रामनगर की रामलीला का इतिहास

Ramleela Ramnagar History
जेम्स प्रिन्सेेस द्वारा सन् 1830 में रामनगर की रामलीला का बनाया गया चित्र

समस्त उत्तर भारत में होने वाली रामलीला का इतिहास उलझा हुआ है। रामनगर की रामलीला का संकल्प वाक्य है ‘यत् कृत्वा चाथ दृष्टवा हि मुच्यते पात कैर्नरेः’ इसका तात्पर्य यह है कि इसके करने और देखने से मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है। स्पष्टतया यह एक धार्मिक अनुष्ठान है और वाराणसी में विशेषतः लीला इसी भाव से की जाती है। दिव्य चरित्रों की लीला करने की परम्परा बहुत पुरानी है। मिस्र में ईसा से हजारों वर्ष पूर्व वहां के ईष्ट देव की लीला खेली जाती थी। जिनके कुछ आलेख भोज पत्रों पर लिखी पेपीरस पोथियों में मिले हैं।

हरिवंश पुराण में रामायण महाकाव्य के नाटकीकरण का उल्लेख है। इसमें प्रद्युम्न और साम्ब प्रभृति यादव वीरों की मंडली ने ब्रजपुर में रामकथा का नाटकीय प्रदर्शन किया था। रामायण में भी नाटक का उल्लेख है अतः भारत में नाटक या लीला कोई आयातित चीज नहीं है।

वाराणसी विशेषकर रामनगर की रामलीला की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि जानने से पूर्व यह जानना समीचीन होगा कि जिस महाकाव्य पर यह लीलाएँ आधारित हैं उनकी रचना कब और किन परिस्थितियों में हुई? श्रीरामचरित मानस का रचना काल उस समय का माना जाता है जब भारत में यवनों का अत्याचार चरम पर था। हिन्दू अत्यन्त त्रस्त एवं विपन्नावस्था में थे। उसी समय अकबर ने जजिया कर से मुक्त कर दिया था और हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई और पारसी धर्म को मिला कर एक नया धर्म दीन-ए-इलाही धर्म चलाया था। जिसका उद्देश्य था सबके साथ मैत्री एवं समानता का व्यवहार।

हिन्दू भारतीय वर्णाश्रम, धर्म, रीति नीति को भूलकर अनायास मुस्लिम धर्म अपनाने लगे और उनके साथ रोटी बेटी तक सम्बन्ध रखने लगे। इसी समय जब हिन्दू धर्म का पतन हो रहा था; गोस्वामी तुलसीदास की दृष्टि इस तरफ गयी और उन्होंने इस छल रहस्य से उबरने का कोई उपाय न देखकर भगवान श्रीराम की शरण ली और उनकी प्रेरणा से इस दिव्य महाकाव्य की रचना कर डूबते हुए वैदिक धर्म को बचाया। ऐसा कहा जाता है कि इस पवित्र गं्रथ की ओर सामयिक विद्वानों ने उपेक्षा दिखलाई इसके बावजूद तुलसीदास ने भगवत् प्रेरणा से प्रेरित होकर अपने निवास स्थान अस्सी या तुलसी घाट के समीप स्वयं रामचरितमानसानुसारिणी रामलीला को जन्म दिया।  यहीं से रामलीला की नींव पड़ी जो आज जगह-जगह मंचित होती है।

सम्वत् 1631 में यह रामचरितमानस लिखा गया था। ऐसा भी कहा जाता है कि तुलसीदास ने काशी और अयोध्या में दो बालकों को रघुनायक की लीला करते हुए देखा था, जो लीला और महानाटक की विधा से परिचित थे।  वाराणसी में चित्रकूट की रामलीला अत्यंत प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि इस लीला की शुरुआत मानस रचना से भी पूर्व सम्वत् 1600 के पास नारायण दास उर्फ मेघा भगत नामक संत ने की थी।

सन् 1908 में प्रयाग उच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश स्टैनली और न्यायमूर्ति बैनर्जी के समक्ष एक मुकदमा चला था (9, उ0 उल0 जे0 पृ0 529-545 छन्नूदत्त व्यास बनाम बाबूनन्दन महंत) जिसके फैसले मंे माननीय न्यायाधीशों ने लिखा ‘‘रामलीला एक धार्मिक जुलूस है जिसमें लोग ऐतिहासिक चरित्रों की पूजा करते हैं। यह लीला मेघा भगत के समय से ही हो रही है, जो सम्वत् 1600 के लगभग विद्यमान थे।

