रामनगर की रामलीला में रामायणी दल

रामायण पाठ करने वाले रामायणी दल पूरी रामलीला के क्रमबद्ध मंचन के सूत्रधार  रूप में हैं। रामनगर की रामलीला में रामायणी दल की भूमिका श्रीरामलीला अनुष्ठान द्वितीय गणेश पूजन के साथ ही प्रारंभ होती है, जिसमें श्रीरामचरितमानस का पाठ प्रारंभ होता है। रामायणी दल द्वारा रामायण के सस्वर पाठ को ‘नारदी’ या नारद वाणी कहते हैं, जिसमें एक पक्ष ‘हे हा’ कहते हुए एक अद्र्धाली (चैपाई का एक हिस्सा) उठाता है और दूसरा पक्ष ‘हा, हा’ कहकर चैपाई को पूरा करता है। रामलीला प्रारम्भिक समय में रामायणी की संख्या 16 होती थी, जो आठ-आठ के दो दलों में विभाजित होते थे । वर्तमान में ये संख्या 12 है, जिसमें छः-छः रामायणी दल हैं । बारह रामायणी व एक मृदंग वादक को मिलाकर कुल तेरह लोगों का दल है । (वर्तमान समय में एक रामायणी का पद रिक्त है।) द्वितीय गणेश पूजन के दिन चौक स्थित पक्की पर प्रधान रामायणी श्री रुद्रनारायण पाठक (वर्तमान में) द्वारा रामायण पाठ का शुरुआत कराया जाता है। प्रस्तुत है वर्तमान रामायणी दल का संक्षिप्त परिचय

श्री शिवलोचन मिश्र- सन् 1991 से रामायणी की भूमिका में है यह भूमिका इनको विरासत में मिली है, इनके पिता स्व0 यदुनंदन मिश्र भी रामायणी थे, जिन्होंने 1950 से 1979 से इस पद को संभाला। उनके बाद उनके छोटे पुत्र सुरेश मिश्र ने 1977 से 1984 तक रामायण पाठ किया। इनके पद छोड़ने के बाद 1991 से अब तक आप इस परिवार से रामायणी की भूमिका मंे हंै। इनके छोटे पुत्र दिनेश मिश्रा ने भी पांच वर्षों तक रामायणी के रूप में रामलीला की सेवा की। आपका निवास स्थान चन्दौली जिले के परोरवां गांव में है।

श्री श्याम नारायण उपाध्याय – सन् 1986 से श्याम नारायण उपाध्याय रामायणी के रूप में रामनगर  रामलीला की सेवा कर रहे हैं। रामलीला के जुड़ाव पर कहा कि सैकड़ों एकड़ के इस रंगमंच पर व्यक्ति स्वांतः सुखाय की प्रेरणा से आता है और उसका यह प्रयास रहता है कि जब तक शरीर में सामथ्र्य है तब तक वह रामजी की सेवा करे। वर्तमान में उनके परिवार से 5 बालक अजीत, अमित, शुभम, विवेकानन्द और सच्चिदानंद रामलीला में विभिन्न पात्र बनते हैं।

श्री भोलानाथ मिश्र- आप रामनगर में मंशा जी मंदिर के पीछे रहते हैं। रामलीला में लगातार 26 वर्षों से रामायणी का कार्य कर रहे हैं। सन् 1966 – 1970 तक बाल हनुमान की भूमिका निभाई और सन् 1968- 1970 तक अष्ठसखी का आठवाँ स्वरूप भी रहे और बचपन में इन्होंने बाल राम जी की भी भूमिका निभाई है। इनकी वर्तमान आयु लगभग 62 वर्ष है। सन् 1989 से लगातार रामलीला में रामायणी का कार्यभार सम्भाल रहे हैं। इसके पहले ये काॅपरेटिव में सन् 1976 से 1988 तक नौकरी किए। वर्तमान समय में 20 वर्षों से वटेश्वर हनुमान जी मंदिर में अपनी सेवा दे रहे हैं। वे बताते हैं कि 1945 के लगभग स्व0 कृष्ण कुमार मिश्रा आपके सबसे बडे़ भ्राता थे जिनके मार्ग दर्शन में आप रामलीला से परिचय प्राप्त किये।

श्री रामजनम मिश्र– सन् 1983 से रामायणी के रूप में अपनी सेवा दे रहे हैं। इनके पूर्व आपके परिवार से पिता स्व0 रामाचरण मिश्र ने 17 वर्ष तक रामायणी की भूमिका का निर्वहन किया है। आप ग्राम- गौरहीं, अदलहाट, जनपद- मीरजापुर के रहने वाले हैं।

 

श्री सूर्यकांत मिश्र– सन् 1985 से रामनगर की रामलीला में बतौर रामायणी रामायण पाठ कर रहे हैं। इनका निवास स्थान जिवनाथपुर, पटनवा है। रामलीला में अपनी सहभागिता व रामनगर में आगमन के सम्बन्ध में आपने बताया कि ‘‘राजा महीप नारायण सिंह जब समस्तीपुर से बनारस आये तब उन्हीं के साथ हमारा परिवार भी बनारस आया।’’ उसी समय से इनका परिवार राज दरबार से सम्बन्धित रहा है और राज परिवार की भूमि पर ही कृषि द्वारा जीवनयापन कर रहे हैं। रामलीला में रामायणी के रूप में अपनी भूमिका के संदर्भ में इन्होंने बताया कि ’’रामायण पाठ से मेरा लगाव इसलिए है कि रामजी स्वयं रक्षा करते हैं और श्रीरामचरितमानस पाठ से लोक और परलोक दोनों सुधरते हैं। अब बस यही इच्छा है कि जब तक रहें रामायणी का निर्वहन करते रहें और यही संस्कार अपने बालकों में आये। ’’

