रामनगर, रामलीला का रंगमंचीय पक्ष

(अभिनय] साज-सज्जा एवं संवाद)

रामनगर के रामलीला की पात्र योजना उसके संवाद, उसकी मंचीय संकल्पना, उसकी रंगशाला और दृश्य योजना यानी मोटेे तौर पर कहें तो उसकी प्रस्तुति भारतीय रंग परम्परा में एक नया अध्याय जोड़ती है। दो सौ सालों से से भी अधिक समय से चली आ रही यह लीला अपने सम्पूर्ण नाटकीय स्वरूप में भारतीय परम्परा की प्रायः सभी नाट्य शैलियों का सम्मुच्चय होते हुए भी किसी एक जैसी नहीं है। यह अपनी प्रस्तुति के लिए भारतीय रंग परम्परा का ‘कोलाज’ रचती सी प्रतीत होती है। भारतीय परम्परा की जितनी भी रंग शैलियाँ हैं उन सबसे कुछ-कुछ प्रभाव ग्रहण कर इस लीला ने अपनी अभिव्यक्ति का एक ऐसा पहल खड़ा किया जिसे देखकर ‘रिचर्ड शेकनर’ जैसा पश्चिमी रंगकर्मी भी हतप्रभ रह गया। सनद रहे कि रामनगर की रामलीला देखकर जब रिचर्ड शेकनर यहाँ से अपने देश लौटे तो उन्होंने यहाँ की रामलीला की मंच-सज्जा और दर्शक की कल्पनाशीलता का सहारा लेकर शेक्सपियर समेत दुनिया के तमाम महान नाटककारों के दुरूह नाट्यों का मंचन किया। परिचय की रंग परिकल्पना जो कि अरस्तू के संकलन त्रय (समय, स्थान और कार्य-व्यापार) के आधार पर संचालित हो रही थी, अपनी तमाम खूबियों के बावजूद कई ऐसी सीमाओं में बंधी हुई थी कि रचनाकार की अपनी वैयक्तिक छूटों को अभिव्यक्त कर पाने में असमर्थ थी। एशियाई मूल की कल्पनाशील नाट्य परम्परा का मंचन तो लगभग असम्भव था। ऐसे में भारतीय नाट्य परम्परा के एक मजबूत उदाहरण के रूप में विद्यटित रामनगर की रामलीला को देखकर भारतीय नाट्य परम्परा और खासकर रामायण और महाभारत का मंचन अन्य देशों में सम्पन्न हो सका। यह रामलीला का ही प्रभाव था कि कई सारे पश्चिमी रंगकर्मियों ने (जिनमें रिचर्ड शेकनर के साथ पीटर बु्रक जैसे महत्वपूर्ण रंगकर्मी का नाम शामिल है) भारतीय नाट्य परम्परा को आधार बनाकर अरस्तू के संकलनत्रय को धत्ता बताते हुए रामायण और महाभारत का मंचन कई पश्चिमी देशों में किया।

रामलीला भी अभिनय द्वारा श्रीराम के जीवन चरित्र को दोहराने और प्रस्तुत करने की एक घटना है लेकिन यह नाटकों या उनकी शैली से अत्यन्त अलग है। नाटक में निर्देशक कहता है- ‘‘दर्शकों को देखकर संवाद  बोलो‘‘ किन्तु यहां नियम ही अलग है, या यूँ कहें कि यहां की रामलीला में दर्शक होते ही नहीं बल्कि प्रत्येक दर्शक स्वयं में लीला का पात्र है। यहां विवाह के प्रसंग में ही जो अयोध्या के पास से बारात के साथ चला वो बाराती, जो जनकपुर में ही पहले से उपस्थित वो घराती, दरबार में है तो दरबारी, इसी तरह वनगमन में सभी लीला प्रेमी स्वरूपों के साथ वनवासी हो गये और आरती के समय भक्त।

बन्द थियेटर में खेले जाने वाले नाटकों की परम्परा से इतर रामनगर की रामलीला का कई स्थलों में विभाजित मुक्ताकाशीय मंच बहुत ही व्यापक है, जहां पात्र बिना किसी निर्देशक के अभिनय करते हैं। पात्र अपनी भूमिका जीता है। उसे कोई देखता है, सुनता है; इसकी चिंता नहीं है। कई बार तो एक साथ कई स्थलों पर दर्शक बैठे मिल जायेंगे। यथा-लंका पर रामलीला के दौरान सुबेरगिरि पर्वत पर भक्तों से घिरे श्रीराम विराजे हैं, तो वहां से अन्य स्थल अशोक वाटिका में माता सीता भक्त स्त्रियों से घिरी, कई फर्लांग दूर-रावण का दरबार है, रंगशाला है, रणभूमि है। कुल मिलाकर एक स्थल से दूसरा नहीं दिखता फिर भी दर्शक निष्ठा से सब जगह बैठे रहते हैं।