भारत की सांस्कृतिक शोभा में जिनका तनिक भी महत्व है वह वर्ष प्रतिवर्ष रामलीला का आयोजन एवं संचालन करते है।’’ यह विवाद शताब्दियों से चल रही श्री चित्रकूट रामलीला द्वारा बावन द्वादशी रामलीला, नरसिंह लीला और होली के उत्सव को आयोजित करने को लेकर हुआ था। तात्पर्य यह है कि वाराणसी में रामलीला कम से कम चार सौ पचास वर्षों से चल रही है और पुराणों जितनी ही पुरानी है। मेघा भगत तुलसी के समकालीन थे। संभवतः वे गोस्वामी तुलसीदास के शिष्य भी थे और कहा जाता है कि मेघा भगत नाम भी तुलसीदास का दिया हुआ है। लाट भैरव की रामलीला अपने को प्राचीनतम बतलाती है और कहा जाता है कि जब गोस्वामी तुलसीदास हनुमान फाटक पर रहते थे तब उन्हांेने यह लीला आयोजित की थी। बहरहाल! यह एक गहन अनुसंधान का विषय है।

सम्प्रति लगता तो यही है कि वैष्णव मतानुयायी श्री नारायण दास ने श्रीराम कृष्ण लीलानुकरण सिद्धान्त से प्रेरित होकर वाल्मीकि रामायण के आधार पर लीला प्रारंभ की। बाद में मानस से प्रेरित हो झांकी के साथ मानस पाठ का समावेश हो गया। आज भी वहां कोपभवन से राजगद्दी तक की लीला होती है। स्वयं तुलसीदास द्वारा स्थापित अस्सी और लाट भैरव की रामलीलाओं मंे यही परम्परा रही है। वर्तमान में इनमें धनुषयज्ञ और पुरजनोपदेश की लीला जोड़ दी गयी है। अस्सी-भदैनी पर होने वाली तुलसीदास अखाड़ा द्वारा संचालित रामलीला की प्रसिद्धि यही है कि ‘गौतम चन्द्रिका’ ने गोस्वामी द्वारा तुलसी घाट पर पूर्णिमा की चाँदनी में राजगद्दी लीला के आयोजन का वर्णन किया है। मेघा भगत की तरह गोस्वामीजी ने भी कृष्ण, प्रह्लाद और धु्रव लीलाएं प्रारम्भ की और इनमें से एक कृष्ण लीला आज भी ‘नागनथैया’ जो बनारस के लक्खा मेले में शुमार है। मेले के नाम से प्रसिद्ध है।  रामलीला शायद रामायण और महाभारत के युग में भी विद्यमान थी। शोभायात्रा, कथा, गायन आदि परम्पराएँ तो भारतीय इतिहास के साथ आदिकाल से जुड़ी हुई हैं, लेकिन वर्तमान समय में वाराणसी की लीला और उनमें भी अपने मौलिक और पारम्परिक स्वरुप के कारण रामनगर की रामलीला देश-विदेश में ख्याति प्राप्त है। अनेक राज्यों में रामलीलाएं होती हैं, लेकिन वाराणसी की रामलीलाओं जैसी गति, तन्मयता, धार्मिकता कहीं नहीं मिल पाती।

रामनगर की रामलीला का इतिहास लगभग दो सौ साल पुराना है। हालांकि इस रामलीला का कोई क्रमबद्ध इतिहास नहीं मिलता फिर भी प्रचलित दंत कथाओं के आधार पर कहा जाता है कि उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में यह रामलीला रामनगर से थोड़ी दूर पर स्थित बरईपुर में होती थी जिसे मानस उपासक मेघा भगत कराते थे। उन्हांेने जीवन भर इस लीला का श्रद्धा के साथ निर्वहन किया। वृंद्धावस्था के चलते मेघा भगत ने तत्कालीन काशी नरेश महाराजा उदित नारायण सिंह जी से रामलीला को संरक्षण प्रदान करने एवं उसे रामनगर स्थानान्तरित करने का अनुरोध किया। उस समय युवराज बीमार चल रहे थे और महाराजा की मनःस्थिति ठीक नहीं थी। महाराजा लीला के बारे में फैसला नहीं कर पा रहे थे। तब मेघा भगत ने कहा कि आप रामलीला को संरक्षण देंगे तब युवराज स्वस्थ हो जायेंगे। अंततः महाराजा ने स्वीकृति दे दी और युवराज भी स्वस्थ हो गये। मेघा भगत की बात सच निकली और रामलीला की शुरुआत हो गयी।