रामलीला के स्वरूप और रामायण पाठ में आये बदलावों के प्रश्न पर बताते हैं कि पहले जैसा शासन और राजसी भय अब नहीं है। कुछ पुरानी चीजें कमजोर हो गयी हैं और इनका लोप होने के बाद वह नहीं आती, न तो पहले वाली पोथी रह गयी है और न ही पहले जैसे पाठ करने वाले।

श्री महेन्द्र नाथ मिश्रा– मीरजापुर के चुनार, अदलहाट कैलहट क्षेत्र के गौरही गांव निवासी महेन्द्र नाथ मिश्र 7 वर्ष से रामायणी के रूप में रामलीला में हैं। श्रीरामलीला में इनके परिवार का यह प्रथम जुड़ाव है। आप वर्ष 2009 से रामलीला से जुड़े हुए हैं। ‘‘ग्रामीण पृष्ठभूमि के होने, समाज सेवा में रूझान होने व युवा अवस्था से ही रामलीला देखने आने लगे, जिसके कारण मेरे मन में बहुत इच्छा थी कि रामनगर की इस रामलीला में कुछ सेवा करें, जिसका अवसर हमें 2009 में रामायणी के रूप में प्राप्त हुआ।’’ आप कहते हैं कि ‘रामायण गाने का अपना ही आनन्द है।’ मै युवा अवस्था में कजरी गाने का शौकीन था। ऐसे में रामायण गाना एक सन्तोष का कार्य है और प्रभु की सेवा का लाभ मिलता है।’’

श्री रजनी कान्त झा– आप सन् 2001 से रामायणी के रूप में सेवा कर रहे हैं। पूर्व में आप के बड़े पिताजी श्री जयनारायण झा जी रामायणी थे। प्रभु श्रीराम के प्रति अटूट श्रद्धा एवं समर्पण को रामायणी की भूमिका के निर्वहन के लिए कारण बताते हुए आपका कहना है कि ‘यह श्रीराम का कार्य है इसलिए पारिश्रमिक नेपथ्य में है।’’ वर्तमान में रामलीला में व्याप्त दुव्र्यवस्था पर रोष जताते हुए कहा कि ‘‘ज्यादातर लीला स्थलों पर कंकड़, गिट्टी है। इस पर रामायणी नंगे पैर चलते हैं। स्व0 महाराज श्री विभूति नारायण सिंह के समय श्रीरामलीला में संध्याकाल के दौरान आराम करने का समय मिल जाता था। परंतु अब नहीं है। रामायणी दल को दिये जाने वाले दान में भी कमी आ गई है। अब रामायणी दल में पहले जैसे नारद वाणी गाने वाले आवाज नहीं रह गई है।’’

श्री शम्भु त्रिपाठी– पेशे से नर्सरी स्कूल में अध्यापक शम्भु त्रिपाठी सन् 2010 से रामायणी के रूप में रामनगर की रामलीला से जुड़े हैं। रामायणी की भूमिका निर्वहन के प्रति इनका कहना है कि ‘‘यह बड़े सौभाग्य की बात है कि मैं रामकाज से जुड़ा हूँ।’’

 

 

श्री रविशंकर पाण्डेय– पिछले 9 वर्ष से रामायणी की भूमिका में हैं। इसके पूर्व इनके पिताजी पण्डित स्व0 दीनदयाल पाण्डेय जी ने 35 वर्ष तक रामायण पाठ किया जो काफी चर्चित भी रहे हैं। रामायणी भूमिका इस परिवार को रामलीला के प्रारम्भ से ही विरासत में मिली हुई है। शुरूआत के क्रम से इस परिवार में रामायणी की भूमिका में स्व0 भोलानाथ पाण्डेय, छुन्नी पाण्डेय, बिहारन पाण्डेय, रामजी पाण्डेय रामायणी रह चुके हैं।

श्री विजय कान्त मिश्र– ग्राम- पटनवाँ, के निवासी विजय कान्त मिश्र जी पिछले डेढ़ दशक से रामनगर की रामलीला में रामायणी की भूमिका में हैं। रामजी की सेवा को ही अपना सर्वस्व मानने वाले मिश्र जी का कहना है कि ‘जब तक शरीर साथ देगा और रामजी की कृपा रहेगी यह कार्य करता रहूँगा।’

 

 

श्री प्रेम दयाल पाण्डेय ‘पप्पू’– 

रामनगर की रामलीला में रामायणी दल के साथ एक मृदंग वादक भी होते हैं जो नारदी गायन में मृदंग वादन करते हैं। वर्तमान में रामायणी दल में मृदंग वादक के रूप में प्रेम दयाल पाण्डेय हैं, जो पिछले 9 वर्ष से मृदंगी की भूमिका में हैं। इनसे पूर्व इनके गुरू श्री जितेन्द्र किशोर पाण्डेय मृदंग वादन का कार्य करते थे।

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