अन्य पात्रों और स्वरूपों के बीच सामंजस्य भी एक दैवीय कृपा ही है। मुख्य स्वरूप श्रीराम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और सीता को दो महीने तक बलुआ घाट धर्मशाला में व्यास प्रशिक्षित करते हैं लेकिन अन्य पात्रों से उनकी मुलाकात सीधे रामलीला स्थल पर ही होती है। वहां जाने पर ही स्वरूपों को पता चलता है कि ये दशरथ हैं, ये कौशल्या इत्यादि। स्वरूपों को भी प्रशिक्षण के दौरान संवाद याद करने पर ही ज्यादा ध्यान दिया जाता है। अन्य पात्र स्वयमेव ही तैयार होकर आते हैं और बिना किसी जटिल औपचारिक निर्देशन के लीला होती है। हालांकि संवाद अदायगी को दो-दो व्यास वही मौजूद रहते हैं, जिनके पास संवाद की पोथी रहती है। मुख्य स्वरूपों की सहायता पं0 रघुनाथ दत्त व्यास करते हैं तो अन्य पात्रों की सहायता के लिए पं0 लक्ष्मीनारायण पाण्डेय उपलब्ध रहते हैं। अभिनय के दौरान व्यास पात्रों के ठीक पीछे खड़े रहते हैं ताकि जब भी पात्र संवाद भूले उसे तत्काल स्मरण करा दिया जाये।

श्रीरामलीला के मंचन में प्रकाश या ध्वनि द्वारा विशेष प्रभाव लाने का प्रयास नहीं किया जाता है, बल्कि प्रतीकात्मक रूप से कहीं-कहीं इनका प्रयोग अवश्य किया जाता है। जैसे धनुष यज्ञ, खरदूषण वध, मेघनाद द्वारा लक्ष्मण जी को शक्ति प्रयोग की लीलाओं में तोप दागा जाता है, जिसके पीछे कारण माना जाता है कि – धनुष भंग के समय जोर की आवाज हुयी थी, खरदूषण काफी शक्तिशाली था, मेघनाद का शक्ति-बाण शक्तिशाली था; अस्तु इनके सांकेतिक प्रदर्शन के लिए तोप छोड़ा जाता है। इसी प्रकार श्रीराम द्वारा अहिल्या उद्धार के प्रसंग में तथा रावण की अन्त्येष्टि में आग के गोले से बना गुब्बारा आकाश में यह दर्शाने के लिए छोड़ा जाता है कि ये लोग गोलोकवासी हो गये, लेकिन विद्युत चलित ध्वनि एवं प्रकाश का यहां बिल्कुल प्रयोग नहीं होता। सब कुछ स्वाभाविक रूप से दिखाने का प्रयास किया जाता है।

रामलीला की साज-सज्जा साधारण है। यहां प्रयोग में आने वाले अधिकांश उपकरण वर्षों पुराने हैं और हर बार उनका रंग-रोगन द्वारा मरम्मत करके उपयोग में लाया जाता है। यथा-अयोध्या में लगने वाले खम्भे, सिंहासन, वशिष्ठ का निवास, जनकपुर में बना सिंहासन, अशोक वाटिका स्थल, श्री राम बारात, भरत मिलाप और अन्य अवसर पर काम आने वाले रथ, पुष्पक विमान आदि रामलीला संग्रहालय में रखे रहते हैं और प्रतिवर्ष रामलीला से दो माह पूर्व इनकी मरम्मत तथा रंग रोगन प्रारम्भ हो जाता है और आवश्यकतानुसार इनको रख दिया जाता है। शेषनाग, ताड़का, खरदूषण, मेघनाद, कुम्भकर्ण, अक्षय कुमार, सुरसा तथा रावण इत्यादि के पुतले बनाने का काम भी एक महीने पहले से ही ठेके पर करवाया जाता है।

