All posts by Balram Yadav

रामनगर की रामलीला में पात्र चयन एवं व्यास परम्परा

रामनगर की रामलीला के प्रारम्भ मं दो व्यास की परम्परा नहीं थी। रामलीला के प्रारम्भ में व्यास की गद्दी एक ही थी, दूसरा पद सिंगारिया का होता था। परन्तु श्रीराम पदारथ पाण्डेय, प्रधान व्यास की मृत्यु के पश्चात उनके दो शिष्य पंडित राजाराम सिंगारिया और विन्ध्येश्वरी मिश्र उर्फ गज्जू प्रधान व्यास हुए। तभी से रामलीला में दो व्यास की परम्परा बनी। इस परम्परा में श्री चन्द्र दत्त शर्मा इनके पुत्र काशी दत्त शर्मा इनके पुत्र श्री पुरूषोत्तम दत्त शर्मा और धर्मदत्त शर्मा तथा अब रघुनाथ दत्त शर्मा कार्यरत हैं। साथ ही रघुनाथ दत्त की सहायता के लिए उनके पुत्र श्री शिवदत्त भी सहायक की भूमिका में रहते हैं। यह गुजराती औदिच्य ब्राह्मण परिवार बड़ौदा से वाराणसी और वाराणसी से आकर रामनगर में बसे। गुजराती औदिच्य बाह्मण परिवार के रघुनाथ दत्त व्यास बनने से पहले रामनगर की रामलीला में राम, लक्ष्मण, शत्रुध्न की भूमिका का भी 9 साल तक की उम्र तक निर्वहन किया। सन् 1955 से रघुनाथ दत्त पंच स्वरूपों के व्यास की भूमिका में है।

पंच स्वरूपों का चयन एवं प्रशिक्षण– रामनगर की रामलीला के सभी पात्र ब्राह्मण होते हैं। केवल रावण की सेना में अन्य जातियों के छोटे-छोटे बच्चों को शामिल किया जाता है। मुख्य स्वरूपों का हर साल क्रमानुसार परिवर्तन भी किया जाता है। पांच स्वरूपों (राम, सीता, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न) के चुनाव में सर्वप्रथम वरीयता उनके बाल सुलभ आवाज को दी जाती है। साथ ही उनकी कमनीयता, रंग रूप का भी ध्यान रखा जाता है। पंच स्वरुपों के चयन का उपक्रम रथयात्रा के बाद पड़ने वाले रविवार से प्रारम्भ हो जाता है।

पंच स्वरूपों की स्वर परीक्षा रामनगर किले में महाराज के सम्मुख रामलीला के अधिकारी और व्यास की उपस्थिति में होती है। प्रत्येक उपस्थित बालक से संस्कृत के श्लोक का सस्वर पाठ कराया जाता है। चयन की यह प्रक्रिया दो चरणों में पूरी होती है। अंतिम चरण के पांच नामों पर महाराज द्वारा स्वीकृति प्रदान की जाती है। साथ ही इन बालकों का उपनयन संस्कार होना भी अति आवश्यक है। प्रथम गणेश पूजन के साथ ही इन पात्रों का प्रशिक्षण बलुआ घाट स्थित धर्मशाला में प्रारम्भ हो जाता है। पहले प्रशिक्षण अवधि के दौरान इनके परिवार का कोई सदस्य साथ नहीं रह सकता था, लेकिन वर्तमान में यह बाध्यता हटा दी गई। प्रशिक्षण अवधि के दौरान बालकों को पूरी तरह सात्विक रहना पड़ता है तथा खान-पान पर पूर्ण नियंत्रण रखा जाता है। प्रशिक्षण के दौरान व्यास द्वारा इनको संवाद शैली, हाव-भाव, हाथ पैर का संवाद के अनुरूप संचालन सिखाया जाता है। पात्रों में प्रशिक्षण काल से ही रामादि की भावना और गौरव का प्रारम्भ हो जाता है।

पंच स्वरुपों को उनके नाम यथा राम, सीता, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न ही पुकारा जाता है। पात्रों में परस्पर वैसा ही व्यवहार भी प्रारम्भ हो जाता है जैसे श्रीराम के उठ खड़े होने पर अन्य सभी पात्र भी उठ खड़े होते हैं और संवाद समाप्त होने या श्रीराम के बैठने पर सभी शेष पात्र वरिष्ठता के अनुसार श्रीराम को प्रणाम कर ही बैठते हैं। रामलीला के दौरान अनुशासन यथा, राम जी के खड़े होने पर सभी पात्रों का खड़ा हो जाना, जहां कही भी भोजन करने का प्रसंग आये ‘आपोसान’ करके खाना, किस पदार्थ का भोग हाथ से खाना है, किसे चम्मच से; इन बातों का प्रशिक्षण दिया जाता है। आरती के दौरान स्वरूपों का मूर्ति के रूप में भाव व्यक्त करने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है।

स्वरूपों को प्रतिदिन संवाद याद करके व्यास जी को सुनाना पड़ता है। पिछले लगभग 20-25 सालों से पात्रों को 2 घंटे के लिए किले में भी संवाद के प्रशिक्षण के लिए ले जाया जाता है, जहां महाराज स्वयं स्वरूपों के संवाद प्रशिक्षण का निरीक्षण करते हैं। इन बालकों की भूमिकाओं में परिवर्तन होता रहता है और नये बालक भी चुने जाते हैं।

भरत बना पात्र अगले वर्ष राम की भूमिका निभा सकता है। शत्रुध्न भरत का पात्र निभा सकते हैं लेकिन राम की भूमिका निभा चुका पात्र लक्ष्मण आदि की भूमिका नहीं निभा सकता। बशर्ते वह राम की पात्रता पर खरा पाये जाने पर अगले वर्ष पुनः राम बनाया जा सकता है।

पंच स्वरुपों के अतिरिक्त पात्रों का प्रशिक्षण व व्यासः

रामनगर की रामलीला में पंचस्वरुपों को छोड़कर शेष समस्त पात्रों के व्यास श्री लक्ष्मी नारायण पाण्डेय हैं। इनके पूर्व इस व्यास परम्परा में क्रमशः स्व0 राम पदारथ पाण्डेय, रामजी सिंगारिया, अनिरुद्ध पाण्डेय थे।

व्यास श्री लक्ष्मी नारायण पाण्डेय अन्य पात्रों को संवाद सम्प्रेषण में सहायता देते हैं। इनके द्वारा ही रामलीला के विविध पात्रों यथा- अष्ट सखी संवाद के लिए अष्ट सखी, विवाह के लिए पात्र तथा अन्य सभी प्रमुख पात्रों को संवाद प्रशिक्षण दिया जाता है। इसके लिए पात्रों का चयन व प्रशिक्षण व्यास जी द्वारा रामलीला के एक माह पूर्व ही कर लिया जाता है। रामलीला के दौरान लक्ष्मी नारायण पाण्डेय के हाथ में ही सभी पात्रों के संवाद सहित मानस की पोथी होती है और यही रामायणी दल को रामायण शुरू करने का संकेत देते है। साथ ही ‘‘चुप रहो! सावधान!’’ की आवाज के साथ लीला प्रेमियों को संवाद से पूर्व सचेत भी करते हंै।

रामलीला में पंचस्वरूपों के अलावा अन्य सहायक पात्र वंश परम्परा से ही इस भूमिका को निभा रहे है। इन पात्रों में से किसी का भी अभिनय आदि में अन्यथा व अन्यत्र रुचि न होने के बावजूद अपनी भूमिका को निभाना निःसंदेह ही भगवतकृपा का ही प्रमाण माना जा सकता है। पात्रों में कोई सरकारी नौकरी करता है तो कोई राजनीति,  कोई वैवाहिक कर्मकाण्ड कराकर जीवन यापन करता है तो कोई कृषि जैसे निषाद राज की भूमिका निभाने वाले श्री बाल किशुन दीक्षित जूनियर हाईस्कूल डढ़िया, राजगढ़ में प्रधानाध्यापक हैं, तो वही हनुमान बनने वाले पुलिस विभाग में कांस्टेबल के पद पर हैं, जामवन्त बनने वाले रमेश पाण्डेय नगर पालिका सभासद रह चुके हैं और राजनीतिक कार्यकर्ता भी हैं। वहीं बरसों तक हनुमान बनने के बाद वर्तमान में बाल्मीकि व भारद्वाज की भूमिका निभाने वाले रामनारायण पाण्डेय ज्योतिष व कर्मकाण्ड में निष्णात हैं।

पात्रों में रामलीला में अपने निभाये जाने वाले चरित्र के प्रति भी बहुत लगाव है। जैसे- राजा दशरथ की भूमिका निभाने वाले सुधीर उपाध्याय रामलीला शुरू होने के दो माह पूर्व से दाढ़ी रखना शुरू कर देते हैं। रामलीला भर सिर्फ राजा की भूमिका निभाने वालों को छोड़ कोई भी पात्र रामलीला में जूता-चप्पल धारण नहीं करता है। प्रस्तुत है रामलीला के कुछ प्रमुख पात्रों का परिचय-

दशरथ– दशरथ की भूमिका श्री सुधीर उपाध्याय निभाते हैं। इनको दशरथ की भूमिका विरासत में मिली है। इनके पिता स्व0 जय मूरत उपाध्याय ने दशरथ की भूमिका लगभग 37 वर्षों तक निभायी। दादा स्व0 रमाशंकर उपाध्याय भी रामलीला में दशरथ की भूमिका निभाते थे। अपनी भूमिका की तैयारी के सम्बन्ध में इन्होंने बताया कि इनके पिता दशरथ की भूमिका के लिए वास्तविक दाढ़ी बढ़ाते थे और इस कारण वह रामलीला में काफी प्रसिद्ध भी थे। पिता की इस विरासत को बनाये रखने के लिए सुधीर भी तीन महीने पहले दाढ़ी बढ़ाना शुरू कर देते हैं। युवावस्था में ही इस तरह की भूमिका को निभाने के प्रश्न पर कहा कि ‘‘अभी भी लोग मेरे घर का पता दशरथ जी के नाम से ही पूछते हैं और हमें उसके लिए सम्मान भी मिलता है। अपने इस सम्मान और परिवार की परम्परा को निभाने के लिए ही मैं भी दशरथ बनता हूँ।’’ कोप भवन की लीला को अपने पसंदीदा लीला में से एक बताते हुए इन्होंने कहा कि जब पहली बार मैंने संवाद बोला था तो लगा कि पिताजी ही अन्दर से बोल रहे हैं। संवाद के दौरान श्रीराम वियोग में आंसू स्वाभाविक रूप से आ जाते हैं। पहली बार राज सिंहासन का पैर छूकर उस पर बैठना रोमांचित कर देने वाला क्षण था।

राजा जनकवर्तमान में यह भूमिका विजय नारायण पाण्डेय द्वारा निभाई जा रही है जो पिछले कई वर्षों से इस भूमिका में हैं इसके पूर्व यह भगवान शंकर की भूमिका निभा चुके हैं, रामलीला में आवश्यकतानुसार अन्य कई भूमिकाएँ आप सहजता पूर्वक अदा कर लेते हैं । आप से पहले आप के पिता श्री हरिनारायण पाण्डेय बनते थे। इनसे पहले आप के दादा जी लक्ष्मण पाण्डेय जी जनक की भूमिका का निर्वहन करते थे। आप राम जन्म की लीला में बाल राम, पुरबालक, देवता, कौशल्या, पुरवासी आदि बन चुके हैं। लीला में पहले दिन की आकाशवाणी आप ही के द्वारा सम्पन्न होती है। आप अपनी सबसे यादगार लीला को बताते हैं कि आप को लीला में एक वर्ष अंगद का अभिनय करना पड़ा वह अभिनय इतना सुन्दर हुआ कि उससे प्रभावित हो कर महाराजा बनारस ड़ाॅ0 विभूति नारायण सिंह ने उन्हें 51रू का पुरस्कार दिया।

हनुमान- रामनगर की रामलीला मे इस चरित्र का निर्वाह बिहार पुलिस में कांस्टेबल के पोस्ट पर कार्यरत बृजेश कुमार तिवारी करते हैं। रामलीला से जुड़ाव पर वे बताते हैं कि ‘‘ग्राम-वशोरी पो0- कोरी, जिला-भोजपुर, आरा का रहने वाला हूँ और धर्म से मेरा जुड़ाव बचपन से ही रहा है, जिस कारण मैं काशी अक्सर आता रहता था। उसी दौरान मैं रामजानकी मठ, अस्सी पर महन्त राज कुमार दास से जुड़ा और उनके सान्निध्य में धर्म-कर्म करने लगा और काशी में आना जाना विशेष हो गया और महन्त राज कुमार दास की प्रेरणा से इस लीला में सेवा करने का अवसर मिला।’’ इस चरित्र के निर्वहन के लिए ये हर वर्ष अपने विभाग से एक माह की छुट्टी लेकर आते हैं। आप मैथिल बोलते हैं और यहाँ संवाद अवधी में बोला जाता है, ऐसे में आप को कोई परेशानी नहीं होती तो वे झट से बोलते हैं ‘अजी राम काज में परेशानी काहे की। शुरूआत में थोड़ी समस्या बोलने में होती थी पर वह धीरे धीरे ठीक हो गयी।’ इसके पूर्व इस भूमिका में पंजाबी बाबा (1 वर्ष), पं0 राम नारायण पाण्डेय, दया पाण्डेय, नागा रामलखन दास, पंडित बद्री नाथ, बलिकरन, भगेलू रह चुके हैं।

जामवन्त

यह भूमिका वर्तमान में रमेश पाण्डेय द्वारा निभाई जाती है। जो पिछले 42 साल से इस भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। अब तो पूरे नगर में इनका मूल नाम भूलकर लोग इन्हें ‘जामवन्त गुरु’ के नाम से ही जानते हैं। इनके पूर्व देवेन्द्र पाठक और सीताराम मिश्र जामवन्त बनते थे। रमेश पाण्डेय जी ने बताया कि यह बचपन से ही रामनगर की रामलीला में भूमिकाएं निभा रहे हैं; जिनमें सनकादिक, सखी, पुरवासी, देवता, कौशल्या, मुनि, कोल-भील इत्यादि की भूमिकाएँ रही हैं। जनसेवा के अलावा अपनी आजीविका चलाने के लिए रामायण पाठ, देवी जागरण आदि धार्मिक कार्यों के लिए मण्डली का नेतृत्व करते हैं।

वशिष्ठ– यह भूमिका आजकल रवीन्द्र नाथ उपाध्याय द्वारा निभाई जा रही है जो सन् 1968 से इस भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं। इनके पूर्व यह भूमिका इनके पिता स्व0 रामनाथ उपाध्याय निभाते थे तथा उनके पूर्व भोला उपाध्याय यह भूमिका निभाते थे। रविन्द्रनाथ उपाध्याय जी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के सेवा निवृत्त  कर्मचारी हैं।

रामलीला के प्रति लगाव के सम्बन्ध में इन्होंने बताया कि ‘‘श्रीराम का गुरू बनना किसी के लिए भी सौभाग्य की बात है। तमाम व्यस्तताओं के बावजूद भी यही प्रयास रहा है कि जीवन पर्यन्त इस भूमिका में रहूं। इसके पीछे श्रीराम के प्रति प्रेम और श्रद्धा ही प्रेरणा है। ’’

विभीषण- विभीषण की भूमिका वर्तमान में रामजी पाठक निभाते हैं। जो पिछले 7 वर्षों से इस भूमिका में हैं। इसके पूर्व यह भूमिका इनके पिता स्व0 राममूरत पाठक द्वारा निभायी जाती थी। इनके पूर्व हरिराम मिश्र, रामलखन दूबे, लक्ष्मी नारायण पाण्डेय इस भूमिका को निभा चुके हैं। श्री रामजी पाठक ने बताया कि विभीषण के पूर्व वह महिला, पुरबासी, कैकेयी, मंथरा और अन्य कई भूमिकाएं कर चुके हैं। रामनगर की रामलीला में उनके परिवार की तीन पीढ़ियाँ विभिन्न पात्र बन चुकी हैं जिसमें तीसरी पीढ़ी में सबसे छोटे बालक शिवांश पाठक पुरबालक की भूमिका निभाते हैं। रामलीला के प्रति गहरी आस्था व्यक्त करते हुए कहा कि- ‘‘अपने इस पैतृक परम्परा का निर्वहन एक अद्भुत अनुभव है और धर्म के प्रति निष्ठा रामलीला में भूमिका का मूल कारण है। ’’

