही होती है। जब सवारी बग्घी से निकलती है तो बग्घी रामनगर किले के द्वार पर खड़ी रहती है और महाराजा यहाँ तक पैदल आते हैं लेकिन जब हाथी से निकलना होता है तो उनकी सवारी किले के भीतर स्थित हाथी गेट से ही आरम्भ होती है।

        इस सवारी मंे सबसे आगे घोड़े पर सवार एक ‘डंका‘ या ‘नगाड़ा‘ लिये एक व्यक्ति होता है जो महाराज के आने की सूचना देते चलता है। इसके पीछे घोड़े पर बनारस स्टेट का झंडा लिए एक घुड़सवार चलता है, इसके पीछे चार घुड़सवार फिर हाथी या बग्घी पर सवार महाराजा फिर उसके पीछे चार या दो घुड़सवार परिस्थिति या उपलब्धता के अनुसार होते हैं। ये छह या आठ सवार नागरिक पुलिस के होते हैं जिन्हें जिला पुलिस की ओर से भेजा जाता है जबकि आगे के मुनादी और झंडा लेकर चलने वाले महाराज के किला के व्यक्ति होते हैं। महाराजा की इस सवारी को रामलीला स्थल पर छोड़कर घुड़सवार वापस आ जाते हैं। महाराजा की सवारी रामलीला का हिस्सा तो नहीं है लेकिन एक दिन की सवारी ऐसी भी है जो लगभग रामलीला का हिस्सा बन गयी है। वह दिन है- श्रीराम की रावण पर विजय का दिवस अर्थात दशहरा या विजयादशमी।

        भारत भर में दशहरा के दिन रावण पर श्रीराम की विजय के उपलक्ष्य में, बुराई पर अच्छाई के प्रतीक के रुप में रावण का पुतला जलाया जाता है। लेकिन रामनगर की रामलीला में दशहरा का दिन महाराज काशी नरेश के विजय जलूस के लिए अधिक जाना जाता है। काशीराज का इस रामलीला के साथ अटूट सम्बन्ध है और ऐसी मान्यता रही है कि काशीराज भगवान शंकर के प्रतीक हैं और इसलिए किले से बाहर निकलते ही इनका अभिवादन ‘हर हर महादेव‘ के उद्घोष के साथ किया जाता है। दशहरा के दिन महाराज काशी नरेश शस्त्र पूजा पर बैठते हैं उसी समय उन्हे नौ तोपों की सलामी दी जाती है। किले में रखे शस्त्रों की पूजा ब्राह्मणों का दल करवाता है और उसके बाद पूरी राजसी ठाट-बाट से विजय जलूस निकलता है। महाराजा भी विजय का प्रतीक हल्के नारंगी रंग के वस्त्र पहनते हैं और उनका पूरा शरीर स्वर्णाभूषणों से ढंका रहता है। ऐसा नहीं कि दशहरा के दिन सिर्फ महाराजा ही राजसी ठाठ-बाट से बाहर आते हैं बल्कि इस दिन पूरे राज परिवार का हर सदस्य चाहे महिला हो या पुरुष सभी स्वर्णाभूषणों से लदे होते हैं। सभी पुरुष सदस्य हाथियों पर सवार होकर निकलते हैं तो तीनों राजकुमारियाँ और उनके पुत्र-पुत्री गाड़ी में होती हैं। रानियाँ किले से बाहर केवल फुलवारी, धनुषयज्ञ, भरतमनावन, मुद्रिका एवं लक्ष्मणशक्ति वाले दिन बाहर आती हैं क्योंकि परम्परा के अनुसार ये पर्दे में ही रहती हैं। जबकि राजकुमारी लोग तीसो दिन रामलीला का अवलोकन करती हैं।

        विजय जलूस में निकलने वाले हाथी घोड़ों को भी सजाया जाता है। हाथियों को भी मुकुट पहनाया जाता है और सोने-चाँदी के गहने पहनाये जाते है। इस जलूस में पालकी, बग्घी, तोप गाड़ियाँ इत्यादि सब कुछ पहली बार किले से बाहर आती है। यह जलूस रामनगर किले से निकल कर लंका तक जाता है। वहाँ महाराजा रणभूमि की परिक्रमा करते हैं। उसके बाद उनका काफिला गाड़ी में वापस आ जाता है। फिर रात्रि 10.30 बजे लंका से रावण का पुतला जलाया जाता है। इस दौरान महाराजा लंका मैदान नहीं जाते और उनके पुत्र अथवा प्रतिनिधि की उपस्थिति में पुतला जलाया जाता है।