पात्रों को भी उनकी भूमिकानुसार वस्त्राभूषण, मुखौटे, शस्त्र, रामलीला शुरू होने से पूर्व दे दिये जाते हैं। जैसे हनुमान को लाल वस्त्र और तलवार, रावण को मुखौटा तथा तलवार आदि। रामलीला समाप्ति पर ये सभी साजो-सामान वापस ले लिए जाते हैं। पात्रों की वेशभूषा में विशेषतः मखमली चोला, रेशमी पीताम्बर, कमर पटुका, उत्तरीय, मुकुट, हार, बाजूबंद प्रयोग करते हैं। सीता को बनारसी साड़ी पहनाते हैं। श्रीराम की सेना के वीर पगड़ी, दुपट्टा, मिर्जई, पैजामा, काछनी, फेटा इत्यादि धारण करते हैं। हनुमान जी लाल, अंगद और सुग्रीव पीला, नल-नील नीला, जामवंत काला तथा विभीषण लाल झालरदार वस्त्र पहनते हैं। राक्षसों की पोशाक काली होती है।

रामनगर की रामलीला में पात्रों के मुखौटे विशेष उल्लेखनीय हैं। मुखौटे कपड़े, पीतल और कागज की लुगदी के बने होते हैं। कुछ मुखौटे बहुत ही भव्य होते हैं मुख्य रूप से रावण का कपड़े के जरी के काम वाला और हनुमान का भारी-भरकम मुखौटा। अंगद, सुग्रीव जामवन्त का मुखौटा पीतल का होता है। राक्षसों के मुखौटे कपड़े के होते हैं।

पात्र साज-सज्जा- भगवान शंकर और नारद को छोड़ कोई भी पात्र ‘मेकअप’ का प्रयोग नहीं करता हालांकि राजा दशरथ, सुमन्त, जनक आदि अपने माथे पर चन्दन का लेप लगाते हैं। इन पात्रों को अपना ‘मेकअप’ स्वयं करना होता है। सभी पात्र अपने घरों से ही रामलीला के पात्र वाली वेशभूषा में ही रामलीला स्थल पर आते हैं।

पंचस्वरूपों की साज-सज्जा- पंचस्वरूपों का श्रृंगार लीला के प्रारम्भ काल में रामरज या गेरु से होता था, बाद में काशी के राजाराम सिंगारिया द्वारा वर्तमान श्रृंगार होने लगा। मुख्य स्वरूपों को सजाने में लगभग 4 घण्टे का समय रोजाना लगता है। मुख्य स्वरूपों को सजाने का काम भी व्यास करते हैं। बलुआ घाट धर्मशाला में पांचों पात्रों की रूप-सज्जा की जाती है। इनके हाथ, पैर एवं चेहरों पर चमक पैदा करने के लिए विभिन्न रंगों से सजी मुर्दाशंख लगायी जाती है। इसके बाद दृश्य के अनुसार धनुष-बाण, तरकस, आभूषण, माला, मुकुट आदि से सजाया जाता है, जिससे स्वरूपों का सौन्दर्य प्रभावी हो सके।

स्वरूपों के लिए प्रसंगानुसार रहने और आने-जाने के लिए अलग-अलग स्थान हैं। यथा रामलीला जब अयोध्या और जनकपुर तक रहती है तो स्वरूप एक पालकीनुमा बग्गी और साधु-संतों के कंधे पर आते जाते हैं और बलुआघाट धर्मशाला में निवास करते हैं। वनगमन के बाद ये क्रमशः रामबाग और लंका स्थित महाराज के बगीचे में निवास करते हैं और साधुओं के कंधे पर आते-जाते हैं।

संवाद- श्री रामलीला की संवाद शैली अत्यन्त ही भावपूर्ण है, जहाँ लय एवं ताल का विशेष ध्यान रखा जाता है। भाव एवं प्रसंग के अनुसार संवाद अदायगी में विराम, अल्प विराम, गति तथा उतार-चढ़ाव का यथोचित ध्यान रखा जाता है। अभिनय कर रहे पात्रों को इस बात का प्रशिक्षण दिया जाता है कि संवाद अदा करते समय उनकी आवाज यथासामथ्र्य ऊँची तथा लयबद्ध होनी चाहिए ताकि समुपस्थित श्रोतागण आसानीपूर्वक अनुश्रवण कर सकें। पीढ़ियों से परम्परा के रूप में एक ही पात्र का अभिनय कर रहे परिवार के स्थानापन्न पात्र को ये संवाद अनायास ही याद हो जाते हैं। साथ ही श्रद्धापूर्वक श्रीरामलीला का अनुश्रवण करने वाले तमाम नेमीजनों को अधिकांश संवाद अक्षरशः स्मरण है।