बाल्मीकि- यह भूमिका वर्तमान में पं0 रामनारायण पाण्डेय निभाते हैं। इसके पूर्व स्व0 अनिरूद्ध पाण्डेय इस भूमिका को निभाते थे। पं0 रामनारायण पाण्डेय पूर्व में रामलीला में 40 वर्षों तक हनुमान की भूमिका को निभा चुके हैं। अपनी भूमिका से सम्बन्धित अनुभव के प्रश्न पर आपने कहा कि-‘‘हनुमान श्री राम का बोध कराते हैं। अगर श्री राम का पराक्रम देखना है तो हनुमान का कर्तव्य देखिये।’’ श्री रामलीला के भाव एवं महात्मय के सम्बन्ध में इन्होंने कहा कि- ‘‘रामलीला; जिसमें दर्शक लीन हो जाये, लय हो जाये, विलय हो जाये उस क्रिया का नाम है।  सारे लोग भक्ति के निमित्त अपने समय और कार्य को अवरुद्ध करकर रामलीला में उपस्थित होते हैं। वे भगवान का दर्शन व भगवान के चरित्र को देखते हैं। देखने के उपरान्त वे जब घर जाते हैं पुनः दूसरे दिन की लीला का चिन्तन करते हैं और समय पर लीला में उपस्थित होकर भगवान का पुनः चरित्र देखते हैं। इस क्रम से 30 या 31 दिन तक वह एक व्रत व अनुष्ठान में दर्शक और लीलामय हो जाते हैं और फिर लीला के विश्राम होने के बाद दूसरे वर्ष का चिंतन करके एक-एक दिन इस चिन्तन में बिताते हैं, कि कब वह दिन आयेगा कि पुनः लीला में उपस्थित हों। यह रामनगर की रामलीला का महात्म्य है।’’

सुग्रीव- वर्तमान में सुग्रीव की भूमिका शिवजी पाठक निभाते हैं जो पिछले 9 साल से इस भूमिका में हैं। इसके साथ ही आप कोल, पुुरवासी, जनक दूत, सेवरी, अन्सुईया ,खरदूत, मारीच, जती, गंवार, गंवारिन का रोल भी करते हैं। शिवजी पाठक रामनगर की रामलीला में चयनित उन एक दो पात्रों में से हैं जो एक साथ दर्जनों भूमिकाएँ निभाते हैं। आवश्यकता पड़ने पर सदैव किसी नये चरित्र की भूमिका निर्वहन करने की चुनौती  सहर्ष स्वीकार करते हैं ।

निषादराज-

लगभग 30 वर्षों से इस भूमिका को श्री बालकिशुन दीक्षित निभा रहे हैं। इस भूमिका में गौरी  शंकर उपाध्याय, पंडित कन्हैया, विजय नारायण पाण्डेय रह चुके हैं। इनके द्वारा वन गमन की रामलीला के दिन बोला गया संवाद और विलाप लीला प्रेमियों के जेहन में वर्षभर रहता है। अपनी इस भूमिका  में

निषादराज द्वारा जिस तरह से संवाद प्रस्तुति की जाती है, वह लीला के प्रति उनके भाव व समर्पण का द्योतक है। आज आप के इस रोल के करने के कारण तथा इसके प्रति आप की आसीम श्रद्धा की वजह से आप के मूल नाम से इतर आप को लोग निखाद राज के नाम से ही पुकारते हैं। उत्कृष्ट शैक्षिक कार्यों हेतु श्री बालकिशुन दीक्षित राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं तथा वर्तमान में जूनियर हाईस्कूल में प्रधानाचार्य के रुप में कार्यरत हैं आप बताते है कि लीलाप्रेमी आप से कहतें हैं कि ‘‘जो माह भर लीला देखनेे में असक्षम है वह भी निखाद राज की लीला प्रसंग को देखने के लिए अवश्य आना चाहता है।’’

अंगद- इस भूमिका को वर्तमान में बैकुण्ठ नाथ उपाध्याय निभाते हैं। पिछले 26 वर्षों से भूमिका निभा रहे हैं, रामलीला से जुड़ाव के संदर्भ में इन्होंने कहा कि ‘‘रामलीला से जुड़े मुझे 65 वर्ष हो गये। दशरथ को छोड़कर मैं लगभग सभी पात्र बन चुका हूँ। हमारे परिवार से ही दशरथ, अंगद, नारद, शंकर, वशिष्ठ बनते रहे हैं। यहाँ की रामलीला में ईश्वर की साक्षात् कृपा है। रामलीला के इस महाअनुष्ठान में जब तक देह में प्राण रहेगा अपनी भूमिका अदा करते रहेंगे ।’’ इस भूमिका को मेरा पुत्र मेरी अश्वस्थ्ता में निभा रहे हैं

भगवान शंकर– वर्तमान में यह भूमिका शांत नारायण पाण्डेय निभाते हैं। इनके पूर्व विजय नारायण पाण्डेय (वर्तमान में जनक की भूमिका) रामसूरत उपाध्याय तथा उनके पूर्व रमाशंकर उपाध्याय निभाते थे।

विश्वामित्र- प्रारम्भ में विश्वामित्र की भूमिका रामहर्ष मिश्र अदा करते थे। उनके बाद ब्रजदत्त, धर्मदत्त और श्याम जी पाठक ने उपरोक्त चरित्र  निर्वाहन  किया। वर्तमान में सदाफल पाण्डेय इस भूमिका को निभाते हैं।

नारद- वर्तमान समय में नारद की भूमिका कृष्ण चन्द्र द्विवेदी निभाते हैं। रामनगर के ही डहियाँ गांव में रहने वाले कृष्ण चन्द्र द्विवेदी नारद के अलावा राम जन्म लीला के दिन विराट रूप की भूमिका भी निभाते हैं। आप को यह सेवा कार्य आप के परिवार से पारम्परिक रूप में प्राप्त हुआ है। इनसे पूर्व नारद की भूमिका में भोलानाथ उर्फ ‘बम बम गुरू’ तथा पण्डित सुखदेव रह चुके हैं। आप नारद की भूमिका के अलावा लीला में सुतीक्षण मुनि, सतानन्द (राजा जनक के कुल गुरू) तथा ब्रह्मवाणी आदि भूमिकाओं का निर्वहन करतें हैं। आप से पहलें सतानन्द का अभिनय आप के पिता श्री श्याम सुन्दर द्विवेदी करते थे तथा विराट रूप की भूमिका आप के दादा श्री शालिग्राम द्विवेदी निभाते रहे। आप के परदादा श्री ठाकुर प्रसाद द्विवेदी रामलीला के मंत्री पद को भी सुशोभित कर चुके हैं।

ब्रह्मा जी – वर्तमान में ब्रह्मा का चरित्र श्री शीतला  प्रसाद त्रिपाठी निभाते हैं इनके पूर्व इनके नाना श्री बद्री पाठक, इनके पूर्व बद्री पाठक के पिता श्री दल्लन पाठक ब्रह्मा की भूमिका निभाते थे। इस भूमिका के संदर्भ में श्री शीतला प्रसाद जी ने बताया कि लंका स्थित रामेश्वरम् मंदिर का पुजारी ही ब्रह्मा की भूमिका निभाता है। मंै स्व0 श्री बद्री नाथ पाठक के देहांत के बाद सन् 2009 से इस भूमिका में हूं। कृषि तथा पूजा -पाठ द्वारा जीवनयापन करते हुए अपने नाना के विरासत को संभाले हुए हैं।

बालि- पुराना रामनगर निवासी 70 वर्षीय श्री मनमोहन पाण्डेय वर्तमान में बालि की भूमिका निभाते हैं। बालि की भूमिका के अलावा रामनगर की रामलीला पिछले 12 वर्षों से चंदन एवं टीका भी लगाते हैं। 20 वर्षों से बालि के भूमिका के अलावा पूर्व में सुनैना, मंदोदरी, बालहनुमान की भूमिका भी निभा चुके हैं। पण्डित अनिरूद्ध पाण्डेय व्यास के समय से आपका आगमन हुआ। रामलीला में पहले से आये बदलाव के सम्बन्ध में कहना है कि- ‘‘बहुत बदलाव आया है! कोई फोटो नहीं खींच सकता। आधे मेले में साधु एवं आधे में बनारसी रहते थे। अब साधुओं की संख्या बहुत कम हो गयी है। उसके पीछे कारण भाव का कम होना है। पहले राजा की तरफ से बहुत सी सुविधायें मिलती थी। हां! बनारसियों की संख्या ठीक-ठाक है।’’

सुमंत जी– रामलीला में राजा दशरथ के मंत्री के रूप में सुमंत की भूमिका श्री संतराम पाठक निभाते हैं। इनका निवास स्थान रामनगर के भीटी गांव में है। रामलीला में सुमंत जी की यह भूमिका पिछले 3 वर्ष से मिली हुई है। पूर्व में श्री महेन्द्र पाठक (किले में स्थित काले हनुमान जी के भूतपूर्व पुजारी) निभाते थे। श्रीरामलीला के सम्बन्ध में अपने भाव को व्यक्त करते हुए आपने कहा कि- ‘‘रामनगर की रामलीला एक धार्मिक धरोहर है और मुझे इस बात की बहुत खुशी है कि मैं रामलीला में भूमिका अदा करता हूं। जब तक मेरा पुरूषार्थ रहेगा और मुझे अवसर दिया जायेगा, तब तक मैं अपनी सेवा श्रीराम के चरणों मंे समर्पित करता रहूंगा।’’

परशुराम – रामलीला में वर्तमान मंे परशुराम जी की भूमिका श्री संतोष पाठक पिछले 5 वर्षों से निर्वहन कर रहे हैं। इनसे पूर्व इनके पिता श्याम जी पाठक इस भूमिका का निर्वहन करते थे। परशुराम की भूमिका इनके परिवार को वंश परम्परा में मिली हुई है। श्री श्याम जी पाठक ने इस संदर्भ में बताया कि पूर्व में परशुराम की भूमिका निभाने वाले श्याम सुन्दर पुजारी जी ने हमारे पिता विश्वनाथ पाठक को महाराज आदित्य नारायण सिंह से मिलवाया और संवाद सुनने के बाद वहां उपस्थित महाराज विभूति नारायण सिंह ने उनको ईनाम दिया था। परशुराम की भूमिका में स्वयं के भागीदारी के संदर्भ में बताया कि- ‘‘पिताजी का पैर खराब हो गया था और किले से भूमिका के लिए उनको बुलावा आया तो उन्होंने असमर्थता जाहिर करते हुए मुझे जाने को कहा। मेरी आवाज पिताजी जैसी नहीं थी और मैंने भी असमर्थता व्यक्त की जिस पर पण्डित श्री राम नारायण पाण्डेय ने मुझे प्रेरणा देते हुए कहा कि ‘आपके स्वरूप का चुनाव किला से होता है। मैं कहता हूं कि आप यह संवाद कह लेंगे क्योंकि शेर के घर पड़रू नहीं पैदा होता’ और मैंने संवाद ले लिया। जानकी जी की प्रेरणा से संवाद सकुशल अदा किया। इस प्रकार 1981 से मैं लगातार परशुराम की भूमिका में रहा। इनके पूर्व खदेरन पाठक, रामलगन पाठक, जगरनाथ पाठक बनते थे।

व्यास सहायक- रामनगर की रामलीला में दो मुख्य व्यासों के अतिरिक्त व्यास जी के सहायकों की भूमिका महत्वपूर्ण है। रामलीला में प्रतिदिन होने वाले आरती पंचस्वरूपों के पीछे चंवर डोलाते व्यास सहायक सम्पत व्यास जी को इस भूमिका में देखा जा सकता है। स्वयं एक वर्ष शत्रुघ्न बन चुके सम्पत राम शर्मा बताते हैं कि व्यास जी के साथ सन् 1960  से  ही सहायक की भूमिका में हैं। लगभग 20 वर्ष पहले व्यास रघुनाथ दत्त शर्मा की अस्वस्थता में हमने एक वर्ष रामलीला कराई भी है। आरती के समय चंवर डोलाने के अतिरिक्त सहायक के रूप में पंचस्वरूपों को संवाद प्रशिक्षण, श्रृंगार एवं निर्देशन में भी सहायक की भूमिका रहती है। श्रीराम की सेवा में लगे हुए 73 वर्ष बीत चुके हैं और यही इच्छा है कि जब तक शरीर में प्राण रहे श्रीराम जी की सेवा करता रहूं।

नल-नील – रामलीला में नल एवं नील की भूमिका क्रमशः  धर्मराज दास एवं बाबा रमेश दास निभाते हैं। भीटी गाँव के दोनों सगे भाई पिछले नौ वर्षों से भूमिका निभा रहे हैं।

रावण- इस भूमिका में विश्वेश्वर पाठक, रामनारायण पाठक, कौशल पाठक थे, और वर्तमान में यह भूमिका स्वामी नाथ पाठक द्वारा निभाई जा रही है जो लगभग 20 साल से इस भूमिका में हैं। हांलाकि इनके पुत्र श्री राजीव कुमार पाठक भी पिछले 8 वर्षों में बीच-बीच मंे इस भूमिका का निर्वहन करते रहे हैं।   कृतिदेव यहां रावण- इस भूमिका में विश्वेश्वर पाठक, रामनारायण पाठक, कौशल पाठक थे, और वर्तमान में यह भूमिका स्वामी नाथ पाठक द्वारा निभाई जा रही है जो लगभग 20 साल से इस भूमिका में हैं। हांलाकि इनके पुत्र श्री राजीव कुमार पाठक भी पिछले 8 वर्षों में बीच-बीच मंे इस भूमिका का निर्वहन करते रहे हैं।  रावण की भूमिका से जुड़ाव के सम्बन्ध मंे श्री पाठक इसे प्रभु राम की श्रद्धा से जोड़ते हैं। दो सौ सालो से अपरिवर्तित श्रीरामलीला के स्वरूप से अभिभूत श्री पाठक श्रद्धा की चरम स्थिति को श्री रामचरितमानस के आधार पर होने वाले प्रसंगीय मंचन से जोड़ते हैं।  श्री रामलीला को वह आर-पार की माला की संज्ञा देते हैं। इसके पीछे वह तर्क देते हैं कि इस वृहद लीला का स्वरूप ऐसा है कि भक्त चाहे जितना प्रयास करे कोई न कोई मंचीय प्रसंग उनसे छूटता जरूर है। प्रभु राम के चरित्र को वह मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में पूजते हैं।

केवट- रामलीला में केवट की भूमिका निभाने वाले पात्र का नाम श्री श्याम दास है। ये पुराने रामनगर के रहने वाले हैं और सन् 1972 से लगातार रामलीला में केवट की भूमिका निभा रहे हैं। श्याम दास काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में सीनियर कारपेन्टर के रूप में कार्यरत थे। वैसे नौकरी के समय इनका अधिक समय भारतकला भवन में व्यतीत हुआ।  रामलीला में काम करने के लिए उनको दक्षिणा के रूप में क्या मिलता है ऐसा पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि, ‘‘जब भगवान राम को नदी पार कराने का कुछ नहीं लिया तो मैं महाराज से क्या लूंगा।’’ रामलीला में इनकी अगाध भक्ति है। ये केवट का प्रसंग बड़े ही भाव विभोर होकर पूरे समर्पण के साथ निभाते हैं। मानो ऐसा प्रतीत होता है कि वही त्रेतायुग के ही केवट हों। इनके पहले रामलीला में इनके चाचा वैद्यनाथ बहुत सालों तक केवट की भूमिका निभा चुके हैं। रामलीला में केवट की भूमिका लगातार पीढ़ी दर पीढ़ी इनके परिवार के द्वारा ही निभाया जाता है।

अन्य बाल पात्र

प्रिंस उपाध्याय – कैकेयी, छोटे हनुमान, सुनैना, सखी आदि भूमिकाओं को  निभाने वाले 19 वर्षीय प्रिंस उपाध्याय सुपुत्र श्री बनवारी लाल उपाध्याय जगतपुर पी0जी0 कालेज, वाराणसी में बी0काम0 अन्तिम वर्ष के छात्र हैं। पिछले 8-9 वर्षों से पिं्रस विविध भूमिकाओं का निर्वहन कर रहे हैं। रामलीला के प्रति अपने भावोद्गार व्यक्त करते हैं कि- ‘‘रामलीला ने मुझे बहुत कुछ दिया है। जब मैं बचपन में बालरूप का अभिनय करता था तब अपने नाना (श्री रमेश पाण्डेय, जामवन्त गुरू) के सानिध्य में बहुत कुछ सिखा और मेरा यह सपना है कि मैं भी जामवन्त बनूँ। रामलीला ने जो मुझे सम्मान दिया है उसे मैं वापस नहीं कर सकता।