एक अन्य किंवदंती के अनुसार छोटा मिर्जापुर में होने वाली रामलीला देखने महाराजा उदित नारायण सिंह जी जाते थे। किसी एक वर्ष की रामलीला में महाराज एक दिन काफी दुखी मन से रामलीला देखने पहुंचे। रामलीला के व्यास के कारण पूछने पर उन्होंने बताया कि दत्तक पुत्र श्री ईश्वरी प्रसाद नारायण सिंह जी काफी बीमार हैं और सभी लोग उनके जीवन से निराश हो गये हैं। उस कठिन परिस्थिति में भी महाराज ने श्रीरामलीला दर्शन नहीं छोड़ा एक दिन अवसर पाकर लीला में विराजमान श्रीरामचंद्र जी से महाराज ने राजकुमार के आरोग्य और आयु वृद्धि की प्रार्थना की। तब व्यास ने राम बने पात्र के गले से पुष्प माला निकाल कर प्रसाद स्वरूप युवराज को पहनाने के लिए महाराज को दी। युवराज को माला पहनाने के बाद रोग में आशातीत परिवर्तन होने लगा और वे स्वस्थ्य हो गये। इस अद्भुत चमत्कार से प्रभावित होकर महाराज का हृदय भक्ति भाव से परिपूर्ण हो गया जिसकी प्रेरणा से महाराज ने रामनगर में रामलीला शुरू करवायी।  इस प्रकार कहा जा सकता है कि रामनगर की रामलीला काशी नरेश महाराज उदित नारायण सिंह जी के समय में शुरू हुई। इनका जन्म 1783 ई0 में हुआ था तथा शासन काल सन् 1796 से 1835 ई0 तक था। अतः रामलीला की शुरुआत उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध से मानी जा सकती है।

एक अन्य किंवदंती के अनुसार मेघा भगत ने नाटी इमली मुहल्ले में सर्वप्रथम श्रीराम भरत मिलाप का नाटक खेला था। एक बार जब नाटक अपने चरम पर था तब मेघा भगत की आकस्मिक मृत्यु हो गई। उसी दिन से यहां प्रत्येक वर्ष ईश्वर में विश्वास प्रकट करने एवं मेघा भगत के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए नाटक खेला जाता है। कहते हैं कि एक बार नाटी इमली के भरत मिलाप में श्रीगंगा जी की बाढ़ तथा प्रचण्ड पवन के कारण महाराज का जलयान (मोरपंखी नैया) उस पार विलंब से पहुंची और महाराज भरत मिलाप देखने से चूक गये और दुबारा ऐसी चूक न हो इसलिए महाराजा ने रामनगर में रामलीला शुरु करवायी।  यह सम्भव है कि नाटी ईमली से उदासीन होकर महाराज उदित नारायण सिंह ने श्री गोस्वामी तुलसीदास द्वारा स्थापित वाराणसी के असि घाट की श्री रामलीला को सर्वश्रेष्ठ समझकर वहां नियमित दर्शन के लिए और राजकुमार के आरोग्य घटना से प्रेरित होकर श्रीराम के प्रति अपना समर्पण प्रारम्भ कर दिया हो, जिसकी सूचना श्री महाराज की दो कृतियों से प्राप्त होती है। 1- रामनगर के पास छोटा मिर्जापुर में होने वाली श्री रामलीला को स्वायत्त कर किले के समीप अयोध्यापुरी की प्रतिष्ठा कर रामलीला नगर में ही प्रारम्भ कराया। जिसमें अयोध्यापुरी, जनकपुर, गिरिजा मंदिर, चित्रकूट, पंचवटी, पम्पासर, लंका आदि स्थलों का भूमि संशोधनपूर्वक समुचित स्थानों में निर्माण कर श्रीरामलीला को सब प्रकार से अचल कर दिया। 2- महाराज उदित नारायण सिंह ने भावपूर्ण चित्रमय रामचरितमानस का चित्रण कराया। कहा जाता है कि इसमें एक लाख रूपये उस समय लगे थे।

