Tag Archives: date of ramleela ramnagar

रामलीला से सम्बन्धित तिथियाँ और समय

रामनगर की श्रीरामलीला का शुभारंभ सौर-पंचांग के आधार पर भाद्र पद मास के शुक्ल पक्ष में चतुर्दशी तिथि को (बहुतायत सितम्बर महीने में) होता है। यह रामलीला आश्विन मास के कृष्ण और शुक्ल पक्ष तक अनवरत चलती रहती है। इसी तरह द्वितीय पूर्णिमा को जब श्री रामलीला अपनी समाप्ति पर पहुंच चुकी होती है तब काशी नरेश एवं उनका परिवार सार्वजनिक रूप से अपने रामनगर दुर्ग में पचस्वरूपों का पूजन कर उनकी विदाई करते हैं। श्री रामलीला के प्रारम्भ के संदर्भ में महाराज ईश्वरी प्रसाद नारायण सिंह के समय बनी समिति द्वारा काशी, अयोध्या और मिथिला के रामायण के बड़े-बड़े विद्वान, पण्डित और महात्माओं से रामचरितमानस का शोधन कराया गया ‘जिसमें श्रीरामलीला का प्रारम्भ किस दिन से हो, किस स्थान से कितने दिनों तक और कौन-कौन सी लीलायें हों, इन सबकी व्यवस्था उसी समय उपर्युक्त महानुभावों की उपस्थिति में हुई; जो अब तक नाम मात्र के हेर-फेर के साथ वैसी ही चली आ रही है।

        वास्तविक रूप में इस धार्मिक कृत्य श्रीरामलीला के अभिनय और सम्पादन में समय की तुलना में इस लीला की तैयारी तथा समाप्ति बहुत हद तक लम्बी चलती है। श्रीरामलीला का शुभारम्भ गणेश-पूजन से होता है। लगभग दो मास पूर्व से ही श्रीरामलीला के पात्रों का प्रशिक्षण का कार्य प्रारम्भ हो जाता है। सर्वप्रथम पंच स्वरूपों के चयन हेतु पांच बालकों को (जो ब्राह्मण जाति के यज्ञोपवीतधारी होते हैं) बुलाया जाता है। उन स्वरूपों को ईश्वर के साकार रूप में आदर दिया जाता है। एक पूजा-समारोह में उन स्वरूपों को मुकुट लगाकर उनकी अर्चना की जाती है। इसके अतिरिक्त व्यास-पूजा, मुखौटे, श्रीरामचरितमानस, संवादों की पुस्तिकाओं की पूजा, बढ़ई के हथौड़े, दर्जी की कैंची, रंग-साज के ब्रश और लीला के अन्य आवश्यक सामानों की पूजा और अर्चना की जाती है।

प्रथम गणेश पूजा- सर्वप्रथम श्रीरामलीला का शुभारम्भ श्रावण मास के कृष्ण पक्ष में गणेश चतुर्थी को हो जाता है। इस दिन हनुमान और गणेश के मुखौटे को नये पीढ़े पर रखकर, उसके एक बगल ब्रश, बँसुला, कैंची (श्रीरामलीला में काम आने वाले औज़ार) आदि तथा दूसरी ओर श्रीरामलीला 

 

की पोथी (लाल रंग के वस्त्र में बँधी) रखी रहती है। एक संक्षिप्त समारोह में, जिसमें नगर के गण्यमान नागरिकों, मेलाधिकारी (महाराज के प्रतिनिधि) एवं अन्य राजकर्मचारियों की उपस्थिति रहती है; लीला के सकुशल सम्पन्नता हेतु संकल्प किया जाता है। समारोह के मण्डप में उत्तरी भाग में श्रीरघुनाथदत्त एवं सम्पतरामजी पंच स्वरूपों के साथ विराजमान रहते हैं। श्रीलक्ष्मीनारायण पाण्डेय व्यास एवं श्रीरामनारायण पाण्डेय जी पूजन एवं स्तुति तथा अर्चन आदि क्रियाएँ मेलाधिकारी के कर कमलों से सम्पन्न कराते हैं। पोथी, गणेश एवं श्री हनुमान के मुखौटे पर माला-फूल चढ़ाया जाता है। पंच स्वरूपों को तिलक लगाकर पुष्प माला पहनायी जाती है।, ब्रह्मा