अजीत नारायण उपाध्याय – 21 वर्षीय अजीत लगभग 10-12 वर्षों से विविध भूमिकाओं का निर्वहन करते आ रहे हैं। जिसमें कौशल्या, छोटे हनुमान, सखी, जटायु, विप्र रूप आदि हैं। श्री महेन्द्र नाथ उपाध्याय के सुपुत्र अजीत काशी इंस्ट्टिूयट के बी0टेक0 के विद्यार्थी हैं।

रामलीला के प्रति भावना व्यक्त करते हुए कहते हैं, ‘‘रामलीला मेरे लिए बस एक लीला ही नहीं यह मेरे लिए शिक्षा का केन्द्र है। मैंने अपने दादा जी (श्याम नारायण उपाध्याय) से रामलीला के बारे में बहुत कुछ सीखा है। रामलीला में छोटी-छोटी बातें भी हमें बहुत शिक्षा देती हैं जैसे हमारे व्यास जी (लक्ष्मी नारायण) के मुख से यह वाणी, ‘‘चुप रहो, सावधान’’ यदि इसको अपने जीवन में अनुसरण किया जाय तो हम अपने जीवन में बहुत आगे जा सकते हैं। हम लीला को हृदय से देखते हैं ना कि दिमाग से।

अमित नारायण उपाध्याय– 18 वर्षीय अमित गाजियाबाद से बी0टेक0 की पढ़ाई कर रहे हैं तथा अपने भाई अजीत के साथ समय≤ पर विभिन्न भूमिकाओं का निर्वहन करते हैं। फुलवारी के प्रसंग वाली लीला में इन्हें सखी के पात्र से विशेष लगाव है। पात्र बनने को लेकर अपनी भावना बताते हैं- ‘‘रामलीला में अभिनय मेरे लिए सपनों के पूरा होने जैसा है, मैं अपने अभिनय को बहुत मस्ती से लेता हूँ। जब कोई हम लोगों से मिलता है तो रामलीला के कारण ही हम लोगों को बहुत सम्मान मिलता है। हम किसी रुपये (द्रव्य) के लिए रामलीला में अभिनय नहीं करते, सेवा की भावना से अभिनय करते हैं। रामलीला मेरे लिए पूजा, आस्था, शिक्षा का केन्द्र है।’’

शुभम तिवारी- रामलीला में सखी, देवता व अन्य पात्रों की भूमिका निभाने वाले 17 वर्षीय शुभम तिवारी सुपुत्र श्री प्रकाश तिवारी पिछले 7 वर्षों से अभिनय कर रहे हैं। इण्टरमीडिएट फाईनल के विद्यार्थी शुभम अपने पात्र बनने को लेकर बताते हैं कि- ‘‘जब मैं छोटा था तब अपने नाना जी और भाईयों को रामलीला में अभिनय करता देखता था। खासकर जब बाबा जी (जयमूरत उपाध्याय जी), दशरथ जी बनते थे तब मेरा भी मन करता था। रामलीला में अभिनय करना मेरे लिए गर्व की बात है। मैं जब अपने विद्यालय में पढ़ने जाता हूँ और मेरे मित्र और अध्यापकगण मुझे रामलीला पात्र के नाम से ही बुलाते हैं तो मुझे अच्छा लगता है। रामलीला ने हमें बहुत कुछ दिया है। ’’

विवेकानन्द पाण्डेय – नोएड़ा से बी0टेक0 कर रहे 18 वर्षीय विवेकानन्द पाण्डेय सुपुत्र श्री नर नारायण पाण्डेय पिछले 8 वर्षों में सखी, देवता, पुरबालक आदि पात्रों का अभिनय कर चुके हैं। रामलीला में अपनी आस्था प्रकट करते हुए कहते हैं कि- ‘‘रामलीला के प्रति मेरी भावना बहुत ही आस्थापूर्ण है। हमारी रामलीला में छोटी-छोटी बातों को दिखाया जाता है जो हमें शिक्षा ही देती है जैसे रावण के दरबार में राजा का ऊपर बैठना, मंत्रियों को उनसे नीचे बैठना। रामलीला मेला नहीं है, राम के चरित्रों का वर्णन है और कहीं भी ऐसी रामलीला नहीं होती। मुझे इस बात का दुख है कि रामलीला एक महीने मात्र होती है क्योंकि सुख के दिन बहुत जल्दी चले जाते हैं; काश रामलीला पूरे साल होती।’’

सच्चिदानंद पाण्डेय– 15 वर्षीय सच्चिदानंद पिछले 8 वर्षों में सखी, छोटे हनुमान, मंदोदरी इत्यादि कई भूमिकाओं का निर्वहन कर चुके हैं। रामप्यारी देवी इण्टर कालेज के कक्षा-11 के विद्यार्थी सच्चिदानंद और विवेकानंद पाण्डेय दोनों भाई हैं। सच्चिदानंद बताते हैं कि- ‘‘रामलीला में मुझे छोटे हनुमान बनना बहुत अच्छा लगता है। ऐसा लगता है कि हनुमान जी की शक्तियाँ आ गयी हैं और रामलीला में जो भगवान के दर्शन रूप को दिखाते हैं चतुर्भुज रूप, विराट रूप, आठों स्वरूप, भोर की आरती ये सब किसी भी अन्य जगहों की रामलीला में नही दिखाया जाता है। रामलीला ने हमें सम्मान दिलाया है। पूरा श्रेय मैं रामजी को देता हूँ।’’

सिद्धार्थ उपाध्याय– 15 वर्षीय सिद्धार्थ उपाध्याय सुपुत्र श्री प्रकाश कुमार उपाध्याय पिछले 7-8 वर्षों में पुरबालक, सनकादिक आदि बाल पात्रों की भूमिका निभा चुके हैं। बालपात्र के रूप में भूमिका निभाने को लेकर अपनी अनुभूति व्यक्त करते हुए सिद्धार्थ बताते हैं कि- ‘‘जब पहली बार पुरबालक की भूमिका निभानी थी तब मंै काफी डरा हुआ था। रामलीला में उपस्थित इतनी बड़ी भीड़ के सामने ऊँचे आवाज में संवाद अदायगी कैसे की जाय, इसको  लेकर मेरे नाना श्री बालकिशुन दीक्षित (जो कि निषादराज की भूमिका निर्वहन करते हैं) ने मेरा मार्गदर्शन व उत्साहवर्धन किया। तब से मैं बाल पात्र के रूप में कई बार भूमिका निर्वहन कर चुका हूँ। रामनगर की इस विश्व प्रसिद्ध रामलीला में अभिनय से जुड़ना वास्तव में किसी के लिए भी गौरव की बात है।’’

विकास पाण्डेय- पुत्र श्री चन्द्रधर पाण्डेय, कृषि, बटाऊबीर, कक्षा-12, पी0एन0 कालेज, रामनगर, इस वर्ष चैथी सखी, देवता, सरस्वती, पुरवासित इत्यादि बने।

आशीष पाण्डेय- पुत्र श्री चन्द्रधर पाण्डेय, कृषि, पिछले 12 साल से अभिनय कर रहे हैं। इस वर्ष सुमित्रा, मंथरा, मेघनाथ, पहली सखी इत्यादि बने। विद्यापीठ से बी0ए0 द्वितीय वर्ष के छात्र।

अवतन्स दीक्षित– पुत्र श्री उमेश दीक्षित, कक्षा-3 डी0ए0वी0 कालेज, रामनगर, इस वर्ष पुरबालक, सनकादिक आदि बने।

अंकित झा– पुत्र श्री आदित्य नारायण झा, पुरोहित, निवास-बटाऊबीर, पशु अस्पताल के पास, कक्षा-9, सिद्धार्थ पब्लिक स्कूल, दो वर्ष से बन रहे हैं। इस वर्ष कौशल्या, गणेश, तीसरी सखी, दासी, देवता इत्यादि बने।

रितेश पाण्डेय- पुत्र श्री अशोक पाण्डेय, बटाऊबीर पशु अस्पताल के पास, कक्षा-7 डी0ए0वी0 पब्लिक स्कूल, पहली वर्ष बने देवता, छठी सखी, राक्षसनी, दासी और सनकादिक इत्यादि।

ज्ञानेन्द्र पाण्डेय- पुत्र श्री अशोक पाण्डेय, इस वर्ष शत्रुघ्न की पत्नी बनेे।

प्रह्लाद पाठक– पुत्र श्री कैलाशनाथ पाठक, गोलाघाट, रामनगर, वाराणसी, कक्षा-8 सिद्धार्थ पब्लिक स्कूल, दो वर्षो से अभिनय कर रहे हैं। इस वर्ष पुरबालक और दासी बने।

कोमल पाण्डेय- पुत्र श्री कैलाशनाथ पाठक, कक्षा-9 पी0एन0 कालेज, तीन वर्षों से अभिनय कर रहे हैं। इस वर्ष देवता, सखी इत्यादि बने।

शिवांश पाठक- पुत्र श्री रामजी पाठक (वीभिषण)- कक्षा-5, भारतीय बाल विद्यालय, रामनगर, दो साल से अभिनय कर रहे हैं। इस वर्ष पुरबालक, सनकादिक एवं दुल्हन आदि बने थे।

रामनगर की रामलीला में रामायणी दल

रामायण पाठ करने वाले रामायणी दल पूरी रामलीला के क्रमबद्ध मंचन के सूत्रधार  रूप में हैं। रामनगर की रामलीला में रामायणी दल की भूमिका श्रीरामलीला अनुष्ठान द्वितीय गणेश पूजन के साथ ही प्रारंभ होती है, जिसमें श्रीरामचरितमानस का पाठ प्रारंभ होता है। रामायणी दल द्वारा रामायण के सस्वर पाठ को ‘नारदी’ या नारद वाणी कहते हैं, जिसमें एक पक्ष ‘हे हा’ कहते हुए एक अद्र्धाली (चैपाई का एक हिस्सा) उठाता है और दूसरा पक्ष ‘हा, हा’ कहकर चैपाई को पूरा करता है। रामलीला प्रारम्भिक समय में रामायणी की संख्या 16 होती थी, जो आठ-आठ के दो दलों में विभाजित होते थे । वर्तमान में ये संख्या 12 है, जिसमें छः-छः रामायणी दल हैं । बारह रामायणी व एक मृदंग वादक को मिलाकर कुल तेरह लोगों का दल है । (वर्तमान समय में एक रामायणी का पद रिक्त है।) द्वितीय गणेश पूजन के दिन चौक स्थित पक्की पर प्रधान रामायणी श्री रुद्रनारायण पाठक (वर्तमान में) द्वारा रामायण पाठ का शुरुआत कराया जाता है। प्रस्तुत है वर्तमान रामायणी दल का संक्षिप्त परिचय

श्री शिवलोचन मिश्र- सन् 1991 से रामायणी की भूमिका में है यह भूमिका इनको विरासत में मिली है, इनके पिता स्व0 यदुनंदन मिश्र भी रामायणी थे, जिन्होंने 1950 से 1979 से इस पद को संभाला। उनके बाद उनके छोटे पुत्र सुरेश मिश्र ने 1977 से 1984 तक रामायण पाठ किया। इनके पद छोड़ने के बाद 1991 से अब तक आप इस परिवार से रामायणी की भूमिका मंे हंै। इनके छोटे पुत्र दिनेश मिश्रा ने भी पांच वर्षों तक रामायणी के रूप में रामलीला की सेवा की। आपका निवास स्थान चन्दौली जिले के परोरवां गांव में है।

श्री श्याम नारायण उपाध्याय – सन् 1986 से श्याम नारायण उपाध्याय रामायणी के रूप में रामनगर  रामलीला की सेवा कर रहे हैं। रामलीला के जुड़ाव पर कहा कि सैकड़ों एकड़ के इस रंगमंच पर व्यक्ति स्वांतः सुखाय की प्रेरणा से आता है और उसका यह प्रयास रहता है कि जब तक शरीर में सामथ्र्य है तब तक वह रामजी की सेवा करे। वर्तमान में उनके परिवार से 5 बालक अजीत, अमित, शुभम, विवेकानन्द और सच्चिदानंद रामलीला में विभिन्न पात्र बनते हैं।

श्री भोलानाथ मिश्र- आप रामनगर में मंशा जी मंदिर के पीछे रहते हैं। रामलीला में लगातार 26 वर्षों से रामायणी का कार्य कर रहे हैं। सन् 1966 – 1970 तक बाल हनुमान की भूमिका निभाई और सन् 1968- 1970 तक अष्ठसखी का आठवाँ स्वरूप भी रहे और बचपन में इन्होंने बाल राम जी की भी भूमिका निभाई है। इनकी वर्तमान आयु लगभग 62 वर्ष है। सन् 1989 से लगातार रामलीला में रामायणी का कार्यभार सम्भाल रहे हैं। इसके पहले ये काॅपरेटिव में सन् 1976 से 1988 तक नौकरी किए। वर्तमान समय में 20 वर्षों से वटेश्वर हनुमान जी मंदिर में अपनी सेवा दे रहे हैं। वे बताते हैं कि 1945 के लगभग स्व0 कृष्ण कुमार मिश्रा आपके सबसे बडे़ भ्राता थे जिनके मार्ग दर्शन में आप रामलीला से परिचय प्राप्त किये।

श्री रामजनम मिश्र– सन् 1983 से रामायणी के रूप में अपनी सेवा दे रहे हैं। इनके पूर्व आपके परिवार से पिता स्व0 रामाचरण मिश्र ने 17 वर्ष तक रामायणी की भूमिका का निर्वहन किया है। आप ग्राम- गौरहीं, अदलहाट, जनपद- मीरजापुर के रहने वाले हैं।

 

श्री सूर्यकांत मिश्र– सन् 1985 से रामनगर की रामलीला में बतौर रामायणी रामायण पाठ कर रहे हैं। इनका निवास स्थान जिवनाथपुर, पटनवा है। रामलीला में अपनी सहभागिता व रामनगर में आगमन के सम्बन्ध में आपने बताया कि ‘‘राजा महीप नारायण सिंह जब समस्तीपुर से बनारस आये तब उन्हीं के साथ हमारा परिवार भी बनारस आया।’’ उसी समय से इनका परिवार राज दरबार से सम्बन्धित रहा है और राज परिवार की भूमि पर ही कृषि द्वारा जीवनयापन कर रहे हैं। रामलीला में रामायणी के रूप में अपनी भूमिका के संदर्भ में इन्होंने बताया कि ’’रामायण पाठ से मेरा लगाव इसलिए है कि रामजी स्वयं रक्षा करते हैं और श्रीरामचरितमानस पाठ से लोक और परलोक दोनों सुधरते हैं। अब बस यही इच्छा है कि जब तक रहें रामायणी का निर्वहन करते रहें और यही संस्कार अपने बालकों में आये। ’’

रामलीला के स्वरूप और रामायण पाठ में आये बदलावों के प्रश्न पर बताते हैं कि पहले जैसा शासन और राजसी भय अब नहीं है। कुछ पुरानी चीजें कमजोर हो गयी हैं और इनका लोप होने के बाद वह नहीं आती, न तो पहले वाली पोथी रह गयी है और न ही पहले जैसे पाठ करने वाले।

श्री महेन्द्र नाथ मिश्रा– मीरजापुर के चुनार, अदलहाट कैलहट क्षेत्र के गौरही गांव निवासी महेन्द्र नाथ मिश्र 7 वर्ष से रामायणी के रूप में रामलीला में हैं। श्रीरामलीला में इनके परिवार का यह प्रथम जुड़ाव है। आप वर्ष 2009 से रामलीला से जुड़े हुए हैं। ‘‘ग्रामीण पृष्ठभूमि के होने, समाज सेवा में रूझान होने व युवा अवस्था से ही रामलीला देखने आने लगे, जिसके कारण मेरे मन में बहुत इच्छा थी कि रामनगर की इस रामलीला में कुछ सेवा करें, जिसका अवसर हमें 2009 में रामायणी के रूप में प्राप्त हुआ।’’ आप कहते हैं कि ‘रामायण गाने का अपना ही आनन्द है।’ मै युवा अवस्था में कजरी गाने का शौकीन था। ऐसे में रामायण गाना एक सन्तोष का कार्य है और प्रभु की सेवा का लाभ मिलता है।’’

श्री रजनी कान्त झा– आप सन् 2001 से रामायणी के रूप में सेवा कर रहे हैं। पूर्व में आप के बड़े पिताजी श्री जयनारायण झा जी रामायणी थे। प्रभु श्रीराम के प्रति अटूट श्रद्धा एवं समर्पण को रामायणी की भूमिका के निर्वहन के लिए कारण बताते हुए आपका कहना है कि ‘यह श्रीराम का कार्य है इसलिए पारिश्रमिक नेपथ्य में है।’’ वर्तमान में रामलीला में व्याप्त दुव्र्यवस्था पर रोष जताते हुए कहा कि ‘‘ज्यादातर लीला स्थलों पर कंकड़, गिट्टी है। इस पर रामायणी नंगे पैर चलते हैं। स्व0 महाराज श्री विभूति नारायण सिंह के समय श्रीरामलीला में संध्याकाल के दौरान आराम करने का समय मिल जाता था। परंतु अब नहीं है। रामायणी दल को दिये जाने वाले दान में भी कमी आ गई है। अब रामायणी दल में पहले जैसे नारद वाणी गाने वाले आवाज नहीं रह गई है।’’

श्री शम्भु त्रिपाठी– पेशे से नर्सरी स्कूल में अध्यापक शम्भु त्रिपाठी सन् 2010 से रामायणी के रूप में रामनगर की रामलीला से जुड़े हैं। रामायणी की भूमिका निर्वहन के प्रति इनका कहना है कि ‘‘यह बड़े सौभाग्य की बात है कि मैं रामकाज से जुड़ा हूँ।’’

 

 

श्री रविशंकर पाण्डेय– पिछले 9 वर्ष से रामायणी की भूमिका में हैं। इसके पूर्व इनके पिताजी पण्डित स्व0 दीनदयाल पाण्डेय जी ने 35 वर्ष तक रामायण पाठ किया जो काफी चर्चित भी रहे हैं। रामायणी भूमिका इस परिवार को रामलीला के प्रारम्भ से ही विरासत में मिली हुई है। शुरूआत के क्रम से इस परिवार में रामायणी की भूमिका में स्व0 भोलानाथ पाण्डेय, छुन्नी पाण्डेय, बिहारन पाण्डेय, रामजी पाण्डेय रामायणी रह चुके हैं।

श्री विजय कान्त मिश्र– ग्राम- पटनवाँ, के निवासी विजय कान्त मिश्र जी पिछले डेढ़ दशक से रामनगर की रामलीला में रामायणी की भूमिका में हैं। रामजी की सेवा को ही अपना सर्वस्व मानने वाले मिश्र जी का कहना है कि ‘जब तक शरीर साथ देगा और रामजी की कृपा रहेगी यह कार्य करता रहूँगा।’

 

 

श्री प्रेम दयाल पाण्डेय ‘पप्पू’– 

रामनगर की रामलीला में रामायणी दल के साथ एक मृदंग वादक भी होते हैं जो नारदी गायन में मृदंग वादन करते हैं। वर्तमान में रामायणी दल में मृदंग वादक के रूप में प्रेम दयाल पाण्डेय हैं, जो पिछले 9 वर्ष से मृदंगी की भूमिका में हैं। इनसे पूर्व इनके गुरू श्री जितेन्द्र किशोर पाण्डेय मृदंग वादन का कार्य करते थे।

रामनगर का इतिहास

इतिहास लेखन को लेकर विद्वानों में तमाम मतभेद समय पर उभरते रहे हैं कभी तत्कालीन सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों की उपेक्षा के रूप में तो कभी उद्गम काल के संदर्भ में संदेह के रूप में। हांलाकि तार्किक रूप से वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर ऐसे संदेह कम तो जरूर हुए हैं। कुछ यही स्थिति कमोबेश बनारस के इतिहास को भी लेकर है। इतिहास-साहित्य के मेल ने एक बीच का रास्ता निकाला, यह था ‘प्राचीनतम् से भी प्राचीन‘ का।

दूसरी तरफ पौराणिक आधार स्वयमेव सदैव से निश्चित रहा है-‘शिव की काशी‘ के रूप में। कुल मिलाकर तथ्य यह है कि हमें जब भी बनारस के इतिहास की बात करनी होगी तो इतिहास-साहित्य के साथ वैदिक-पौराणिक साक्ष्यों को भी समान महत्व देना पड़ेगा। अर्द्धचन्द्राकार रूप में गंगा तट पर बसी यह नगरी न सिर्फ अपनी संरचना के आधार पर बल्कि अपनी वैविध्यपूर्ण संस्कृति के आधार पर भी प्राचीनतम लेकिन अनोखेपन की दास्तां बयां करती है। जब बात ‘वैविध्यपूर्ण संस्कृति‘ के साथ ‘अनोखेपन‘ की हुई है तो नगर के दक्षिणी-पूर्वी छोर की बात करना महत्वपूर्ण हो जाता है। दक्षिण दिशा में गंगा नदी के दूसरे किनारे पर एक ‘उपकाशी‘ भी बसती है जिसका आधार औघड़दानी शिव नहीं बल्कि अयोध्यापति प्रभु राम हैं…. यह नगरी रामनगर है। काशी का रामनगर।

वैज्ञानिक-पुरातात्विक साक्ष्य जो भी हों, रामनगर का इतिहास यहां की रामलीला का इतिहास है, ऐसा कहना अतिशयोक्ति नहीं। कानों सुनी आंखो देखी बातों पर विश्वास करें तो हां समय काल के बन्धन में जरूर इस नगरी को बांट सकते हैं। लेकिन चीजें कल्पना से परे भी अस्तित्व में रहती हैं, यहीं यथार्थवाद है यहीं एकमात्र सत्य है। इस स्थान की पवित्रता की गवाह कोई और नहीं स्वयं निजबोध रूपा माँ गंगा हैं जो अपने दूसरे छोर पर सिर्फ प्रभु राम की गाथा गाती इस नगरी को सहेजे हुए हैं। पौराणिक साक्ष्य काशी क्षेत्र में गंगा के दोनों किनारों के अधिपतियों को निर्धारित करते हैं- वामाधिपति शिव हैं तो दक्षिणाधिपति राम।

काशी और गंगा का संबंध सदियों से रहा है। यह नदी काशी के लिए सिर्फ जलस्रोत के रूप में नहीं रही है बल्कि गंगा काशी के सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और धार्मिक आधार का केंद्र बिंदु रही है। भौगोलिक रूप से भी इस शहर की जो सूरत हमारे सामने है वह गंगा की वजह से ही है। क्योंकि अनेकों सहस्त्राब्दियों से निरंतर प्रवाहित होने वाली धारा के साथ आयी मिट्टी ने यहां के भौगोलिक रूप को परिवर्तित किया है। भौगोलिक संरचना की दृष्टि से काशी क्षेत्र मध्य गंगा घाटी में स्थित है। गंगा जो भारत के उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की ओर हिमालय की विशाल श्रृंखला के लगभग समानान्तर बहती है। इस प्रवाह के साथ ही गंगा हिमालय क्षेत्र से अपने साथ लाती हैं खनिजों से युक्त मिट्टी। काशी में गंगा के बायें तट पर स्लेटी बालू व दोमट के रूप में पहचाना गया है, जबकि दक्षिण यानी विन्ध्य व कैलाश क्षेत्र से आयी मृदा का जमाव रामनगर (गंगा के दाहिने तट) पर लाल जमाव के रूप में देखा जा सकता है। गंगा का दाहिना तट, जहाँ रामनगर स्थित है, कुछ नीचा है। काशी की जीवनरेखा गंगा नदी रामनगर से बहती हुई उत्तर दिशा में अद्र्वचंद्राकार घुमाव रूप लिए हुए है। इसकी वजह से पूरा शहर जो गंगा के घुमाव पर बसा हुआ है वह रामनगर के सामने घाटों पर देखा जा सकता है। वैज्ञानिक अध्ययनों से प्राप्त साक्ष्यों से तिथियों के आधार पर यह माना जा सकता है कि आज से लगभग 40000 वर्ष पूर्व गंगा काशी में प्रवाहित होने लगीं थीं। लगभग सात हजार वर्ष पहले काशी की भूसंरचना में आमूल बदलाव आया।

        गंगा के दाहिने तट यानी रामनगर का अध्ययन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और ज्ञानप्रवाह के संयुक्त तत्वावधान में श्रीमती विदुला जायसवाल के निर्देशन में वर्ष 2005 तथा 2006 में किया गया। इस अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष निकला कि लगभग 3 किलोमीटर का गंगा तट प्राचीन भूमिगत आवासीय अवशेषों से युक्त है। राजा बनारस का आवास रामनगर कोट प्राचीन किले के पूर्वी भाग पर स्थित है। साथ ही यह पूरा जमाव कई स्थानों पर प्राकृतिक कारणों से भी कटे हुए हैं। जैसे- कुत्ता घाट, गोलाघाट, उड़िया घाट है। इनमें से दो घाट ओड़िया व गोला-पुरातात्विक व भूगर्भ शास्त्रीय अन्वेषण के प्रमुख क्षेत्र हैं। रामनगर व्यापार का भी केंद्र रहा है। उड़िया घाट पर हुए उत्खनन से यह प्रमाणित है कि जनपदकालीन विशिष्ट मृदा-पात्र जिनका व्यापार किया जाता था, यह पात्र उत्तर कृष्ण मार्जित मृदभाण्ड परम्परा के नाम से जाने जाते हैं। प्राचीन रामनगर अर्द्धमूल्यवान पाषाण मनकों के उत्पादन का महत्वपूर्ण केन्द्र था जो अन्य नगरों में निर्यात किये जाते रहे होंगे।

        रामनगर किले के पास दक्षिणपश्चिमी भाग में गोला घाट तथा उड़िया घाट का उत्खनन कर लगभग 30 मीटर के जमाव का यहाँ दो खण्डांे में अध्ययन किया गया। ऊपरी सतह से लगभग 10 मीटर का जमाव पूरे अवशेषों से युक्त था, जो पुरातात्विक विधि से खोदा गया, जबकि नीचे का 20 मीटर मोटा जमाव मानवीय आवास के पहले का था तथा गंगा नदी के इतिहास से लिए महत्वपूर्ण था।रामनगर का इतिहास        रामनगर भौगोलिक रूप से आयात-निर्यात के लिए बेहद उपयोगी था क्योंकि यह स्थान गंगा के तट पर बसा होने के कारण जल मार्ग से दूर क्षेत्रों व अन्य राज्यों से जुड़ा था। उत्तर में राजघाट एवं सारनाथ (जनपद काल, मौर्यकाल, गुप्तकाल में अति समृद्ध था) वहीं बीस किलोमीटर दक्षिण में स्थित अहरौरा अशोक अभिलेख इस बात का प्रमाण है कि यहां व्यापार मार्ग अथवा समृद्ध स्थलीय मार्ग रहा होगा जिसके बीच रामनगर का क्षेत्र एक व्यापार केन्द्र या बर्तनों के निर्यात का तत्कालीन केन्द्र रहा होगा।

        ‘‘रामनगर का सांस्कृतिक व ऐतिहासिक महत्व जातक कथाओं से भी प्रमाणित है। एक जातक कथा कच्छप जातक में बोधिसत्व को कुम्भकार के गांव में जन्मा बताया गया साथ ही इनको मृदभाण्ड के व्यापार द्वारा पत्नी व दो बच्चों के पालन का श्रेय भी दिया गया है। उनको कई सेवक/सेविकाओं का स्वामी तथा अमूल्य सोने का स्वामी बताया गया है। वर्णन के अनुसार उनका गांव वाराणसी की विशाल नदी के तट पर स्थित एक विशाल झील के पास स्थित था। यह झील नदी के इतने पास थी कि अधिक वर्षा के समय नदी व झील का जल एक दूसरे में मिल जाता था। ऐसे में झील के जीवजंतु नदी में चले जाते थे। कथा का मुख्य पात्र एक कछुआ था। कथा आगे एक उपदेश के रूप में बढ़कर समाप्त हो जाती है। इस जातक कथा में, काशी राज्य में वाराणसी के पास कुम्भकारांे के गांवों का उल्लेख है। साथ ही मृदा पात्र के समृद्ध व्यवसाय व व्यापार का भी स्पष्ट उल्लेख मिलता है। रामनगर के पुरातात्विक साक्ष्यों में इन जातक कथाओं की झलक मिलती है।’’

(प्रो0 विदुला जायसवाल के लेख में वर्णित)

        रामनगर का उड़िया घाट गंगा के दाहिनी तट पर वाराणसी के पास स्थित है। ओरियाघाट के उत्खनन में झील का स्पष्ट अस्तित्व मिलता है। एक झील के सूखने के बाद उसकी तलहटी पर रामनगर का प्रारम्भिक स्थान स्थित था। महत्वपूर्ण बात यह है कि झील के सूखी तलहटी के ऊपर स्थित आवासीय स्तर ई0पूर्व तृतीय शताब्दी के हैं। इसके अनुसार जनपदकालीन प्रथम बस्ती झील पर स्थित थी। जनपदकालीन विशिष्ट पात्रों की कार्यशालायें भी उड़िया घाट में अत्यन्त सक्रिय थी। जिनके उत्पाद का भी निर्यात होता था।

ं      काशी-राजघाट की तरह ही रामनगर का उड़िया घाट मुहल्ला भी जनपद काल से स्थापित था। कुषाण काल का पूर्वार्द्ध (लगभग ईसवी के प्रारम्भ से द्वितीय शताब्दी ई0 तक) रामनगर के इतिहास का गौरव काल था, क्योंकि यहाँ के चतुुर्थ सांस्कृतिक काल से काशी-राजघाट के समान ही ईटों की वास्तु संरचनाएं सामने आई हैं। पुरावस्तुओं के स्वरूप तथा सिक्कों व मुहरों के आधार पर यह बस्ती भी व्यापारिक केन्द्र प्रतीत होती है। रामनगर के राजनैतिक इतिहास को जानने के लिए राजवंश का जानना आवश्यक है। क्योंकि यहां के राजनीति में राजवंश के अलावा किसी का हस्तक्षेप नहीं रहा है। काशी से 5 कोस दक्षिण कशवार परगने के थिथरिया (वर्तमान गंगापुर) में श्री ‘मनोरंजन सिंह नाम के एक गौतम भूमिहार जमींदार रहते थे जिनके बड़े लड़के मनसाराम ने मीर रुस्तम अली के यहां नौकरी कर ली। ये बड़े योग्य, चतुर और बुद्धिमान् थे। कुछ ही समय में ये मीर रुस्तम अली के विश्वासपात्र हो गये। मीर रुस्तम अली के संबंध में लखनऊ में नवाब सआदत खां के कान भरे जाने लगे। उधर मालगुजारी का रुपया देर से जाने लगा जिससे रुष्ट होकर नवाब ने अपने नायब सफदर जंग को सन् 1738 ई0 मी मीर से रुपये लेने को भेजा, जिसने जौनपुर में अपना पड़ाव डाला। बुद्धिमान श्री मनसाराम ने इस अवसर पर मीर की आज्ञानुसार जौनपुर जाकर नायब को बहुत कुछ समझा बुझा कर उनका क्रोध शान्त किया। इधर मनसाराम के विपक्षियों ने मीर को उनके खिलाफ भड़काना शुरू कर दिया। जब इस बात का पता मंशाराम को चला तो वे सोच में पड़ गये। चतुर मंशाराम ने एक नया प्रस्ताव नायब के सम्मुख रखा जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। मनसाराम ने तेरह लाख वार्षिक पर बनारस, जौनपुर, और चुनार के परगनों को अपने पुत्र श्री बलवंत सिंह के नाम लिखा लिया। पिता का सब कार्य कर बलवंत सिंह ने इलाहाबाद के सूबेदार अमीर खां के द्वारा अपना एक आदमी दिल्ली भेजा जिसने श्री बलवंत सिंह के दिये 21,775) रुपये नजर बादशाह मुहम्मदशाह को भेंट किये और उनसे राजा की पद्वी तथा तीन जिलों का पट्टा लिखवा लिया। अब राजा बलवंत सिंह ने गांव का नाम बदल कर गंगापुर रखा और वहां पर एक किला बनवाना आरंभ किया जिसके तीन तरफ खाई खोदी गई और एक तरफ से रास्ता रखा गया। राज्य को दृढ़ करने और उसका विस्तार बढ़ाने में यह सदा लीन रहते थे। सन् 1750 ई0 में गंगा के दाहिने किनारे पर रामनगर का किला बनवाया। 22 अगस्त सन् 1770 ई0 में प्रतापी राजा बलवंत सिंह की मृत्यु हो गई। वर्तमान में इसी राजवंश के लोगों का रामनगर किले पर अधिकार है। साथ ही रामलीला सहित अन्य परम्पराओं को राजवंश की ओर से निभाया जा रहा है।

रामलीला में साधु संत एवं नेमीजन

‘पद सरोज पद पायनी, भक्ति सदा सत्संग‘‘

भक्ति और भाव के पारस्परिक सम्बन्ध में य्ाूँ तो दृष्­िटकोंण को सर्वोच्चता प्राप्त है परन्तु निरन्तरता का अभाव कहीं भी, किसी भी प्रारुप में विसंगति के जन्म का कारण भी बनता है। फिर चाहे शान्त जल के निश्चल प्रवाह में निरन्तरता का अभाव हो या फिर दार्शनिक गूढ़ चिन्तन में निरन्तरता का अभाव। परिणति विसंगति ही होगी…… जल प्रलय या शंकाग्रस्त विवेक की परिणति। प्रश्न उठता है निरन्तरता किसमें हो? भक्ति में निरन्तरता या भाव में निरन्तरता? जिज्ञासा की शांति के पूर्व हमें जीवन में भक्ति और भाव के उद्गम को समझना नितान्त आवश्यक है। भाव के प्रमुख रूपों मंे सेवक भाव, सखा भाव, बन्धु भाव, दया भाव, आकर्षण भाव, माधुर्य भाव प्रमुख हैं, इन्हीं भावों में निमग्नता ही भक्ति है। भावोदय से ही भक्ति का जन्म है। निःसंदेह भाव में निरन्तरता और भक्ति में प्रतिबद्धता से ही मनुष्य साकार ब्रह्म की प्राप्ति का दावा करने में सक्षम हो सकता है। प्रश्न पुनः उठता है निरन्तरता और प्रतिबद्धता की प्राप्ति कैसे हो? एकमात्र उत्तर है- दर्शन। दर्शन का शाब्दिक अर्थ देखना है लेकिन व्यवहारिक अर्थ देखने के साथ आत्मसात् करना है। कुछ ऐसी ही देखने के साथ आत्मसात् करने की प्रवृत्ति रामनगर की पुण्यसलिला रामलीला में देखने को मिलती है। दावे अनेक हैं…. साक्षात् प्रभु दर्शन के, कष्टहरण के, रहस्यमयी चमत्कार के, वियोग-हरण संयोग के, धर्म और विज्ञान के मेल तक के दावे श्रीरामलीला महानुष्ठान में भक्तो द्वारा किये गये हैं। इन दावों-साक्ष्यों की सम्पूर्ण पवित्रता को अक्षुण्ण रखते हुए मूलाधार तटस्थ भाव की अनदेखी करना वैसी ही भूल होगी जैसे ज्ञान के नेपथ्य में अनुभव को महत्वहीन समझना।  सोलहों संस्कारों से भी अधिक पुण्यफलदायक श्रीरामलीला के महात्म्य को शब्दों में गढ़ना बेहद जटिल है, इस महात्म्य को श्रीरामलीला मंचन के दौरान उपस्थित लोगांे के मुख पर सहज ही पढ़ा जा सकता है। दो सौ वर्ष प्राचीन श्रीरामलीला मंचन का अपरिवर्तित स्वरूप संभवतः ब्रह्माण्ड के उस सार्वभौमिक नियम का विरोध करता है जिसके अनुसार परिवर्तन अवश्यम्भावी है। इस अखिल ब्रह्माण्ड के नियंता का एक माह का रामनगर मंे प्रवास ही सार्वभौमिकता के विरोध का कारण बनता है, ऐसा कई वर्षों से नियमित आ रहे भक्तों का दृढ़ विश्वास है। एक माह की इस आत्मावलोकित लीला में साधु-सन्तों की टोलियां दूर-दूर से आकर रामनगर में प्रवास करती हैं और प्रभु सानिध्य के आनन्द में भजन-कीर्तन का निरन्तर प्रवाह करती रहती हैं।

श्रीरामलीला का संदेश पूर्णतः सामाजिक है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। अयोध्या और काशी की भौगोलिक दूरी कैसे इस एक महीने के दौरान अदृश्य रहती है साथ ही कैसे अवध पति काशी नरेश बनते हैं, यह विशुद्ध सामाजिक संप्रेषण ही कहा जायेगा। ‘लोक‘ समग्र श्रीरामलीला का एक ऐसा पक्ष है जो वैशिष्ट्यता को दर्शाता है न कि स्थानीयता को। रामनगर, वाराणसी तथा आस-पास के गाँँवों से नियमित रूप से श्रीरामलीला के दर्शनानुभव के साक्षी बनने के लिए आने वाले ‘नेमी‘ कहलाते हैं। यद्यपि ‘नेमी‘ नियमित का अपभ्रंश है लेकिन लोकाचार में साधु-सन्तों के साथ ‘नेमी‘ भी भक्तों की एक वर्गीकृत श्रेणी है। कहते हैं भक्त-भगवान की एकरूपता ही चिन्मयानन्द की अनुभूति का कारण बनती है, ऐसे में भक्त चिन्मयानन्द की प्राप्ति के लिए भगवत्रुप धारण करते हैं। कुछ ऐसी ही तैयारी नेमिजन भी करते हैं। लीला पूर्व ही नये-स्वच्छ वस्त्रों, इत्र और सजी-धजी छड़ी के साथ हाथ में रामचरितमानस पोथी लिये नेमियों की लाखों लोगों की भीड़ में पहचान करना बेहद आसान है। विभिन्न व्यवसायों-कार्यालयों में कार्यरत ये नेमीजन अपना एक पूरा महीना प्रभु श्रीराम को समर्पित करते हैं। आज की अर्थ केन्द्रित सोच-समझ पर आधारित जीवन के विपरीत नेमीजनों की यह श्रद्धा समर्पण विश्व को शांति का संदेश भी दे जाता है।  ‘‘हिम्मत नहीं हठ है मेरी यहां आने की‘‘…. 85 वर्षीय श्रीराम मोहनी शरण ‘‘मौनी बाबा‘‘ की यह उक्ति लीला दर्शनातुर साधुआंे-नेमियों की आस्था का प्रतिनिधित्व करती है जिसमें भक्ति की प्रतिबद्धता स्पष्ट झलकती है। उम्र के सम्बन्ध में यहां बताना आवश्यक है कि नेमीजन सहज ही 9 से 90 साल तक की दिखाई दे जायेंगे। प्रश्न उठना लाजिमी है कि आखिर दर्शनार्थी और नेमी में अन्तर क्या है? अन्तर दृश्यास्वादन और रसास्वादन का है। दर्शनार्थी नियमित लीला दर्शन नहीं करते। वे किसी विशेष लीला का दर्शनार्थ चयन करते हैं और दृश्यास्वादन में रूचि लेते हैं। जबकि नेमी नियमित रूप से श्रीरामलीला में उपस्थित होते हैं और यदि किसी कारणवश लीला दर्शन से वंचित हो गये तो भी एक माह अनवरत लीला आरती तो अवश्य ही लेते हैं। इस प्रकार नेमीजन श्रीरामलीला के आध्यात्मिक-सामाजिक संदेशों का रसपान पूरे एक महीने करते ही हैं। तमाम पारिवारिक, सांसारिक झंझावतों को दरकिनार कर रामनगर में एक महीने श्रीरामलीला में साक्षात् रामानुभव करने की भक्तों की यह साधना ‘हठयोग‘ का ही रुप है जिसमें संवेदना की जीवन्तता का गूढ़ संदेश निहित है।

भक्तों के सहज दृष्टिकोंण को समझना उतना ही आवश्यक है जितना मानस के पावन संदेश को समझना। प्रस्तुत है रामनगर की श्रीरामलीला में कई वर्षों से अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे साधु-संतो, नेमियों का भावानुभव जिसमें प्रभु श्रीराम के प्रति अटूट श्रद्धा है तो वहीं मानस की चैपाइयों के कंठस्थ होने के साथ दार्शनिक निहितार्थ की गूढ़ समझ भी है…… जिसमें श्रीरामलीला में प्रभु श्रीराम के साक्षात् दर्शन होने का आध्यात्मिक दावा है तो वहीं श्रीरामलीला के सामाजिक सरोकार की सांसारिक भावना भी है….. जिसमें पीढ़ियों से चले आ रहे संस्कारों का वर्णन है तो वहीं नित नये अनुभव होने का रहस्योद्घाटन भी है…. जिसमें श्रीरामलीला की अखण्ड पवित्रता को लेकर निश्चिंतता है तो वहीं 200 सौ सालों से अपरिवर्तित श्रीरामलीला के स्वरूप को लेकर आस्थावान मन में उत्साही खनक भी है…

डाॅ0 सर्वेश्वर दास (पीला बाबा) – अयोध्या निवासी साधु डाॅ0 सर्वेश्वर दास (पीला बाबा) के रामनगर की रामलीला में आने का क्रम 1983 से ऐसा बना कि अब ये लगातार एक महीने रामनगर में रूककर प्रभु सेवा में लगे रहते हैं। मौनी बाबा के शिष्य श्री पीला बाबा बताते हैं कि- ‘‘मैं मौनी बाबा की प्रेरणा से पहली बार रामनगर रामलीला देखने आया, श्री मौनी बाबा पड़ाव पर रहते थे और उनकी उम्र 200 वर्ष थी, जो हमेशा ही केले के छाल की लंगोटी लगाये रहते थे। तब से इस रामलीला के आकर्षण ने मुझे इस कदर सम्मोहित किया कि प्रत्येक वर्ष एक महीने के लिए रामलीला में उपस्थित होकर श्रीराम के चरणों की सेवा का संकल्प जाग गया।’’ रामलीला के दौरान रामनगर में एक महीने के प्रवास के दौरान पीला बाबा की दिनचर्या में सुबह सर्वप्रथम रामजानकी आदि की भूमिका कर रहे बालक पात्रों की चरण सेवा शामिल है। बडे ही श्रद्धा एवं प्रेमपूर्वक पीला बाबा इन पात्रों के चरण दबाते हुए मिल जायंेगे। रामलीला के नेमियों-प्रेमियों के प्रति आत्मीयता एवं अपार स्नेह का भाव पीला बाबा की पहचान बन चुकी है। पीला बाबा आगे बताते हैं कि 1967 में मैं पहली बार अपने आश्रम (रामकुंज कथा मण्डप, रामघाट, अयोध्या) से यहां आया तो पम्पासरोवर के पास रूका था। तब से अब रामलीला में हुये परिवर्तनों पर सवाल पूछने पर चिकित्साशास्त्र में स्नातक डाॅ0 सर्वेश्वर दास जी कहते हैं कि यहां की विश्व प्रसिद्ध रामलीला में कुछ परिवर्तन जरूर आया है जैसे- ‘‘पहले साधु संतों की बड़ी टोली बाहर से एक महीने के लिए रामनगर में रूककर प्रवास तथा कीर्तन-भजन करते हुए रामलीला मैं सहभागिता करती थी लेकिन अब समय के बदलाव ने साधु-संतों की संख्या में कमी आ चुकी है जिसका कारण है कि पहले साधुओं को व्यापक राजाश्रय और संसाधन उपलब्ध कराये जाते थे, उनके रूकने एवं आहार-व्यवहार के लिए विशेष प्रबन्ध की चिंता की जाती थी।’’ पीला बाबा कहते हैं कि एक महीने के रामलीला दर्शन के उपरांत अयोध्या लौटने पर मुझे वर्षभर के लिए नई ऊर्जा प्राप्त होती है। मौनी बाबा के शिष्य डाॅ0 सर्वेश्वर दास (पीला बाबा) रामलीला के मर्म को इंगित करते हुए बताते हैं कि ‘‘जब कभी आप आरती के समय ध्यान देंगे तो उस समय भगवान श्रीराम शून्य की ओर देखते हैं, वास्तव में तत्समय पात्र के अन्दर देवांश आ जाता है, उस समय देवता का पलक नहीं झुकता। यह लक्षण आपको केवल रामजी बने पात्र में परिलक्षित होगा।’’

रामलीला प्रेमियों के निष्ठा को बताते हुए कहते हैं कि यहां पर सबकी अपनी-अपनी अलग-अलग तरीके की आस्था है जिसके कारण नेमीजन रामलीला में आते हैं। यह सभी रोचक और कहानी के रूप में आपको प्रतीत होगा। यहां हर नेमी की अलग-अलग कहानी है। एक यादव बंधु की कहानी बताते हुए पीला बाबा ने बताया कि वे सज्जन अपने भैंस को चारा और पानी खिलाते हैं तो वह नहीं खाती है इसी बात से गुस्साकर वो रामनगर की रामलीला में चले जाते हैं, लौटने पर देखते हैं कि भैंस पूरी तरह से स्वस्थ हो गयी है और वह चारा भी ठीक ढंग से खा रही है और दूध भी पर्याप्त मात्रा में देना शुरू कर दी, तब से यादव बंधु को लगा कि सब कुछ राम की कृपा पर आधारित है। उनके आस्था की इस नियमितता ने उन्हें नेमी बना दिया।

इसी ढंग से एक बुढ़िया नेमी की कहानी बताते हुए पीला बाबा कहते हैं कि उस बूढ़ी माता ने बताया कि वह बहुत दिनों से परेशान थी कि उनका किरायेदार मकान हड़पने को तैयार था तथा किसी भी प्रकार छोड़ने को तैयार नहीं था। खिन्नता में उन्होंने संकल्प लिया कि अब मैं नियमित लीला में जाना छोड़ दूंगी जब तक किरायेदार द्वारा मानसिक उत्पीड़न खत्म नहीं हो जाता। पीला बाबा कहते हैं कि इसे रामजी की कृपा ही कहेंगे कि रामलीला शुरू होने के चन्द दिनों के पहले ही उस बूढ़ी माता का किरायेदार अचानक से मकान पर अपना कब्जा छोड़ अन्यत्र चला जाता है। फिर उस बूढ़ी नेमी का आस्था निरन्तर बनी रहती है। अपने बारे में बताते हुए पीला बाबा कहते हैं कि हर वर्ष ऐसा प्रतीत होता है कि अगली बार पुरूषार्थ काम नहीं करेगा शायद रामलीला में न जा पाऊं लेकिन न जाने कहां से इतनी शक्ति आ जाती है मैं अयोध्या से खींचा हुआ सीधे रामनगर की विश्व प्रसिद्ध रामलीला में आ जाता हूँ। वे कहते हैं कि यह मेरा परम सौभाग्य है जो रामचन्द्रजी की आरती का साक्षात् दर्शन करता हूँ जब तक शरीर  में जान रहेगी तब तक आता रहूंगा। ऐसा पीला बाबा का दृढ़ संकल्प है। इस बार भी तबीयत बहुत खराब थी। आश्रम के लोग पीला बाबा को कहीं हिलने के लिए मना कर रहे थे लेकिन वो रामनगर की रामलीला के लिए निकल पड़े।