एक अन्य किंवदंती के अनुसार रामनगर से कुछ दूर छोटा मिर्जापुर में भोनू और विट्ठल साहू नाम के दो भाई गाँव वालों के सहयोग से प्रतिवर्ष रामलीला करवाते थे। रामनगर के महाराजा भी उसमें अपना सहयोग देते थे और खास-खास लीलाओं को देखने स्वयं जाते थे। एक बार धनुषयज्ञ की लीला में पहुंचने में महाराजा को थोड़ी देर हो गयी। महाराजा का इंतजार न करके वहां के लोगों ने धनुष तोड़वा दिया। महाराज को यह खबर बीच रास्ते में ही मिल गई। वे बहुत दुःखी होकर वापस रामनगर किले में आ गये। वे काफी चिंतित दिखने लगे। यह देखकर महारानी ने उनकी उदासी का कारण पूछा, तब महाराज ने भरे मन से अपनी उदासी का कारण बताया कि मेरा इंतजार नहीं कर सके और धनुष तोड़वा दिया इसलिए हमें बहुत ग्लानि हो रही है। यह बात सुनकर महारानी ने उन्हें ताना मारते हुए कहा कि- ‘‘सब बनिया होकर रामलीला करा सकते हैं, आप राजा होकर भी एक रामलीला नहीं करा सकते। आप रामनगर दुर्ग में रामलीला करवाइये, हमें भी कभी-कभी देखने का अवसर मिलेगा।‘‘ रानी की बात महाराज को जम गई और दूसरे साल से महाराज रामनगर में रामलीला करवाने लगे। यहीं से रामनगर की रामलीला की शुरुआत हुई। महाराज ने भोनू-विट्ठल की रामलीला में जाना बन्द कर दिया।

एक अन्य कथा के अनुसार जगदीश यात्रा के अवसर पर महाराज सदल-बल जगदीश धाम को जा रहे थे। उस समय यात्राएँ पैदल ही हुआ करती थीं, क्योंकि जंगली रास्ते हुआ करते थे। जगह-जगह पड़ाव डालते-डालते जब महाराज का लाव-लश्कर खड्गपुर पहुंचा तो वहां रात्रि विश्राम हुआ। रात में सोते समय महाराज को यह स्वप्न आया कि मेरे दर्शन के निमित्त यहां आने का कष्ट मत करो! अपने यहां जाकर रामलीला करवाओ! हमारे दर्शन का फल वहीं प्राप्त होगा। हम वहीं दर्शन देंगे। स्वप्न के आदेशानुसार अपनी यात्रा स्थगित कर महाराज वहीं से वापस रामनगर आ गये और भव्य समारोह के साथ रामलीला शुरु कराई। इधर रामनगर में लीला आरंभ हुई तो छोटे मिर्जापुर की रामलीला स्वतः ही समाप्त हो गयी। श्री महाराजा उदित नारायण द्वारा निर्मित दो मानस टीकाओं में से रामलीला रूपी टीका चित्र रामायणरूपी से पहले की है। उसके बाद चित्र रामायण बना इसका निर्माण 1796 ई0 मंे चैत्रसुदी नवमी से प्रारम्भ होकर सन् 1814, कुऑर सुदी एकादशी को 18 वर्षो मंे हुआ है।

इससे भी यह सिद्ध होता है कि रामलीला का यह वर्तमान स्वरूप सन् 1796 ई0 के पूर्व निश्चित हो गया था।   महाराजा उदित नारायण के समय तथा कुछ समय तक ईश्वरी नारायण सिंह के शासन काल में कुछ लीलाएं रामनगर किले में तथा कुछ लीलाएं वहां के अयोध्या नामक स्थान पर होती थी। बाद में ईश्वरी नारायण सिंह जी ने इस लीला को वर्तमान स्वरूप में परिवर्तित किया। वे सन् 1835 ई0 में राजा बने थे और 1898 ई0 तक उनका शासन काल चला। ऐसा अनुमान किया जाता है कि रामलीला का वर्तमान स्वरूप 1860-65 के बीच विकसित हुआ।  महाराजा ईश्वरी प्रसाद सिंह जी एक धर्मप्रिय राजा थे तथा मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम में इनकी अगाध श्रद्धा थी। रामलीला को गोस्वामी तुलसी कृत रामायण के अनुसार करने के लिए उन्होंने अपने गुरूदेव स्वामी काष्ठजिह्वा, रीवां नरेश रघुराज सिंह, नागौर नरेश बगौरा के बाउ साहब, हरिहर प्रसाद सिंह आदि की सहायता से रामचरित मानस का शोधन करवाया तथा इसके पश्चात लीला स्थल और संवादों का शोधन किया गया एवं संवाद लिखे गये।

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