रामलीला के संवादों की भाषा रामायण की मध्य शैली या अवधी है जिसका शोधन काष्ठजिह्वा स्वामी ने किया था। काष्ठजिह्वा स्वामी विद्वान और सन्त थे वे देवतीर्थ और देवस्वामी के नाम से भी जाने जाते थे। वाक् साधना के लिए इन्होने अपनी जीभ को लकड़ी से वेधित कर रखा था इसलिए इनका नाम काष्ठजिह्वा स्वामी पड़ गया। वे तत्कालीन महाराज ईश्वरी नारायण सिंह के गुरु थे। श्रीरामचरितमानस पर इन्होंने ‘श्री मानस परिचर्चा’ नामक टीका टिप्पणी भी लिखी थी। काष्ठजिह्वा स्वामी की रचनाओं को प्रभु नारायण सिंह जी महाराज ने 1903 ई0 में लिखवाया था। इस रामलीला में जो संवाद प्रयोग किये जाते हैं वह काष्ठजिह्वा स्वामी द्वारा रचित और शोधित हैं। हाँलाकि संवादो में कहीं-कहीं भाषा की क्लिष्टता इसे समझने में सुगमता नहीं देती, इसके बावजूद सामान्य तौर पर अवधी की सरल भाषा में लिखे गये संवाद लोगों को आकर्षित करते हैं।

        पहले जनकपुर की लीलाओं का संवाद जनकपुर वासियों द्वारा मैथिली भाषा में किया जाता था लेकिन बाद में महाराजा प्रभु नारायण सिंह की इच्छा या आज्ञानुसार अवधी में कर दिया गया। संवाद का एक दृष्टान्त यहाँ प्रस्तुत है- श्रीराम उपवन विहार के लीला में श्रीराम से भरत जी कहते हैं-

‘‘हे नाथ मैं दास ठहरा, कृपा औ आनन्द के समूह सुनिए निःसन्देह केवल आपही देख पाते मोको स्वप्न में भी कोप और मोह नहीं है,  तथापि  हे कृपानिधि आपसे ढिठाई करता हौं काहे कि मैं सेवक हौं औ आप सेवकों को सुख देने वाले हैं वह यह कि सन्तों की महिमा बहुत रीति से वेद और पुराण ने भी कहा है औ श्रीमुख से आपने भी बड़ाई किया है औ तेहिके ऊपर प्रभु की प्रीति भी बहुत रहती है सो हे गुणग्राहक -ज्ञानसमूह  और कृपासमुद्र मैं उनका लक्षण सुनना चाहता हौं, इसलिए हे प्रनतपाल! असन्त-सन्तके भेद को बिलगाय के कहा जाय।’’

        रामलीला में गाये जाने वाले कवित्त और क्षेपक रामलीला को एक अद्भुत भाव प्रदान करते हैं। उदाहरण स्वरूप केवट द्वारा श्रीराम को गंगा पार कराने के प्रसंग में गाये जाने वाला कवित्त प्रस्तुत है-

कवित्त-

‘‘तुम तो तरनि कुल पालन करनहार,

हमहूँ तरनि ही के पार करैया हैं।।

भीम भवसागर के सुघर खेवैय्या आप,

हमहूँ सदैव देवसरि के खेवैया हैं।।

कौतुकी कुपंथिनिको पार करवैय्या नाथ,

हौं तौ जग पावनिको पार करवैय्या हैं।।

हम तुम भैया एक कर्मके करैय्या राम,

केवट सो केवट न लेत उतरैय्या हैं।।’’

क्षेपक-

        ‘‘इमि सुविचारत मुनिमन माँही।

        श्री रघुबर वर तिन्हके पाही।।

        हाथ जोरि करि ऐसे बानी। कहत भये मधुराई ज्ञानी।।

        पितु आज्ञा सों पितु बचन गौरव सो तब बैन।

        कौशिक करिबो है उचित, करिहै शंकर मैन।।’’

        इसी प्रकार श्रीराम और लक्ष्मण के रूप की प्रशंसा में घनाक्षरी द्वारा बोला गया पद लीला प्रेमियों को मुग्ध करता है-

‘‘जैसी ए ललित लड़ैती मिथिलेश जू की,

        तैसही अवधेशको दुलारो रस मीना हैं।।

        याहि देखि लाजति रति होत है विकल मति,

        याही ते विलोकत पंच बान अधीना है।।

        जबसे मुरारी यों विदेहपुर नारी कहै,

        यह तो संयोग का विधि लिख दीना हैं।।

        टूटै न टूटै धनुष बाल सखी साँची कहौ,

        सिया सोनेकी अँगूठी राम साँवरों नगीना हैं।।’’

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *