रामनगर की रामलीला के स्थल

एक मंच पर होने वाले घटना क्रम को नाटक की संज्ञा दी जाती है और रामनगर की रामलीला का मंचन स्थल रामनगर किले से लेकर 4 किमी0 दूर लंका तक फैला हुआ है। जगह-जगह पर अयोध्या, जनकपुर, पंचवटी, लंका, चित्रकूट, निषादराज आश्रम, अशोक वाटिका, सनक- सनन्दन रामबाग आदि स्थान हैं जहाँ रामचरित मानस में वर्णित घटनाक्रम के अनुसार लीलायें सम्पादित की जाती हैं। इन स्थलों की थोड़ी जानकारी यहाँ दे देना उपयुक्त होगा।

लगभग दो सौ सालों से स्थापित परम्पराओं में रंचमात्र भी परिवर्तन नहीं हुआ है। पात्रों की मौलिक वेशभूषा संवाद अदायगी आदि सब कुछ परिवर्तन विहीन है। कुछ लोग यह आक्षेप लगाते हैं कि रामनगर की श्रीरामलीला मीलों की दूरी में चक्कर काटते हुए अनेक स्थानों में घूम-घूम कर होती है अतः दर्शकों को बड़ा कष्ट होता है इसलिए यदि यह एक जगह एक मंच पर हो और बैठने के लिए कुर्सियों की व्यवस्था हो तो लीला प्रेमियों को सुख मिलेगा। लेकिन यहाँ यह कहना समीचीन होगा कि रामनगर के नित्य लीला प्रेमी दर्शक ‘देवी भूत्वा देवं अजेत’ की भावना से ओतप्रोत होकर भगवान के दर्शन आराधना के लिए पहुंचते हैं। देवताओं और पूज्य जनों के समक्ष ऊँचे स्थान पर बैठना शास्त्र निषिद्ध है इसलिए कुर्सी की व्यवस्था नहीं की जाती।

        एक मंच पर होने वाले घटना क्रम को नाटक की संज्ञा दी जाती है और रामनगर की रामलीला का मंचन स्थल रामनगर से लेकर 4 किमी0 दूर लंका तक फैला हुआ है। जगह-जगह पर अयोध्या, जनकपुर, पंचवटी, लंका, चित्रकूट, निषादराज आश्रम, अशोक वाटिका, सनक सनंदन रामबाग नामक आदि स्थान हैं जहाँ रामचरित मानस में वर्णित घटनाक्रम के अनुसार लीलायें मंचित की जाती है। इन स्थलों की थोड़ी जानकारी यहाँ दे देना उपयुक्त होगा।

        रामनगर की रामलीला के स्थलों के बारे में यह भी जान लें कि इसके सभी स्थल शोधित किये गये हैं रामलीला के सभी स्थलों का शोधन एक सप्तर्षि विद्वत मंडल ने किया था जिसमें महादेवाश्रम गायघाट के स्वामीजी, काष्ठजिह्वा स्वामी, तुलसीदत्त झाॅ, पं0 मथुरानाथ, महाराजा ईश्वरी प्रसाद नारायण सिंह, बाबू हरिहर सिंह, उमराव पण्डित आदि प्रमुख थे।

रामनगर की समस्त लीलामय भूमि जिन्हें वर्तमान में भी उन्हीं नामों से जाना जाता है भिन्न-भिन्न लीला के लिए अलग-अलग स्थान दिशा का ध्यान रखते हुए बनाये गये हैं। यथा अयोध्या से पूर्वोत्तर जनकपुर एवं विश्वामित्र का स्थान, लंका, पम्पासर दक्षिण में है सो रामनगर में भी यह स्थान इन्हीं दिशाओं में बने हैं। लंका की रणभूमि से हनुमान जी संजीवनी लेने उत्तर हिमालय जाते हैं। वैसे ही रामनगर की रामलीला में भी इस प्रसंग में हनुमान जी उत्तर दिशा में अशोक वाटिका जहां माता सीता रावण द्वारा हरण के बाद रहती हैं। एक सुन्दर बाग है और जिस मन्दिर के नीचे सीता जी हनुमान जी का संवाद सुनती हैं उसके दोनों तरफ अशोक के वृक्ष लगे हुए हैं। रामनगर की रामलीला में प्रथम दिवस बैकुण्ठ का स्थान ऊपर और क्षीरसागर पृथ्वी पर तालाब में स्थित है। इसी प्रकार दोनों का भाव यहां की लीला में होता है। इसके अतिरिक्त रामायण में आये हुए तमाम स्थान गिरिजा मन्दिर, जनकपुर, निषाद आश्रम, भारद्वाज आश्रम, नन्दी ग्राम, सबरी का स्थान, पंचवटी, पम्पासर, प्रवर्षण गिरी, चित्रकूट, सुबेरगिरी, लंका आदि स्थान बने हुए हैं।