        एक सबसे खास चीज और आज के दिन परम्परानुसार निभाई जाती है कि श्रीराम के विजय के उपलक्ष्य में रामनगर के किले में दरबार लगता है जिसमें महाराज सहित परिवार के सभी पुरुष सदस्य भाग लेते हैं और इनके साथ वहाँ पर वंश परस्परा से रामनगर किले के दरबारी के रुप में जुड़े लोग शामिल होते हैं, जिनमें- देवेन्द्र बहादुर सिंह के पुत्र मुन्ना सिंह, अनिल सिंह मणि, डा0 शारदा परिवार के सदस्य और अन्य आज भी दरबारियों की वेशभूषा में वहाँ उपस्थित रहते हैं और महाराजा को परम्परानुसार अपना नजर पेश करते हैं।

        रामनगर की रामलीला का दिव्य स्वरुप उसकी सादगी मे ही निहित है। इतना विशाल आयोजन और इतनी सादगी; फिर भी भव्यता अकल्पनीय है। समस्त भारत में और विशेषकर उŸार भारत में रामलीलाएँ मंचित की जाती हंै लेकिन वहा पर गम्भीरता कम और नाटकीयता ज्यादा होती है, लेकिन रामनगर की रामलीला में नाटकीयता का रंचमात्र भी अंश नहीं है। नाटक और रामनगर की रामलीला में अगर कोई एक चीज समान है तो वह है कि नाटक में भी अभिनय होता है और रामलीला में अभिनय किया जाता है।

        क्या यह आश्चर्य नहीं है कि प्रत्येक दिवस लगभग दस हजार से ज्यादा की भीड़ वाले रामनगर की रामलीला में उपस्थित श्रद्धालुओं को पात्रों द्वारा उच्चारित किये शब्द सुनाई देते हैं और वह भी बिना माइक या लाउडस्पीकर के। रामनगर की रामलीला का कोई भी दिन ऐसा नहीं होता जिस दिन दस हजार, से कम की भीड़ होती है। इसके बावजूद संवाद प्रत्येक व्यक्ति एकाग्रचित होकर सुनता है। रामनगर की रामलीला में उसके उद्भव काल से लेकर आज तक कभी भी किसी तरह के संचार उपकरणों का इस्तेमाल नहीं किया गया है। वहाँ के लिए संचार उपकरण का कार्य दर्शकों की भक्ति भावना ही कर देती है। रामलीला के  व्यास लक्ष्मी नारायण द्वारा सभी पात्रों के संवाद कहने से पूर्व ‘चुप रहो! सावधान!’ की पुकार लगायी जाती है और रामलीला स्थल पर ऐसी शान्ति छा जाती है कि सुई भी गिरे तो आवाज हो जाय। इस पुकार के बाद लोग तन्मयता से संवाद सुनने में लग जाते हैं और अगल-बगल कोई आवाज करता है तो भक्तगण स्वतः ही डाटकर चुप करा देते हैं।

        आश्चर्य है कि राम सहित अन्य स्वरुपों की आयु 13-14 वर्ष की होती है लेकिन उनकी आवाज का हर उतार -चढ़ाव आसानी से महसूस किया जा सकता है। इस बाबत कहा जाता है कि रामलीला राम का जीवन चरित है और यहाँ  उसी वातावरण को जीने का प्रयास किया जाता है, इसलिए ये सब चीजे प्रयोग में नहीं लायी जाती और आडम्बर से मुक्त रखने का प्रयास किया जाता है। यही नहीं पूरे रामलीला क्षेत्र में किसी भी ध्वनि विस्तारक यंत्र का उपयोग लोग स्वयमेव नहीं करते। रामलीला के मंचन के साथ श्रीरामचरितमानस का पाठ भी चलता रहता है। वस्तुतः पहले रामचरित मानस का पाठ किया जाता है फिर उस अंश की लीला मंचित या अभिनीत की जाती है। यह पाठ 12 रामायाणियों का दल करता है। जिसके पास वाद्य यंत्र के रुप में झांझ और मृदंग रहता है और ये भी बिना किसी उपकरण के ही पाठ करते हैं जो दूर-दूर तक सुनाई देता है। रामलीला के संवादो को रिकार्ड करना भी निषिद्ध है।

        रामनगर की रामलीला की यह भी एक विशिष्टता है कि पूरी रामलीला के दौरान मात्र धनुषयज्ञ की लीला को छोड़कर कही भी विद्युत द्वारा चलित बल्ब का इस्तेमाल नहीं किया जाता है और अपवाद स्वरुप धनुषयज्ञ की लीला में जब यज्ञ भूमि में श्रीराम धनुष उठाते हैं तो मात्र 3 मिनट के लिए उनको प्रकाशमान दिखाने के लिए एक 500 वाट का बल्ब जलाया जाता है इसके अलावा कहीं भी विद्युत प्रकाश का इस्तेमाल नहीं किया जाता। पूरी रामलीला में पेट्रोमैक्स पंचलाइट का उपयोग किया जाता है और इसके अलावा रेड़ी व तीसी के तेल से जलती मशालें काम में लायी जाती हैं। चाहे राजा दशरथ का महल हो या रावण की नगरी, चाहे जनकपुर हो या वनगमन के दौरान पड़ने वाले जंगल-पर्वत, सभी जगहों पर पेट्रोमैक्सों का उपयोग किया जाता है। इसके पीछे भी एक तर्क दिया जाता है कि चूंकि रामजी के समय बिजली आयी नहीं थी अतः रामलीला को पूर्णता प्रदान करने के लिए संचार उपकरणों और प्रकाश के विद्युत उपकरणों का प्रयोग नहीं किया जाता और यह भी तर्क दिया जाता कि रामलीला के संस्थापको ने जिस स्वरुप में रामलीला का संचालन शुरु किया था उस स्वरुप को बनाये रखने और उनकी कल्पनाओं को मूर्त रुप देने के लिए आधुनिक प्रकाश व्यवस्था से परहेज किया जाता है। रामायणियों का दल छोटे-छोटे जलते मशालों की रोशनी में मानस पाठ करता है। पात्रों को संवाद अदायगी में सहायता करने वाले व्यास भी पेट्रोमैक्स की रोशनी में ही अपना ग्रंथ पढ़ते चलते हंै और पात्रों के साथ-साथ रामायणियों को निर्देश देते हैं। जब श्रीराम अयोध्या से वन के लिए चलते हैं तो भी रास्तो में पेड़ों आदि पर पेट्रोमैक्स पंचलाइट ही जलाये जाते हैं और उन्ही के प्रकाश में रामलीला आगे बढ़ती है। आरती के दौरान लाल और सफेद महताबी जब जलती है तो ऐसा लगता है जैसे पूरा वातावरण ही प्रकाशमान हो गया है। चूंकि रामलीला स्थल में बगैर अनुमति के फोटो नहीं लिये जा सकते अतः कैमरों की फ्लश लाइट तक नही जलती है। रामलीला प्रेमियों के हाथो में टार्च जरुर होती है जिसका उपयोग वे मानस पाठ में करते हैं। रामनगर की रामलीला में एक दृश्य आपको बहुत ही आम मिलेगा जब आप लीला स्थल पर रहेंगे श्रद्धालुओं की भारी संख्या हाथो में श्रीरामचरितमास लिए रामायणियों के साथ-साथ पाठ करती रहती है और इसलिए रात्रि में टार्च रखना उनकी आवश्यकता बन जाती है। बिना अत्याधुनिक उपकरणों के भी रामलीला का दृश्य हर आदमी देखता है, सुनता है और लीला स्थल छोड़ता है तो उसके ऊपर रामलीला के प्रभा मण्डल का प्रभाव स्पष्ट रुप से देखने को मिलता है।

रामनगर रामलीला की आरती

(1) आरति श्रीरामायनजी की। कीरति कलित-ललित सिय पी की।।(1) आरति श्रीरामायनजी की। कीरति कलित-ललित सिय पी की।। गावत ब्रह्मादिक मुनि नारद। बालमीक बिग्यान बिसारद। सुक सनकादि सेष अरु सारद। बरनि पवनसुत कीरति नीकी।। 1 ।। गावत वेद पुरान अष्टदस। छओ सास्त्र सब ग्रंथन को रस। मुनि जन धन संतनको सरबस। सार अंस संमत सबही की।। 2 ।। ब्यास आदि कबिबर्ज बखानी। कागभुसुंडि गरुड़के ही की।। 3 ।। कलिमल हरनि विषय रस फीकी। सुभग सिंगार मुक्ति जुबतीकी। दलन रोग भव मूरि अमी की। तात मात सब विधि तुलसी की।। 4 ।।(तुलसीदास-श्रीरामचरितमानस)

(2) राम आरती होन लगी है। जगमग जगमग जोति जगी है।। कंचन भवन रतन सिंहासन। दासन्ह डासे झिलमिल डासन। तापर राजत जगत प्रकासन। देखति छबि मति प्रेम पगी है।। 1 ।। महकत धूप बरत महताबी। झलकत कुंडल रबि छबि दाबी। अंग अंग सुन्दरता फाबी। आनन्दकी सरिता उमगी है।। 2 ।। घण्टा, घरी मृदंग बजावत। नूपुर पग भरि नाचत गावत। पूरत  सेवहि चँवर डोलावत। सुनतै दूरि बलाय भगी है।। 3 ।। रूप देषि जननी हरसत है। अजुरिन देव सुमन बरसत है। करि दंडवत चरन परसत है। सुमति रामके रंग रंगी है।। 4 ।।(काष्ठजिह्वा स्वामी रामसुधा पृ0-63)