जी का एक सम्वाद – ‘‘ऐ पुत्र! तुम मन इच्छित वर माँगो…’’ होता है जिसका तात्पर्य है कि पोथी पढ़ने का शुभारम्भ हो गया। अन्त में पोथी एवं गणेश-हनुमान के मुखौटे की आरती की जाती है, जिसमें सभी उपस्थित लोग खड़े होकर आदर व्यक्त करते हैं। तत्पश्चात् महाराज की ओर से प्रसाद का वितरण एवं ब्राह्मणों को दक्षिणा भी प्रदान की जाती है।

द्वितीय गणेश पूजा- पुनः भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी को विराट श्रीगणेश की मूर्ति के अतिरिक्त श्रीरामचरितमानस की पूजा एवं संकल्प किया जाता है। इस दिन से अगले दस दिन तक श्री मानस के बालकाण्ड प्रारम्भ से लेकर 175 दोहे तक श्रीरामजी पाण्डेय प्रधान रामायणी की 

अध्यक्षता में झांझ मृदंग के साथ पाठ सम्पन्न होता है। इनके साथ कुल 12 रामायणी एवं एक मृदंग बजाने वाला व्यक्ति रहता है। यह पाठ पक्की चैक पर (8 से 9.30 बजे) तक होता है।

        रामनगर की श्रीरामलीला के प्रबन्ध हेतु एक श्रीरामलीला अधिकारी की नियुक्ति की जाती है जो महाराज के बाद श्रीरामलीला सम्बन्धी मामलों का सर्वोच्च अधिकारी होता है। महाराज श्रीरामलीला करने का संकल्प करते हैं। इस संकल्प का उद्देश्य श्रीरामलीला के अभिनय से राजा, प्रजा तथा देखने, सुनने वाले और कार्यकर्ताओं का कल्याण होना है। इस पूजा और संकल्प के बाद लीला के मुख्य पात्रों का पूर्वाभ्यास तथा सहायक पात्रों एवं कार्यकर्ताओं द्वारा तैयारी आरम्भ की जाती है।

        अभ्यास का समय श्रीरामलीला-अभिनय के सम्पादन≤ में नहीं जोड़ा जाता है।

श्रीरामचरितमानस पाठ के प्रारंभिक दस दिन-

(1)     बालकाण्ड के प्रारम्भ से 7 वें दोहे तक (कृपा करहु अब सर्ब)।

(2)     बालकाण्ड के 8 वें दोहे की प्रथम चैपाई से 20 वें दोहे तक (बिराजत दोउ)।

(3)     बालकाण्ड के 21 वें दोहे की प्रथम चैपाई से 40 वें दोहे तक (मधुकर बारि बिहंग)।

(4)     बालकाण्ड के 41 वें दोहे की प्रथम चैपाई से 60 वें दोहे तक (जे पावत मख भाग)।

(5)     बालकाण्ड के 61 वें दोहे की प्रथम चैपाई से 80 वें दोहे तक (तेहि तिही सन काम)।

(6)     बालकाण्ड के 81 वें दोहे की प्रथम चैपाई से 101 वें दोहे तक (होइ प्रसन्न बरु देहु)।

(7)     बालकाण्ड के 101 वें दोहे की प्रथम चैपाई से 120 (घ) सोरठा तक (कहउँ उमा सादर सुनहु)।

(8)     बालकाण्ड के 121 वें दोहे की प्रथम चैपाई से 140 वें सोरठा तक (भजिअ महामाया पतिहि)।

(9)     बालकाण्ड के 141 वें दोहे की प्रथम चैपाई से 160 वें दोहे तक (निर्धन रहित निकेत)।

(10)    बालकाण्ड के 161 वें दोहे की प्रथम चैपाई से 175 वें दोहे तक (ताहि ब्याल सम दाम)।

        इस तरह 10 वां विश्राम होने के पश्चात् प्राचीन वैदिक ढंग से हवन करके श्रीरामलीला प्रारम्भ की जाती है।

अनंत चतुर्दशी – श्रीरामलीला के ग्यारहवंे दिन भाद्र शुक्ल अनन्त चतुर्दशी पवित्र दिन में सायंकाल पांच बजे से गायन-पारायण के साथ श्रीरामलीला अनुष्ठान भी प्रारम्भ हो जाता है। श्रीरामलीला का प्रारम्भ किस दिन से हो यह भी विद्वानों द्वारा शोध करके रखा गया है। रामचरितमानस में प्रसंग में जब ब्राह्मणों ने राजा प्रताप भानु को परिवार सहित निशाचर होने का श्राप दिया तब साथ ही यह भी श्राप दिया कि-

                ‘‘सम्वत् मध्य नास तब होऊ।

                जल दाता न रहहि कुल कोऊ।।’’

        ऊपर के चैपाई से स्पष्ट है कि सम्वत् के मध्य में राजा प्रताप भानु का परिवार सहित नाश हो गया और राक्षस योनि में उसका जन्म हुआ। भाद्रपद की पूर्णिमा को सम्वत् का मध्य होता है। अतः रामनगर की श्रीरामलीला भी सम्वत् के मध्य अर्थात् भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी अर्थात् अनन्त चतुर्दशी से प्रारम्भ होती है और अश्विन शुक्ल चतुर्दशी को समाप्त होती है। कोट विदाई को लेकर 31 लीलाएं होती है। दशरथ मरण की लीला नहीं होती है। इस प्रकार भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी तक राजा प्रताप भानु का परिवार सहित नाश हो जाता है और दूसरे दिन अनंत चतुर्दशी को रावण, कुम्भकरण और विभीषण जन्म, तप, वरदान तथा रावण द्वारा नाना प्रकार के अत्याचार, विजय, देवताओं की स्थिति, आकाशवाणी द्वारा मर्यादा पुरूषोत्तम राम की जन्म लेने की घोषणा आदि की लीलाओं से रामनगर की रामलीला आरंभ होती है। भगवान श्रीराम जन्म के पहले राक्षसराज रावण का जन्म हो गया था। अतः रावण जन्म से यहां की श्रीरामलीला आरंभ होती है।

‘‘पुर बैकुण्ठ जान कह कोई।

कोउ कह पयनिधि बस प्रभु सोई।।’’

        ऊपर चैपाई की पूर्ति और लीला भी होती है। रामबाग के बड़े तालाब में क्षीरसागर की झांकी और बुर्जी पर बैकुण्ठ है; भगवान लक्ष्मी के साथ बैठे हुए दर्शन देते हैं। अनंत चतुर्दशी वाले दिन से रामबाग की पश्चिमी चाहारदीवारी के बाहर यह चरित्रानुष्ठान ब्रह्मा के संवाद-

‘‘गयउ निकट तप देखि विधाता।

रामलीला से सम्बन्धित तिथियाँ और समय

मांगहु वर प्रसन्न मैं ताता।।’’

        बालकाण्ड के 177 वें दोहे की प्रथम चैपाई की उत्तरार्ध से प्रारंभ होकर उत्तरकाण्ड के 51 वें दोहे –

‘‘प्रेम सहित मुनि नारद, वरनि राम गुन ग्राम।

सोभा सिंधु हृदय धरि, गये जहां विधि धाम।।’’

        …..तक ब्रह्मा पुत्र नारद जी संवाद पर समाप्त हो जाता है। अब उत्तरकाण्ड के शेष 79 दोहे मूल गेय पारायण के बच जाते हैं; जिनका गायन राजमहल में कोट विदाई के पश्चात् श्रीराम जी के पुनः अयोध्या आगमन के बाद रामायणी दल द्वारा सम्पन्न किया जाता है। अयोध्या में वापस आने एवं मंगलाचरण के उपरांत उत्तरकाण्ड की समाप्ति हो जाने पर श्रीराम जी की अन्तिम आरती के साथ-साथ चरित्र प्रदर्शन (लीला) तथा पारायण अनुष्ठान दोनों की समाप्ति हो जाती है और आनन्दपूर्वक आश्विन मास भी समाप्त हो जाता है। इस लीला को निर्विघ्न सम्पन्न होने के लिए अनंत चतुर्दशी से अश्विन शुक्ल पूर्णिमा तक श्री देवी जी के मन्दिर में दुर्गा सप्तशती का पाठ भी ब्राह्मण द्वारा कराया जाता है।

        इसके अनन्तर रात्रि कृष्ण पक्ष में प्रथम या द्वितीय मंगलवार को न्यूनाधिक दोष परिहार के लिए श्रीरामचरितमानस का आद्यन्त एक आवृत्ति पारायण पुनः ब्राह्मण द्वारा कराया जाता है। यह पाठ दुर्ग के दक्षिण खिड़की के काले हनुमान जी के मंदिर पर होता है। इस पारायण के समाप्त होने पर श्रीरामलीला के व्यास जी अयोध्या जी के लीला भूमि में श्रीहनुमान जी का मुखौटा (चेहरा) सामने रखकर गणेश आदि पूजन पूर्वक हवन करके श्रीरामलीला अनुष्ठान की पूर्णाहुति करते हैं। इस प्रकार प्रतिवर्ष श्रीरामचरितमानस के पूर्ण अनुष्ठान का प्रारम्भ और उसकी समाप्ति होती है।