रामनगर की रामलीला में रामायण के प्रसंग के अनुसार ही स्वरूपों का प्रशिक्षण तथा श्रृंगार का स्थल भी अलग-अलग निर्धारित है। यथा जब तक प्रभु श्रीराम अयोध्या में रहते हैं, (वनगमन के पूर्व तथा भरत मिलाप के लीला के बाद तक) प्रशिक्षण एवं श्रंृगार स्थल गंगा नदी के किनारे बलुआ घाट स्थित धर्मशाला में होता है। वनगमन के पश्चात् तथा पंचवटी निवास तक प्रशिक्षण एवं श्रृंगार रामबाग में होता है तथा लंका पर मंचन होने वाले और भरत मिलाप के पूर्व तक

 के प्रसंग में श्रृंगार एवं प्रशिक्षण लंका मैदान के पास अशोक वाटिका में स्थित भवन में सम्पन्न होते हैं। रामनगर की रामलीला के स्थलों में मूर्त और अमूर्त कई स्थल हैं जिनको संख्या में नहीं बांधा जा सकता परंतु यह एक छोटा प्रयास है रामनगर की रामलीला के स्थलों का परिचय देने में। जिसमें इन स्थलों को दो भागों प्रमुख स्थल और उप स्थल में बांटा गया है जिनमें प्रमुख हैं-

धर्मशाला (बलुआ घाट) – यह धर्मशाला रामनगर बलुआ घाट पर स्थित है। चतुर्भुजाकार परिक्षेत्र में स्थित इस धर्मशाला में छोटे कमरेबने हैं तथा धर्मशाला की छत पर एक शिव मंदिर स्थापित है। धर्मशाला में दो बड़े गलियारे तथा एक बड़ा आंगन भी है। धर्मशाला में ही रामलीला के पंच स्वरूपों का लीला आरम्भ से एक माह पूर्व का प्रशिक्षण सत्र एवं लीला मंचन के दौरान अयोध्या में होने वाले सभी प्रसंग के लिये प्रशिक्षण एवं श्रृंगार का कार्य होता है। इसी धर्मशाला में रामलीला के पंच स्वरूपों के व्यास श्री रघुनाथ दत्त सपरिवार रहते भी हैं।

चैक स्थित पक्की-  यह स्थल रामनगर की रामलीला में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। पक्की पर यूं तो रामलीला के किसी भी प्रसंग का मंचन नहीं होता परंतु रामलीला की विधिवत शुरूआत इसी स्थान से होती है। पक्की पर ही रामलीला का प्रथम एवं द्वितीय गणेश पूजन तथा पंचस्वरूपों का पूजन होता है। साथ ही रामलीला के प्रारंभ में मानस के बालकाण्ड  के  आदि मंगलाचरणम् ‘‘वर्णानाम् अर्थ संघानाम’’ प्रसंग प्रारम्भ होने से पूर्व रामचरितमानस के 175वें दोहे-

भरद्वाज सुनु जाहि जब, होहि विधाता बाम।

धूरि मेरु सम जनक जम, ताहि ब्याल सम दाम।। तक का

 

 पाठ होता है। यह स्थल रामनगर चैराहे पर स्थित है जिस पर चतुष्कोण में फैले विस्तृत दालान एवं परिस्कृत भूभाग में प्रथम एवं द्वितीय गणेश पूजन सम्पन्न होता है साथ ही लीला के पंचस्वरूपों के अतिरिक्त अन्य पात्र इसी स्थल पर तैयार होकर लीला स्थल पर जाते हैं। लीला से सम्बन्धित सभी वस्त्र और सामान इसी पक्की पर बड़े-बड़े लकड़ी के बक्सों में रखे रहते हैं।

अयोध्या- इन स्थलों में सबसे प्रमुख अयोध्याजी रामनगर किले से 100 मीटर पूर्व में है। यहाँ रामजन्म से लेकर वनागमन तक फिर उसके बाद भरत मिलाप से लेकर राज्याभिषेक तक की महत्वपूर्ण लीलायें होती है।