श्री राममोहनी शरण जी – विघ्न हरण हनुमान मंदिर, लक्सा वाराणसी के 85 वर्षीय साधु श्री मौनी शरण जी लगभग 50 वर्षों से अनवरत लीला दर्शन को आते हैं। अपने गुरु श्री रघुनाथ शरण जी महाराज से दीक्षा प्राप्त श्री मौनी शरण जी का राम नाम से असीम प्रेम है। अपने बारे में बताते हैं कि- ‘‘हर महीने वृंदावन जाता हूँ। यह प्रभु कृपा ही है कि राम भक्त हनुमान के मन्दिर में प्रतिदिन भोर में 3ः30 बजे अपनी हाजिरी लगवा देता हूँ।’’ श्रीरामलीला के संदर्भ में अत्यन्त उत्साही होकर मौनी बाबा कहते हैं, ‘‘रामनगर की रामलीला में जो व्यवस्था है अन्यत्र कहीं नही। यहां लीला स्थल अलग-अलग है। अब देहात से ज्यादा लोग आते हैं परन्तु फिर भी शान्ति बहुत है। साधु-सन्तों की सेवा में कमी है। राजा की अरुचि भी प्रमुख कारण है। पूर्व काशी नरेश विभूति नारायण सिंह जी को लीला, नेमियों तथा साधु-सन्तों से विशेष लगाव था। फिर भी एक लाइन सी चली आ रही है। मर्यादा कायम है। लोगों की भावुकता भी अत्यंत अद्भुत है।’’ श्री रामलीला दर्शन हेतु अपनी अपार निष्ठा को व्यक्त करते हुए बलपूर्वक कहते हैं कि- ‘‘हिम्मत नही, हठ है मेरी यहां आने की। जब संसार है, तो आध्यात्म क्यों नही।’’ प्रभु श्रीराम एवं भक्त हनुमान के चरणों में अनन्य श्रद्धा रखने वाले श्री मौनी शरण जी लोक संग्रह के द्वारा लक्सा पर एक हनुमान मन्दिर का निर्माण करा चुके हैं। जहां जाड़े व गर्मी में दो महीने अखण्ड कीर्तन चलता है तथा रामलीला स्थल पर प्रत्येक दिवस लीला प्रारम्भ होने से लगभग 30ः00 मिनट पहले अपनी पूरी टोली के साथ भावपूर्ण श्रीराम कीर्तन करते हैं। पुराने लोग बताते हैं कि रामनगर की रामलीला में पहले साधु-संतों की अनेक टोलियां आकर एक महीने तक प्रवास करती थीं तथा लीला पूर्व व अन्तराल में हरिकीर्तन होते रहते थे। श्री मौनी शरण के नेतृत्व में यह कीर्तन की टोली इस परम्परा का अलख जगाये हुए है।

श्री गणेश दास जी – 16 वर्षों से अनवरत लक्ष्मण बने पात्र के वाहन के रूप में साधु गणेश दास जी श्रीराम लीला में सन्नद्ध हैं। रामनगर से आपका जुड़ाव जन्म से है। यहां की लीला के प्रति अपने विचार व्यक्त करते हुए श्री गणेश दास जी कहते हैं कि- ‘‘धर्मचन्द्र, करमचन्द्र दो भाई थे। करमचन्द्र नास्तिक था। परंतु धरमचन्द्र की आस्तिकता ने करमचन्द्र को सांख्ययोग की शिक्षा दी। यहां की लीला लीला नहीं साक्षात् भगवत् दर्शन है। वैदिक रीति से गणेश पूजन के द्वारा लीला सिद्ध होती है। यह मेला नहीं लीला है केवल आस्था ही यहां की साज-सज्जा है, घट-घट वासी होने का सबसे बड़ा प्रमाण है कुछ लोग इसे कहानी समझते हैं। धर्म की स्थापना डंडे से नहीं होती है धर्म स्व-भाव है, सम-भाव है।’’

श्री राजकुमार दास- बलुआ घाट, रामनगर, वाराणसी निवासी साधु श्री राजकुमार दास जी का रामलीला से पुराना जुड़ाव है। पूर्व में आप रामायणी भी रह चुके हैं। वर्तमान में आप श्री रामचन्द्र जी की भूमिका का निर्वहन कर रहे बालपात्र के वाहन हैं। लीला के प्रति इनसे श्रद्धा व भावपक्ष जानने की कोशिश की गयी तो इन्होंने विनम्रतापूर्वक बताया कि- ‘‘रामेच्छा से होश संभालने के साथ ही रामलीला के साथ प्राकृतिक प्रेम पनपा। 20 सालों से मूर्ति उठा रहा हूँ। भक्त और भगवान एक दूसरे के पूरक हैं। भगवान की लीला अलौकिक है आप एक पैर बढ़ायेंगे, भगवान आपके पास दौड़े चले आयेंगे। यहां साकार रूप दिखाया जाता है। जबकि भगवत् रूप निराकार है। सभी लीलाएं समान हैं। दरअसल प्रतिदिन शाम होने का बेसब्री से प्रतीक्षा रहती है। यह जादुई छड़ी नहीं तप है। ‘‘जे जाने तई देहि जनाई, तुमहि जानत, तुमहि हो जाई।’’ परमात्मा ने स्वयं अखिल ब्रह्माण्ड को अपने कंधे पर उठाया है, ऐसे में स्वयं परमात्मा को कंधे पर बैठाना अपने आप में अलौकिक अनुभव है। बदलाव प्रकृति का शाश्वत नियम है। लौकिक दृष्टि से प्रभु दर्शन अलौकिकता की अनुभूति है। वास्तव में परिवर्तन प्रभु लीला में नहीं बल्कि कलयुग में होना चाहिए। ‘‘दुर्गुण छोड़ सगुण की यात्रा, इस युग का सबसे बड़ा चमत्कार माना जायेगा।’

श्री सन्त दास – बलिया निवासी 65 वर्षीय साधु श्री सन्त दास जी भरत जी के वाहन हैं। विश्व  प्रसिद्ध रामलीला के आकर्षण पर प्रकाश डालते हुए श्री सन्त दास जी बताते हैं कि-यहां जनरेटर, माइक, इलेक्ट्रिानिक लाइट का प्रयोग नही होता है। दूसरे संवाद स्तर की दृष्टि से अलौकिक है। मुकुट पहनकर प्रभु की अनुपम छवि दिखती है। भगवद् कृपा से समय के अनुसार परिवर्तन हुआ है। कलिकाल के प्रकोप से दिव्यात्माओं के आगमन की कमी हुई है। अब संासारिक छवि के आकर्षण से साधु कोई नही बनना चाहता है।’’भरत मिलाप की लीला आपके लिए विशेष आकर्षण एवं भाव विभोर कर देने वाली लीला है।

श्री जगदेव दास- प्रहलाद घाट, वाराणसी के निवासी 55 वर्षीय जगदेव दास 1980 से नेमी हैं भावुक होकर कहते हैं कि- ‘‘शरीर भाव से समझेंगे तो नही पता चलेगा। इसके लिए आत्मीय भाव जरुरी है। गुरु कृपा से चारों दिशाओं का मालिक बना जा सकता है, ऐसा श्रीराम लीला से संदेश मिलता है। तमोगुण से लीला के संदेश को ना ही जाना जा सकता है, आत्मसात् करना दूर की बात है। जानकी उपासक हूँ। उस छवि को लेकर सोने पर स्वप्न में भी छवि दर्शन होता है।….किन्तु दुःखद है कि आज भक्ति का स्थान शौक ने ले लिया है।’’

श्री धरमदास – माता जानकी में अटूट श्रद्धा रखने वाले श्री धरमदास जानकी जी के वाहन हैं । ज्यादातर समय लीला में मौन रहते हैं, लीला के समय प्रभु से अपनी अन्तर आत्मा को साक्षात् प्रभु को दर्शन का माध्यम मानते हुए अपने सेवा के अवसर को परम सौभाग्य बताते हैं। उनका कहना है कि जबतक शरीर साथ देगा लीला में आना होता रहेगा ।

बाबा मस्तराम जी- रामनगर में पंचवटी स्थित खास चौक के बाबा मस्तराम जी के लिए इस विश्व प्रसिद्ध रामलीला की सादगी ही आकर्षण का केन्द्र है। वे बताते हैं कि पहले साधुओं की बहुत टोलियाँ होती थीं, जो रामलीला के दौरान एक महीने प्रवास तथा भजन- कीर्तन के साथ इस विश्व प्रसिद्ध रामलीला को चार चांद लगाते थे अब वो संख्या बहुत कम हो चुकी है। पहले किसी प्रकार का व्यवधान नहीं था। अब उन्हें मर्यादा भी नहीं प्राप्त होती। राजाश्रय में कमी को भी वह साधुओं की कमजोर उपस्थिति का एक कारण मानते हैं पुरानी बातों को याद करते हुए बाबा कहते हैं कि पहले कई स्थानों पर कीर्तन होते थे जिसमंे साधुगण अलग-अलग टोलियों में रामलीला शुरू होने से एक घण्टे पहले अपनी मण्डली के साथ कीर्तन करते थे। रामलीला स्थल साधुओं के कीर्तन मण्डली से गुलजार होता था।

श्री हर-हर महादेव जी – कटेसर ग्राम के निवासी 67 वर्षीय साधु श्री हर-हर महादेव पिछले 12-13 वर्षों से लगातार शत्रुध्न जी के वाहन रह चुके हैं परंतु अब स्वास्थ्य ठीक नहीं रहने के कारण दर्शनार्थी के रूप में उपस्थिति रहती है। तब से अब में हुये परिवर्तन व श्रीरामलीला के प्रति उनके भाव जानने की कोशिश में वह दार्शनिक अंदाज में कहते हैं कि- ‘‘ भोर की पावन आरती में पाँच राजाओं का दर्शन होता है। ये पाँच राजा प्रतीक हैं- क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा। स्थूल रूप में किष्किन्धा के राजा सुग्रीव, लंका के राजा विभीषण, राजा जनक, अयोध्या के राजा रामचन्द्र और काशी नरेश का दर्शन एक साथ होता है। इस दर्शन से एक अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है, यहीं खिंचाव का कारण है। मंचन के रूप में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। यह भगवान राम की महती कृपा है कि लीला का स्वरूप आज भी अपरिवर्तित है।’’ सदैव साथ में त्रिशूल रखने के बारे में पूछने पर कहते हैं कि- ‘‘त्रिशूल महाकाल का प्रतीक है इसके तीनों शूल भूत, भविष्य, वर्तमान को उद्घाटित करते हैं।’’ ये सुन्दरकाण्ड का सम्पूर्ण मंचन नहीं छोड़ना चाहते। इनके अनुसार रामलीला का प्रथम और अंतिम उद्देश्य आत्म दर्शन है।

श्री गोपाल दास- पापड़िया मठ, उड़ीसा के 70 वर्षीय साधु श्री गोपाल दास 32 वर्षों तक भगवान श्रीराम बनने वाले बालपात्र के वाहन रहे हैं। ‘‘हमारा चरित्र आदर्श राम की तरह होना चाहिए। कर्म से ज्यादा चरित्र की प्रधानता अपरिहार्य है, ऐसा भाव जागृत रखना चाहिए।’’ इस प्रकार की भावना रखने वाले श्री गोपाल दास जी के लिए यह रामलीला कोई नौटंकी नहीं है। यहां सचमुच मंे राम का अवतार होता है। हर छवि में भगवान महसूस होते है। जब मन भगवद् भजन में लगा है तो परिवर्तन की कोई बात ही नही है।

रामलीला के नेमी एवं प्रेमीजन 

मन प्रसन्न है तो ठीक है पर यदि मन खिन्न है तो मन प्रसन्न होना चाहिए; किन्तु यह हो कैसे? इसके लिए मनोयोग होना चाहिए। किसी कार्य में मन रमने का बहाना या प्रेरणा होनी चाहिए और यदि ऐसा कार्य, धार्मिक निष्ठा से जुड़ा हो, भक्ति और उपासना से जुड़ा हो तब तो फिर सच्चिदानन्द की अनुभूति ही हो जाती है। तो फिर चलते हैं ऐसे ही माध्यम की ओर अर्थात् रामनगर की मास पर्यन्त रामलीला की ओर। ऐसी रामलीला, जिसके बारे में बहुत कुछ लिखा, सुना गया है, विशेषताएँ सर्वत्र व्याख्यायित हैं; इसे फिर एक नयी दृष्टि से देखने का प्रयास करते हैं। आखिर किस प्रकार से एक नाट्य मंचन का उपक्रम जीवनचर्या, (वह भी सैकड़ो-हजारों) की बन जाती है, दैनिक कार्यक्रम एवं क्रिया-कलाप को अनुशासित कर देता है।मन प्रसन्न है तो ठीक है पर यदि मन खिन्न है तो मन प्रसन्न होना चाहिए; किन्तु यह हो कैसे? इसके लिए मनोयोग होना चाहिए। किसी कार्य में मन रमने का बहाना या प्रेरणा होनी चाहिए और यदि ऐसा कार्य, धार्मिक निष्ठा से जुड़ा हो, भक्ति और उपासना से जुड़ा हो तब तो फिर सच्चिदानन्द की अनुभूति ही हो जाती है। तो फिर चलते हैं ऐसे ही माध्यम की ओर अर्थात् रामनगर की मास पर्यन्त रामलीला की ओर। ऐसी रामलीला, जिसके बारे में बहुत कुछ लिखा, सुना गया है, विशेषताएँ सर्वत्र व्याख्यायित हैं; इसे फिर एक नयी दृष्टि से देखने का प्रयास करते हैं। आखिर किस प्रकार से एक नाट्य मंचन का उपक्रम जीवनचर्या, (वह भी सैकड़ो-हजारों) की बन जाती है, दैनिक कार्यक्रम एवं क्रिया-कलाप को अनुशासित कर देता है। इन सबके मूल में लोगों की निष्ठा के साथ-साथ अपने अनोखे और सहज रूप में लीला दर्शन-श्रवण में मिलने वाला रस ही वह कारण है जिसके विधिवत् (रस) पान हेतु लोग लगन से तैयार होते हैं। कुछ ऐसे तुलना करके देखा जा सकता है कि एक ओर यदि आप किसी उत्सव या मनोरंजन के लिए तैयार होते हैं और एक लीला देखने के लिए। दोनों ही प्रकार के मनोभावों का अन्तर दन्तचित्त होने का परिणाम देता है। आप अच्छे वस्त्र, इत्र, सुगन्ध, रूप-सज्जा किसी अन्य उत्सव के लिए करते हैं तो भी एक अजीब से उहापोह में कि यह रंग कैसा लगेगा, इस डिजाइन का पहनूं कि उसको, चिन्ता भी रहती है कि कहीं खराब तो नहीं लगेगा, लोग क्या कहेंगे आदि-आदि। किन्तु इसके उलट लीला के लिए तैयार होते समय एक सुखद निश्चिन्तता रहती है। कोई ड्रेस कोड तो लीला के लिए बना नहीं है किन्तु इसकी पुरातनता ने ही कहीं न कहीं इसका निर्धारण कर दिया है। पहले जब पैण्ट-शर्ट नहीं था पाश्चात्य वस्त्रों का प्रचलन कम था ना के बराबर था और कुर्ता-पाजामा या धोती-कुर्ता सिर पे पगड़ी या साफा ही अपने यहाँ के पहनावे थे, तब से लेकर समय के और फैशन के बदलने के बावजूद यह देशी पहनावे, लीला देखने वालों खासकर नेमीजन के ड्रेस कोड बन चुके हैं। सुगंध, खुशबू के लिए वर्तमान के ‘डियो’ (क्मवकनतमदज) और ‘सेन्ट’ आज भी लीला में प्रयुक्त इत्र और खस के आगे त्याज्य हैं। जलपान के लिए भी आज के फास्ट फूड और ‘रोल’ कल्चर पर नेमीजन का पारम्परिक कचैड़ी, जलेबी, खीरमोहन, देशी घी के बने अनेकों खालिस देशी पकवान सदा ही भारी पड़ते हैं। ऊपर के सभी उपक्रम, अर्थशास्त्र की भाषा में उत्पादक और उपभोक्ता सभी को अनुशासित कर देते हैं। जैसे कि सायंकाल प्रारम्भ होने वाली लीला के लिए अनेक नेमीजन दोपहर से ही तैयारियों में लग जाते हैं। रामनगर से दूर-दराज विशेषकर गंगा पार-बनारस से आने वाले अपने काम-धन्धे को आधे दिन (12 बजे तक) समेटना शुरु कर देते हैं या दूसरे को जिम्मेदारी देकर खुद निवृत्त हो जाते हैं और इसके बाद पूरे मनोयोग से बचे समय को अपनी लीला की दिनचर्या में लगा देते हैं। ऐसे नेमीजन मास पर्यन्त दोपहर के बाद रामनगर पहुंुचना शुरू हो जाते हैं। रामबाग के पास (दुर्गा मन्दिर) के पोखरे पर नहा-धोकर शाम की लीला के लिए तैयार होने का काम बिना नागा पूरे महीने चलता है। नहा-धोकर अल्पाहार के रूप में भांग-बूटी, ठण्डई, मलाई आदि का सेवन करते हैं और फिर सम्बन्धित दिन की लीला जहाँ होनी होती है, वहाँ के लिए प्रस्थान करते हैं। यह ध्यान देने योग्य बात है कि इस तैयार होने में नेमीजन अपने कपड़े धोकर सुखने से लेकर बूटी और ठण्डई पीसने तक का काम खुद ही करते हैं। रात में लीला समाप्त होने पर नेमीजन अपने-अपने पसन्द की दुकानों पर अल्पाहार लेकर घर को प्रस्थान करते हैं और दूर-दराज के ये लोग देर रात तक घर पहुंचकर अपनी इस लीला की दिनचर्या को विराम देते हैं। फिर ये नेमीजन सुबह उठने के बाद और पुनः दोपहर में ही लीला के लिए निकल जाने के बीच अपने परिवार और कार्य के बीच कितना समय व्यतीत कर पाते होंगे, यह स्वतः ही समझ में आ जाता है। इसी तरह लीला के दौरान क्षेत्र के दुकानदार भी सामाग्री तैयार करने और दुकान लगाने अर्थात् अपनी तैयारी में उलझे रहते हैं। यह उलझन खिन्न करने वाली न होकर सन्तुष्टि और लाभ देने वाली होती है।इस तरह से यह स्पष्ट पता चलता है कि लीला में जो भी नेमीजन पूरे महीने एक रंगरूट की जीवनशैली में रहता है और हर क्षण जबान पर वजह के रूप में सिर्फ और सिर्फ ‘लीला’ ही होती है। नेमीजनों को अन्य कोई दुःख, कष्ट, चिंताए नहीं रहती है बस एक ‘करज’ रहता है। इस दौरान यह निष्ठा लोगों के जीवन को गजब के अनुशासन और लगाव से भर देती है और हर कोई ऐसी परिश्रम वाली जीवनचर्या बिताने के लिए आतुर सा रहता है क्योंकि इसे ‘लीला’ समाप्ति के बाद उन सभी नेमीजनों की अगली ‘लीला’ के इन्तजार की व्यग्रता, लालसा, उत्कण्ठा में खूब भली प्रकार से देखा जा सकता है। रामलीला की इन्हीं विशिष्ट लीला प्रेमियों में से प्रस्तुत है कुछ लीला प्रेमियों का संक्षिप्त परिचय एवं रामलीला के दौरान की जीवनशैली-