(3) आरती करियै सियबरकी। नख सिख छबिधर की।। लाल पीत अम्बर अति साजै। मुष निरषत शारद ससि साजै। तिलक चिलक भालन पर राजै। कुंकुम केसर की।। 1 ।। करन फूल कुंडल झलकत है। चन्द्रहार मोती हलकत है। कर कंकनकी छबि छलकत हैं। जगमग दिनकर की।। 2 ।। मृदु तरुवनमें अधिक ललाई। हास बिलास न किछु कहि जाई। चितवनिकी गति अति सुखदाई। मनकी मन फरकी।। 3 ।। सिंहासन पर चँवर ढरत हैं। साज बजत जय-जय उचरत हैं। सादर अस्तुति देव करत हैं। लोटरनि अनुचर की।। 4 ।।(काष्ठजिह्वा स्वामी-रामसुधा पृ0-54)

रामनगर की रामलीला : परिचय

रामनगर की रामलीला : परिचय जहाँ सहजता ही श्रेष्ठता है–

 रामनगर की रामलीला की विश्वप्रसिद्धि के पीछे एक साथ तमाम कारक हैं। लगभग पचीस वर्ग किलोमीटर के प्राकृतिक मंच पर प्रसंगानुसार चलायमान यह मंचन बहुत ही सहजता के साथ बिना ध्वनि विस्तारक यंत्रों के तथा बिजली के बड़े रोशनी करने वाले उपकरणों के स्थान पर पुराने समय के पंचलाइट और मशाल की रोशनी में प्रत्येक दिन न्यूनतम 10 हजार की भीड़ को मात्र रामलीला व्यास के ‘‘चुप रहो! सावधान!’’ स्वर के द्वारा अनुशासित किया जाता है। ये रामलीला की विशिष्टता के कुछ सहज उदाहरण हैं। इसी प्रकार की सहजता इस रामलीला की श्रेष्ठता है और यह सौम्य श्रेष्ठता ही इसकी विश्वप्रसिद्धि का निर्विवाद कारण है। रामनगर की रामलीला में प्रतिदिन आने वाले नेमी, साधु-संतो की समर्पित व अनुशासित टोलियाँ श्रद्धा और समर्पण के बड़े अध्याय हैं।

यहां दर्शक मात्र दर्शक न होकर पात्रों और परिस्थितियों, मंचन व प्रसंग के अनुसार खुद भी रामलीला में भूमिका निभा रहा दिखाई देता है। पात्रों का पीढ़ी-दर-पीढ़ी समर्पण, नेमी-प्रेमी जनों का श्रद्धा और भक्ति भाव, रामलीला प्रसंगों का मौलिक मंचन, संवाद अदायगी, मंचन में सूक्ष्म तत्वों का भी समावेश; ऐसे अनेकानेक चित्र नये दर्शक के लिए कौतूहल और नेमीजनों के लिए श्रद्धा के सागर हैं। 31 दिनों तक चलने वाली इस रामलीला में न केवल मंच पर ही अपितु नेपथ्य मंे भी मजबूत भूमिका अदा करने वाले ऐसे तमाम चरित्र हैं जो कई पीढ़ियों से पूरी निष्ठा के साथ संलग्न हैं।

रामनगर की इस विश्वप्रसिद्ध रामलीला में प्रत्यक्ष – परोक्ष रूप से पूर्ण समपर्ण व असीम आस्था के साथ अपनी बहुविध भूमिका निभाने वाले इन लोगों के लिए प्रशंसा, प्रसिद्धि और पारिश्रमिक अर्थहीन वस्तु है। कुल मिलाकर आप जिधर भी नजर डालेंगे रामलीला का प्रत्येक पक्ष, अद्वितीय और अनुपम है। पूर्व में रामलीला पर कुछ लेख और पुस्तकें अवश्य आयी हैं लेकिन अभी भी रामलीला की विशिष्टता को समग्रता के साथ समझने के लिए अपार शोध और लेखन की सम्भावनाएं हैं। इस विश्वप्रसिद्ध रामलीला पर यदि सर्वांगीण पक्षों से प्रकाश डालने का प्रयास किया जाय तो इसके लिए वृहदाकार पुस्तक के कई खण्ड प्रकाशित करने होंगे तो भी शायद यह विश्वप्रसिद्ध श्रीरामलीला लेखन की सीमा में पूर्णतः आबद्ध नहीं की जा सकती।

अन्ततः प्रबुद्ध पाठकों की ओर से उनके सुझावों व प्रतिक्रियाओं की अपेक्षा के साथ प्रस्तुत है यह  वेबसाइट – ‘‘विश्वप्रसिद्ध रामलीला: रामनगर ’’।