यह श्रीराम के गृहनगर रूप में अवस्थित है। यह तीन ओर से लगभग 12 फुट ऊँची मोटी चाहरदीवारी से घिरा हुआ है जिसके भीतर कमरे बने हुए थे। अयोध्या के प्रवेश द्वार के दायी और बायीं तरफ बने कमरे जीर्णशीर्ण होने के कारण अब गिरा दिये गये हैं। वर्तमान में मुख्य द्वार के सामने बने कमरे ही अस्तित्व में हैं जिनके छत के ऊपर पिलर ढालकर अयोध्या के राजमहल का रूप दिया गया है। लीला के आरम्भ काल से ही इन खम्भों के ऊपर तम्बू डालकर छत का रूप दिया जाता रहा है। इस भवन को प्रखण्डों में बाँटा गया है।

निम्न प्रखण्ड-

        जहाँ अयोध्या के नागरिक बैठते हैं।

द्वितीय प्रखण्ड-

        इसमें सिंहासन और छत्र लगा हुआ है। इसी में एक ओर श्रृंगी ऋषि की यज्ञशाला भी है तथा प्रवेश द्वार के दायीं ओर गुरु वशिष्ठ जी के बैठने का स्थल बना हुआ है।

तृतीय खण्ड-

        यह सबसे उच्च प्रखण्ड है जहाँ श्रीराम और उनके परिवार के लोग रहते हैं। इसके अगल-बगल की छतों पर दर्शक यानी अयोध्या के नागरिक रहते हैं।

        जब विश्वामित्र मुनि यज्ञ की रक्षा के लिए श्रीराम लक्ष्मण को दशरथ से मांग कर ले जाते हैं तो लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल के ठीक पीछे ताड़का-सुबाहु बध और फिर आगे स्थित एक सीवान में अहिल्यातरण की लीला सम्पन्न होती है।

        इसके बाद जंगली रास्तों से होते हुए लीला जनकपुर पहुँचती है जो माता सीता का गृहनगर है। यह स्थल पी0ए0सी0 के उत्तरी भाग की ओर स्थित है। इसमें भी धनुष यज्ञ, फुलवारी की लीला, रामबारात आगमन, विवाह और विदाई की लीलाएँ होती है। यहाँ भी राजा जनक का दरबार अलग, धनुषयज्ञ स्थल अलग और विश्वामित्र मुनि के ठहरने का स्थान अलग-अलग है।

जनकपुर- यह माता सीता जी का गृह नगर है। यह स्थल जनकपुर के नाम से प्रसिद्ध है जो पी0ए0सी0 छावनी के उत्तरी भाग की ओर स्थित है।

 यहां श्रीराम-सीता जी के कोहबर की सम्पन्न झांकी का एक मन्दिर है। यह मन्दिर लगभग 100 वर्ष पुराना है जो चुनार के बलुआ पत्थरों से निर्मित खम्भों पर बना स्थापत्य की अद्भुत कृति है।

        जनकपुर मन्दिर के प्रांगण में ही धनुषयज्ञ शाला बना है जिस पर धनुष तोड़ने के प्रसंग का मंचन होता है। वहीं प्रांगण के मध्य में विवाह स्थल के लिए एक मंच बना है जिस पर श्री सीता-राम विवाह का प्रसंग सम्पन्न होता है। प्रांगण में ही दक्षिणी छोर पर सीढ़ियों से चढ़कर जाना होता है वहां धनुष यज्ञ के लीला की आरती होती है।

गिरिजा मन्दिर (उपस्थल):- यह रामनगर स्थित 36वीं वाहिनी पी0ए0सी0 के परिसर में स्थित है। जिसमें गिरिजा जी की सफेद संगमरमर की प्रतिमा है। इसी मन्दिर में रामलीला के चैथे दिवस फुलवारी व गिरिजा पूजन के प्रसंग का मंचन होता है।