श्री अप्रमेया प्रसाद सिंह – रामलीला में नेमियों का अपना अलग ही महत्व है। रामलीला के दौरान प्रसंगों के मंचन में महाराज के सबसे नजदीक हाथी के पास खड़े अप्रमेया प्रसाद सिंह सहज ही लीला प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहते हैं। एपी सिंह के पूर्वज रामनगर महाराज के बेहद करीबी रहे हैं। एपी सिंह बताते हैं कि राजपरिवार से हमारा संबंध राजा बलवंत सिंह के समय से है, जो महीपनारायण सिंह के समय भाई-भतीजे के रिश्ते में कायम रहा है। बताया कि ‘आज भी हमारे परिवार को राजपरिवार की तरह किले से रामलीला देखने के लिए हाथी मिलता है जिस पर मेरे बड़े भाई ज्योत्सना प्रसाद सिंह उर्फ ज्योति बाबू बैठते हैं।’ हालांकि एपी सिंह खुद कभी हाथी पर बैठकर लीला नहीं देखे। उनका मानना है कि भगवान राम पैदल वनगमन करते हैं। इसलिए हाथी पर बैठकर लीला देखना उचित नहीं है। आपने बताया कि ‘‘रामलीला में हाथी और हौदे का भी बहुत महत्व है। हौदे से ही ओहदे की पहचान होती है। हमारे परिवार को हाथी पर बैठने के लिए नीमखासा हौदा मिलता है।’’

लखन लाल जौहरी- रामनगर की रामलीला में महाराज के हाथी के पास रामायणी दल के ठीक बगल में हाथ में शेर के मुंह वाली आकृति की चांदी के मुठिया वाली छड़ी और ठेठ बनारसी वस्त्र (गंजी धोती) पहने मुंह में सुगन्धित बनारसी पान दबाये और इत्र की खुशबू बिखेरते लखन लाल जौहरी को स्वतः ही देखा जा सकता है। हाथ में रामायण का गुटका लिये चैपाई दर चैपाई रामायणी दल के साथ रामायण पाठ करते देख वह सहज ही लोगों को आकर्षित करते हैं। रामलीला में अपने लगाव और आने के बारे में बताया कि सन् 1962 से वह रामलीला में लगातार आ रहे हैं। सितम्बर माह 71 वर्ष के हुये लखन लाल जौहरी ने अपनी निरंतरता का श्रेय भगवान श्रीराम के प्रति अगाध श्रद्धा को दिया। दादा चुन्नी लाल हीरा तराश से मिली प्रेरणा और बड़े पिता सीताराम जौहरी और रामशरण जौहरी के विरासत को सम्भालना लखन लाल जौहरी परम सौभाग्य की बात मानते हैं। रामलीला में आने के लिए प्रत्येक वर्ष लखन लाल एक माह के लिए भोपाल और हैदराबाद में स्थापित हीरे और आभूषण के अपने कारोबार को छोड़ काशी में ही रहते हैं। रामलीला में आने के लिए प्रतिदिन की तैयारी के सम्बन्ध में बताया कि 12 बजे दिन से ही रामनगर चलने की तैयारी शुरू कर देते हैं जिसमें धोती, गंजी, साफा बनाना, पान का डिब्बा, इत्र की शीशी तैयार करना और नहा धोकर ठंडई छानकर 4ः30 बजे तक लीला स्थल पर पहुंच जाते हैं। पुत्र विशाल जौहरी उर्फ बोबू भी अपने इस परिवार की परम्परा को पिता के साथ निभाना आरम्भ कर दिये हैं। पिछले 15 वर्षों से वह भी रामलीला में नियमित आ रहे हंै।

श्री फूलचन्द यादव– रामनगर की रामलीला जितनी विशिष्ट है उतने ही विशिष्ट है उसमें लीला प्रेमी प्रभु के प्रति श्रद्धा व्यक्त  करने  के  लिए  इनके अलग-अलग माध्यम हैं। इन्हीं में से एक हंै फुलचन्द यादव। बनारस के बीबी हटिया मोहल्ले में रहने वाले फुलचन्द रामनगर की रामलीला में दौड़कर जाते हैं और दौड़कर ही वापस आते हैं। जाने वाले और न जाने वाले सभी के लिए उत्सकुता का केन्द्र बनने वाले फुलचन्द यादव को राह में लोग अपने साथ बैठाकर या साधनों द्वारा ले जाने के लिए कहते भी हैं तो ये उन्हें मना कर देते हैं। अपने इस अनोखे समर्पण और रामलीला में आने की शुरूआत के सम्बन्ध में फुलचन्द ने बताया कि बचपन में कक्षा 2 की किताब में ‘सीता की खोज’ कहानी पढ़ी और फिर दादा नानक सरदार के साथ रामलीला आना शुरू हुआ पहले नाव से दादा जी के साथ आते थे फिर साईकिल से आना शुरू हुआ। दौड़कर आने व पैदल आने की शुरूआत एक घटना से हुई जब 1973-74 तक यह कुछ लोगों के साथ आते थे। इस बीच एक बार रामजन्म की आरती छूट गई। आरती छूटने का दुःख इतना ज्यादा हुआ कि उसी दिन तय कर लिया कि अब किसी का साथ नहीं लेंगे और अकेले ही जायेंगे। रामलीला के दौरान 12 बजे दोपहर में घर से निकल जाते हैं और 1ः30 बजे तक रामनगर दुर्गा जी पोखरा पर पहुंचना होता है। जहां दुपट्टा, धोती धोकर सुखने के लिए फैला दिया जाता है और फिर शुरू होता है नहाने, निपटने और ठंडई पीने का क्रम इन सभी कार्यों से निवृत्त हो 4ः30 बजे तक लीला स्थल पर पहुंचना होता है। अपनी धुन के इतने पक्के की आरती समाप्त होना, रामायण बन्द होना, स्वरूपों का माला उतरना, हाथी का घुमना और फुलचन्द जी का वापस घर की तरफ चल देना लगभग एक साथ होता है। फुलचन्द ने बताया कि पहले यह दूरी 25 से 30 मिनट में तय करते थे पर अब अवस्था के कारण 40 मिनट तक समय लग जाता है। महीने भर की अपनी इस दिनचर्या के लिए फुलचन्द ने बताया कि खान-पान ठंडई पर 10 हजार रूपये से अधिक खर्च हो जाते हैं। वर्तमान में 63 साल के फुलचन्द की इस ऊर्जा और आस्था के लिए उन्हें सम्मानित भी किया जा चुका है। पिछले वर्ष 24 नवम्बर को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में राजकुमारी जी द्वारा बुलाये जाने पर कुलपति ने सम्मानित किया था। फुलचन्द ने अपने यादगार दिन के बारे में बताया कि एक बार काशी नरेश विभूति नारायण सिंह से उनकी मुलाकात पंचगंगा घाट पर हुई थी। जहां महाराज ने अपनी माला उतारकर उनके गले में पहना दी थी और कहा कि ‘रामनगर आना मत छोड़ना’।

रामलीला के शोधक- काष्ठ जिह्वा स्वामी

रामनगर की रामलीला विश्व भर में काशी की पहचान बन गयी है। इस अद्भुत लीला का मंचन सदियों से आम जनमानस के हृदय में बसा हुआ है। शायद ही ऐसा कोई और मंचन इतना दीर्घजीवी रहा हो वह भी निरंतर अपने मूल रूप में। ‘‘चुप रहो’ सावधान‘‘ की एक आवाज कई हजार भीड़ को आज भी इस लीला में नियंत्रित करती है। कृत्रिमता आज भी इस अद्भुत  लीला से दूर है। न तो यहां पात्रों के संवाद के दौरान ध्वनि विस्तारक का प्रयोग होता है और न ही रोशनी के लिए बिजली का इस्तेमाल होता है। लेकिन एक ऐसा पक्ष भी है जो शायद कम ही लोगों को पता है। रामलीला के दौरान बोले जाने वाले संवाद नेमी-प्रेमी के दिलों में उतर जाते हैं। कुछ संवाद तो इतने प्रचलित हैं जो बहुतायत की जुबां पर रहते हैं। बेहद सरल, मार्मिक इन संवादों को संजोया है- रामलीला के संशोधक विद्वान संत काष्ठ जिह्वा स्वामी ने। इनके द्वारा पिरोये गये शब्दों की माला रामलीला के संवादों के रूप में परिणित हुई। साल दर साल ये संवाद पात्रों की जुबां से लोगों के हृदय में उतरते रहे हैं और श्रद्धा की ऐसी मिसाल बन गये जो जनमानस के अन्तर्मन से जुड़ चुकी हैं।

योगी, विद्वान, दार्शनिक, लेखक जैसे परिचयों से परिपूर्ण काष्ठ जिह्वा स्वामी विशुद्धानंद जी के समकालीन माने जाते हैं। माना जाता है कि काष्ठजिह्वा स्वामी की प्रेरणा से ही विशुद्धानंद ने सन्यास ग्रहण किया था। इसी वजह से विशुद्धानंद इनको अपना गुरू मानते थे। काशी के एक और संत महादेव श्रमजी थे। काष्ठ जिह्वा स्वामी के निकटस्थ रहे। कहा जाता है कि दोनों संत जब मिलते तो सहज ही शास्त्रार्थ करते और उसी को अपने मनोरंजन का आधार बनाते। काष्ठ जिह्वा स्वामी के प्रारम्भिक जीवन का प्रामाणिक साक्ष्य तो नहीं मिलता है। हालांकि उनके ऊपर अध्ययन करने वाले कुछ विद्वानों का मानना है कि वे फतेहपुर जिले में कानपुर के पास असनी गांव के रहने वाले थे।

माना जाता है कि असनी गांव में एक शिव मंदिर की स्थापना स्वामी जी ने ही की है। तथ्यों को माना जाये तो स्वामी जी कान्यकुब्ज त्रिपाठी ब्राह्मण थे। माना जाता है कि काशी का आकर्षण स्वामी जी को असनी से यहां खींच लाया। यहां आने पर स्वामी जी ककरमत्ता में रूके थे। रामनगर के कुछ लोग मानते हैं कि स्वामी जी ककरमत्ते के ही निवासी थे। हालांकि इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता है। शिक्षा-दीक्षा की बात की जाय तो काष्ठ जिह्वा स्वामी की औपचारिक शिक्षा के बारे में कोई प्रमाण नहीं मिलता है। लेकिन उनका हिन्दी, संस्कृत, मराठी, उर्दू में ज्ञान अद्भुत था। उन्होंने न केवल मराठी में ‘रेखता संग्रह’ लिखा बल्कि उर्दू में उनकी रचना ‘दिल्ली बिन्दु’ उच्चकोटि की थी। इन्हें तन्त्र शास्त्र का भी अच्छा ज्ञान था।

कैसे पड़ा काष्ठ जिह्वा नाम – स्वामी जी का व्यक्तित्व विराट था। वे न केवल बड़े विद्वान थे बल्कि उच्चकोटि के साधक भी थे। सरल हृदय और सन्त स्वभाव स्वामी जी के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खासियत थी। माना जाता है कि एक बार उनके मुंह से कोई अप्रिय बात निकल गयी। जिससे वे इतने दुःखी हुए की फिर कभी नहीं बोलने की प्रतिज्ञा कर अपनी जीभ पर काठ (लकड़ी) की खोल चढ़ा ली। इनके नाम को लेकर और भी कई जनश्रुतियां प्रचलित हैं।

चांडाल को भी झुक कर करते थे प्रणाम। काष्ठ जिह्वा स्वामी विद्वान तो थे ही, शास्त्रार्थ भी करते थे। एक बार किसी विषय पर शास्त्रार्थ के दौरान किसी पण्डित का उनसे अपमान हो गया। उस अपमान से वह पण्डित इतनी पीड़ा से ग्रसित हो गये कि कुछ ही दिनों में उनकी मृत्यु हो गई। यह सुनकर स्वामी जी को अपार कष्ट हुआ और उन्होंने फिर कभी इस तरह के वाद-विवाद न करने का प्रण लिया। साथ ही इस घटना के बाद जब वे सुबह उठते थे तो सामने चांडाल भी होता तो उसका वे झुककर प्रणाम करते।

ऐसे हुआ रामनगर व रामलीला से जुड़ाव – काष्ठ जिह्वा स्वामी की मेधा शक्ति अद्भुत थी इन तमाम गुणों का बखान जब काशी नरेश महाराज ईश्वरी नारायण सिंह को हुआ तो उन्होंने इनसे मिलकर अपना गुरू बना लिया। इस तरह काष्ठ जिह्वा स्वामी का रामनगर के किले में प्रवेश हुआ। उस समय रामनगर में रामलीला शुरू हो चुकी थी लेकिन अव्यवस्थित रूप में थी। रामलीला को व्यवस्थित कलेवर देने के लिए महाराज ईश्वरीनारायण सिंह ने भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, रीवां नरेश रघुराज सिंह और काष्ठजिह्वा स्वामी का सहयोग लिया। रामलीला को सजीव रूप देने के लिए तीनों विद्वानों ने लीला स्थल और उसके मंचन का वैज्ञानिक ढंग से निर्धारण किया। भारतेन्दु जी ने लीला के प्रदर्शन पर काम किया तो काष्ठजिह्वा स्वामी और रीवां नरेश ने लीला के अंशों तथा संवादों को गढ़ा। आज भी काष्ठजिह्वा स्वामी की रामलीला अभिनय के लिए तैयार की हुई पुस्तक रामनगर दुर्ग में सुरक्षित है। कहा जाता है कि रामनगर की रामलीला में स्वामी जी हाथी पर बैठकर उसे देखने आते थे।

रामनगर की रामलीला के स्थल

एक मंच पर होने वाले घटना क्रम को नाटक की संज्ञा दी जाती है और रामनगर की रामलीला का मंचन स्थल रामनगर किले से लेकर 4 किमी0 दूर लंका तक फैला हुआ है। जगह-जगह पर अयोध्या, जनकपुर, पंचवटी, लंका, चित्रकूट, निषादराज आश्रम, अशोक वाटिका, सनक- सनन्दन रामबाग आदि स्थान हैं जहाँ रामचरित मानस में वर्णित घटनाक्रम के अनुसार लीलायें सम्पादित की जाती हैं। इन स्थलों की थोड़ी जानकारी यहाँ दे देना उपयुक्त होगा।