चित्रकूट- यह स्थल रामबाग पोखरे के पश्चिमी किनारे की भूमि पर बना है। यहां श्रीराम का निवास कई दिनों तक रहने से इस स्थल का महत्व बढ़ जाता है। चित्रकूट वनगमन के मध्य अस्थायी निवास हेतु एक कुटिया का प्रतीक है। स्थायी रूप से सीमेंट से बने इस चबूतरे पर चार खंभे भी बने हैं जिन्हें लीला मंचन के दौरान एक सफेद तंबू से ढक दिया जाता है। इसे रमणीय एवं कलात्मक तरीके से सजाने के लिए वस्त्र, बांस और पत्ते आदि का प्रयोग हुआ है। इस स्थल में कई प्रखण्ड हैं। एक प्रखण्ड में महाराज हाथी पर सवार हैं, रामायणीगण उनके समक्ष बैठे पाठ सुनाते हैं। यह भाग सिंहासन और दुर्गा मंदिर (पोखरे से पूर्वी ओर) से जुड़ा दिखायी पड़ता है। द्वितीय प्रखण्ड मंे अशोक की पत्तियों द्वारा अक्षाकार ढंग से सजायी गयी छोटी-छोटी पहाड़ियां हैं। यह स्थल रामलीला प्रेमियों में वास्तविक चित्रकूट (उ0प्र0) के तरह ही प्रसिद्ध व श्रद्धा का केन्द्र है।

चित्रकूट से विदाई के पश्चात् भरत व शत्रुघ्न के स्वरूपों द्वारा इस स्थल की परिक्रमा की जाती है जिसमें रामलीला में पधारे नेमी व श्रद्धालुगण भी परिक्रमा करते हैं। अनुश्रुतियों के अनुसार स्वामी करपात्री जी महाराज जब भी रामनगर रामलीला के स्थलों से होकर गुजरते थे, तो लंका को छोड़कर सभी स्थलों को छूकर प्रणाम करते थे।

उपस्थल– चित्रकूट से विदाई के पश्चात श्रीराम जब पंचवटी की तरफ जाते हैं तो मार्ग में श्री रामचरित मानस में वर्णित प्रसंगों के अनुसार अत्रि, सुतीक्षण, श्रृंगी व भारद्वाज, वाल्मीकि मुनि से मिलते हैं। ये सभी स्थल रामबाग पोखरे से पंचवटी के मार्ग पर छोटे-छोटे चबूतरे के रूप में स्थित हैं।

पंचवटी- यह स्थान रामनगर चैराहे से पूर्व की ओर जाने वाली सड़क (लगभग 2 किमी की दूरी) पर है। यह एक बड़ा मैदान है जो एक सम्पर्क मार्ग (रामनगर-मुगलसराय) द्वारा दो भागों में बंटा है। मार्ग के बायें तरफ स्थित मैदान दो प्रखण्डों में बंटा है। उच्च प्रखण्ड में एक सुन्दर कुटिया बनी है, जहां श्रीराम सीता विराजते हैं तथा निम्न प्रखण्ड पर लक्ष्मण जी रहते हैं। नक्कटैया की लीला में यह स्थल रणक्षेत्र के रूप में प्रयुक्त होता है।

उपस्थल- शबरी फल, जटायु अन्त्योष्टि, सीता हरण।

पम्पासर- यह स्थल भीटी गांव के उत्तर में स्थित तालाब है। पम्पासर के पास ही दाहिनी तरफ सीमेंट के बने चबूतरे पर ऋष्यमूक पर्वत बना है जिस पर राम-सुग्रीव मिलाप के प्रसंग का मंचन होता है। वहीं तालाब के बायीं ओर पर्वत बना है जहां एक सुन्दर कुटिया बनी है। जिस पर श्रीराम- लक्ष्मण विराजते हैं। इस स्थल पर वर्षा वर्णन के प्रसंग का मंचन होता है। साथ ही दो दिन आरती होती है।

बालिवध स्थल- रामनगर चैराहे से करीब 3 किमी दूर पंचवटी से औद्योगिक क्षेत्र की ओर जाने वाली सड़क के दाहिनी ओर बड़े मैदान तम्बू व लकड़ी के मंच द्वारा बालि का महल तैयार किया जाता है।

लंका- यह राजा रावण की नगरी है यह स्थान रामनगर चैराहे से 3.5 किमी पर पंचवटी से औद्योगिक क्षेत्र की ओर जाने वाली सड़क के दक्षिण ओर है यहां उपस्थलों में रामेश्वरम्, समुद्र, अशोक वाटिका, सुवेरगिरी पर्वत, कचहरी, रणभूमि, रावण का महल तथा लंका से उत्तर में थोड़ी दूरी पर हिमालय पर्वत है। (चबूतरे के रूप में प्रतीकात्मक रूप से अवस्थित है)

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