लगभग दो सौ सालों से स्थापित परम्पराओं में रंचमात्र भी परिवर्तन नहीं हुआ है। पात्रों की मौलिक वेशभूषा संवाद अदायगी आदि सब कुछ परिवर्तन विहीन है। कुछ लोग यह आक्षेप लगाते हैं कि रामनगर की श्रीरामलीला मीलों की दूरी में चक्कर काटते हुए अनेक स्थानों में घूम-घूम कर होती है अतः दर्शकों को बड़ा कष्ट होता है इसलिए यदि यह एक जगह एक मंच पर हो और बैठने के लिए कुर्सियों की व्यवस्था हो तो लीला प्रेमियों को सुख मिलेगा। लेकिन यहाँ यह कहना समीचीन होगा कि रामनगर के नित्य लीला प्रेमी दर्शक ‘देवी भूत्वा देवं अजेत’ की भावना से ओतप्रोत होकर भगवान के दर्शन आराधना के लिए पहुंचते हैं। देवताओं और पूज्य जनों के समक्ष ऊँचे स्थान पर बैठना शास्त्र निषिद्ध है इसलिए कुर्सी की व्यवस्था नहीं की जाती।

        एक मंच पर होने वाले घटना क्रम को नाटक की संज्ञा दी जाती है और रामनगर की रामलीला का मंचन स्थल रामनगर से लेकर 4 किमी0 दूर लंका तक फैला हुआ है। जगह-जगह पर अयोध्या, जनकपुर, पंचवटी, लंका, चित्रकूट, निषादराज आश्रम, अशोक वाटिका, सनक सनंदन रामबाग नामक आदि स्थान हैं जहाँ रामचरित मानस में वर्णित घटनाक्रम के अनुसार लीलायें मंचित की जाती है। इन स्थलों की थोड़ी जानकारी यहाँ दे देना उपयुक्त होगा।

        रामनगर की रामलीला के स्थलों के बारे में यह भी जान लें कि इसके सभी स्थल शोधित किये गये हैं रामलीला के सभी स्थलों का शोधन एक सप्तर्षि विद्वत मंडल ने किया था जिसमें महादेवाश्रम गायघाट के स्वामीजी, काष्ठजिह्वा स्वामी, तुलसीदत्त झाॅ, पं0 मथुरानाथ, महाराजा ईश्वरी प्रसाद नारायण सिंह, बाबू हरिहर सिंह, उमराव पण्डित आदि प्रमुख थे।

रामनगर की समस्त लीलामय भूमि जिन्हें वर्तमान में भी उन्हीं नामों से जाना जाता है भिन्न-भिन्न लीला के लिए अलग-अलग स्थान दिशा का ध्यान रखते हुए बनाये गये हैं। यथा अयोध्या से पूर्वोत्तर जनकपुर एवं विश्वामित्र का स्थान, लंका, पम्पासर दक्षिण में है सो रामनगर में भी यह स्थान इन्हीं दिशाओं में बने हैं। लंका की रणभूमि से हनुमान जी संजीवनी लेने उत्तर हिमालय जाते हैं। वैसे ही रामनगर की रामलीला में भी इस प्रसंग में हनुमान जी उत्तर दिशा में अशोक वाटिका जहां माता सीता रावण द्वारा हरण के बाद रहती हैं। एक सुन्दर बाग है और जिस मन्दिर के नीचे सीता जी हनुमान जी का संवाद सुनती हैं उसके दोनों तरफ अशोक के वृक्ष लगे हुए हैं। रामनगर की रामलीला में प्रथम दिवस बैकुण्ठ का स्थान ऊपर और क्षीरसागर पृथ्वी पर तालाब में स्थित है। इसी प्रकार दोनों का भाव यहां की लीला में होता है। इसके अतिरिक्त रामायण में आये हुए तमाम स्थान गिरिजा मन्दिर, जनकपुर, निषाद आश्रम, भारद्वाज आश्रम, नन्दी ग्राम, सबरी का स्थान, पंचवटी, पम्पासर, प्रवर्षण गिरी, चित्रकूट, सुबेरगिरी, लंका आदि स्थान बने हुए हैं।

रामनगर की रामलीला में रामायण के प्रसंग के अनुसार ही स्वरूपों का प्रशिक्षण तथा श्रृंगार का स्थल भी अलग-अलग निर्धारित है। यथा जब तक प्रभु श्रीराम अयोध्या में रहते हैं, (वनगमन के पूर्व तथा भरत मिलाप के लीला के बाद तक) प्रशिक्षण एवं श्रंृगार स्थल गंगा नदी के किनारे बलुआ घाट स्थित धर्मशाला में होता है। वनगमन के पश्चात् तथा पंचवटी निवास तक प्रशिक्षण एवं श्रृंगार रामबाग में होता है तथा लंका पर मंचन होने वाले और भरत मिलाप के पूर्व तक

 के प्रसंग में श्रृंगार एवं प्रशिक्षण लंका मैदान के पास अशोक वाटिका में स्थित भवन में सम्पन्न होते हैं। रामनगर की रामलीला के स्थलों में मूर्त और अमूर्त कई स्थल हैं जिनको संख्या में नहीं बांधा जा सकता परंतु यह एक छोटा प्रयास है रामनगर की रामलीला के स्थलों का परिचय देने में। जिसमें इन स्थलों को दो भागों प्रमुख स्थल और उप स्थल में बांटा गया है जिनमें प्रमुख हैं-

धर्मशाला (बलुआ घाट) – यह धर्मशाला रामनगर बलुआ घाट पर स्थित है। चतुर्भुजाकार परिक्षेत्र में स्थित इस धर्मशाला में छोटे कमरेबने हैं तथा धर्मशाला की छत पर एक शिव मंदिर स्थापित है। धर्मशाला में दो बड़े गलियारे तथा एक बड़ा आंगन भी है। धर्मशाला में ही रामलीला के पंच स्वरूपों का लीला आरम्भ से एक माह पूर्व का प्रशिक्षण सत्र एवं लीला मंचन के दौरान अयोध्या में होने वाले सभी प्रसंग के लिये प्रशिक्षण एवं श्रृंगार का कार्य होता है। इसी धर्मशाला में रामलीला के पंच स्वरूपों के व्यास श्री रघुनाथ दत्त सपरिवार रहते भी हैं।

चैक स्थित पक्की-  यह स्थल रामनगर की रामलीला में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। पक्की पर यूं तो रामलीला के किसी भी प्रसंग का मंचन नहीं होता परंतु रामलीला की विधिवत शुरूआत इसी स्थान से होती है। पक्की पर ही रामलीला का प्रथम एवं द्वितीय गणेश पूजन तथा पंचस्वरूपों का पूजन होता है। साथ ही रामलीला के प्रारंभ में मानस के बालकाण्ड  के  आदि मंगलाचरणम् ‘‘वर्णानाम् अर्थ संघानाम’’ प्रसंग प्रारम्भ होने से पूर्व रामचरितमानस के 175वें दोहे-

भरद्वाज सुनु जाहि जब, होहि विधाता बाम।

धूरि मेरु सम जनक जम, ताहि ब्याल सम दाम।। तक का

 

 पाठ होता है। यह स्थल रामनगर चैराहे पर स्थित है जिस पर चतुष्कोण में फैले विस्तृत दालान एवं परिस्कृत भूभाग में प्रथम एवं द्वितीय गणेश पूजन सम्पन्न होता है साथ ही लीला के पंचस्वरूपों के अतिरिक्त अन्य पात्र इसी स्थल पर तैयार होकर लीला स्थल पर जाते हैं। लीला से सम्बन्धित सभी वस्त्र और सामान इसी पक्की पर बड़े-बड़े लकड़ी के बक्सों में रखे रहते हैं।

अयोध्या- इन स्थलों में सबसे प्रमुख अयोध्याजी रामनगर किले से 100 मीटर पूर्व में है। यहाँ रामजन्म से लेकर वनागमन तक फिर उसके बाद भरत मिलाप से लेकर राज्याभिषेक तक की महत्वपूर्ण लीलायें होती है।

यह श्रीराम के गृहनगर रूप में अवस्थित है। यह तीन ओर से लगभग 12 फुट ऊँची मोटी चाहरदीवारी से घिरा हुआ है जिसके भीतर कमरे बने हुए थे। अयोध्या के प्रवेश द्वार के दायी और बायीं तरफ बने कमरे जीर्णशीर्ण होने के कारण अब गिरा दिये गये हैं। वर्तमान में मुख्य द्वार के सामने बने कमरे ही अस्तित्व में हैं जिनके छत के ऊपर पिलर ढालकर अयोध्या के राजमहल का रूप दिया गया है। लीला के आरम्भ काल से ही इन खम्भों के ऊपर तम्बू डालकर छत का रूप दिया जाता रहा है। इस भवन को प्रखण्डों में बाँटा गया है।

निम्न प्रखण्ड-

        जहाँ अयोध्या के नागरिक बैठते हैं।

द्वितीय प्रखण्ड-

        इसमें सिंहासन और छत्र लगा हुआ है। इसी में एक ओर श्रृंगी ऋषि की यज्ञशाला भी है तथा प्रवेश द्वार के दायीं ओर गुरु वशिष्ठ जी के बैठने का स्थल बना हुआ है।

तृतीय खण्ड-

        यह सबसे उच्च प्रखण्ड है जहाँ श्रीराम और उनके परिवार के लोग रहते हैं। इसके अगल-बगल की छतों पर दर्शक यानी अयोध्या के नागरिक रहते हैं।

        जब विश्वामित्र मुनि यज्ञ की रक्षा के लिए श्रीराम लक्ष्मण को दशरथ से मांग कर ले जाते हैं तो लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल के ठीक पीछे ताड़का-सुबाहु बध और फिर आगे स्थित एक सीवान में अहिल्यातरण की लीला सम्पन्न होती है।

        इसके बाद जंगली रास्तों से होते हुए लीला जनकपुर पहुँचती है जो माता सीता का गृहनगर है। यह स्थल पी0ए0सी0 के उत्तरी भाग की ओर स्थित है। इसमें भी धनुष यज्ञ, फुलवारी की लीला, रामबारात आगमन, विवाह और विदाई की लीलाएँ होती है। यहाँ भी राजा जनक का दरबार अलग, धनुषयज्ञ स्थल अलग और विश्वामित्र मुनि के ठहरने का स्थान अलग-अलग है।

जनकपुर- यह माता सीता जी का गृह नगर है। यह स्थल जनकपुर के नाम से प्रसिद्ध है जो पी0ए0सी0 छावनी के उत्तरी भाग की ओर स्थित है।

 यहां श्रीराम-सीता जी के कोहबर की सम्पन्न झांकी का एक मन्दिर है। यह मन्दिर लगभग 100 वर्ष पुराना है जो चुनार के बलुआ पत्थरों से निर्मित खम्भों पर बना स्थापत्य की अद्भुत कृति है।

        जनकपुर मन्दिर के प्रांगण में ही धनुषयज्ञ शाला बना है जिस पर धनुष तोड़ने के प्रसंग का मंचन होता है। वहीं प्रांगण के मध्य में विवाह स्थल के लिए एक मंच बना है जिस पर श्री सीता-राम विवाह का प्रसंग सम्पन्न होता है। प्रांगण में ही दक्षिणी छोर पर सीढ़ियों से चढ़कर जाना होता है वहां धनुष यज्ञ के लीला की आरती होती है।

गिरिजा मन्दिर (उपस्थल):- यह रामनगर स्थित 36वीं वाहिनी पी0ए0सी0 के परिसर में स्थित है। जिसमें गिरिजा जी की सफेद संगमरमर की प्रतिमा है। इसी मन्दिर में रामलीला के चैथे दिवस फुलवारी व गिरिजा पूजन के प्रसंग का मंचन होता है।

चित्रकूट- यह स्थल रामबाग पोखरे के पश्चिमी किनारे की भूमि पर बना है। यहां श्रीराम का निवास कई दिनों तक रहने से इस स्थल का महत्व बढ़ जाता है। चित्रकूट वनगमन के मध्य अस्थायी निवास हेतु एक कुटिया का प्रतीक है। स्थायी रूप से सीमेंट से बने इस चबूतरे पर चार खंभे भी बने हैं जिन्हें लीला मंचन के दौरान एक सफेद तंबू से ढक दिया जाता है। इसे रमणीय एवं कलात्मक तरीके से सजाने के लिए वस्त्र, बांस और पत्ते आदि का प्रयोग हुआ है। इस स्थल में कई प्रखण्ड हैं। एक प्रखण्ड में महाराज हाथी पर सवार हैं, रामायणीगण उनके समक्ष बैठे पाठ सुनाते हैं। यह भाग सिंहासन और दुर्गा मंदिर (पोखरे से पूर्वी ओर) से जुड़ा दिखायी पड़ता है। द्वितीय प्रखण्ड मंे अशोक की पत्तियों द्वारा अक्षाकार ढंग से सजायी गयी छोटी-छोटी पहाड़ियां हैं। यह स्थल रामलीला प्रेमियों में वास्तविक चित्रकूट (उ0प्र0) के तरह ही प्रसिद्ध व श्रद्धा का केन्द्र है।

चित्रकूट से विदाई के पश्चात् भरत व शत्रुघ्न के स्वरूपों द्वारा इस स्थल की परिक्रमा की जाती है जिसमें रामलीला में पधारे नेमी व श्रद्धालुगण भी परिक्रमा करते हैं। अनुश्रुतियों के अनुसार स्वामी करपात्री जी महाराज जब भी रामनगर रामलीला के स्थलों से होकर गुजरते थे, तो लंका को छोड़कर सभी स्थलों को छूकर प्रणाम करते थे।

उपस्थल– चित्रकूट से विदाई के पश्चात श्रीराम जब पंचवटी की तरफ जाते हैं तो मार्ग में श्री रामचरित मानस में वर्णित प्रसंगों के अनुसार अत्रि, सुतीक्षण, श्रृंगी व भारद्वाज, वाल्मीकि मुनि से मिलते हैं। ये सभी स्थल रामबाग पोखरे से पंचवटी के मार्ग पर छोटे-छोटे चबूतरे के रूप में स्थित हैं।

पंचवटी- यह स्थान रामनगर चैराहे से पूर्व की ओर जाने वाली सड़क (लगभग 2 किमी की दूरी) पर है। यह एक बड़ा मैदान है जो एक सम्पर्क मार्ग (रामनगर-मुगलसराय) द्वारा दो भागों में बंटा है। मार्ग के बायें तरफ स्थित मैदान दो प्रखण्डों में बंटा है। उच्च प्रखण्ड में एक सुन्दर कुटिया बनी है, जहां श्रीराम सीता विराजते हैं तथा निम्न प्रखण्ड पर लक्ष्मण जी रहते हैं। नक्कटैया की लीला में यह स्थल रणक्षेत्र के रूप में प्रयुक्त होता है।

उपस्थल- शबरी फल, जटायु अन्त्योष्टि, सीता हरण।

पम्पासर- यह स्थल भीटी गांव के उत्तर में स्थित तालाब है। पम्पासर के पास ही दाहिनी तरफ सीमेंट के बने चबूतरे पर ऋष्यमूक पर्वत बना है जिस पर राम-सुग्रीव मिलाप के प्रसंग का मंचन होता है। वहीं तालाब के बायीं ओर पर्वत बना है जहां एक सुन्दर कुटिया बनी है। जिस पर श्रीराम- लक्ष्मण विराजते हैं। इस स्थल पर वर्षा वर्णन के प्रसंग का मंचन होता है। साथ ही दो दिन आरती होती है।

बालिवध स्थल- रामनगर चैराहे से करीब 3 किमी दूर पंचवटी से औद्योगिक क्षेत्र की ओर जाने वाली सड़क के दाहिनी ओर बड़े मैदान तम्बू व लकड़ी के मंच द्वारा बालि का महल तैयार किया जाता है।

लंका- यह राजा रावण की नगरी है यह स्थान रामनगर चैराहे से 3.5 किमी पर पंचवटी से औद्योगिक क्षेत्र की ओर जाने वाली सड़क के दक्षिण ओर है यहां उपस्थलों में रामेश्वरम्, समुद्र, अशोक वाटिका, सुवेरगिरी पर्वत, कचहरी, रणभूमि, रावण का महल तथा लंका से उत्तर में थोड़ी दूरी पर हिमालय पर्वत है। (चबूतरे के रूप में प्रतीकात्मक रूप से अवस्थित है)

रामलीला से सम्बन्धित तिथियाँ और समय

रामनगर की श्रीरामलीला का शुभारंभ सौर-पंचांग के आधार पर भाद्र पद मास के शुक्ल पक्ष में चतुर्दशी तिथि को (बहुतायत सितम्बर महीने में) होता है। यह रामलीला आश्विन मास के कृष्ण और शुक्ल पक्ष तक अनवरत चलती रहती है। इसी तरह द्वितीय पूर्णिमा को जब श्री रामलीला अपनी समाप्ति पर पहुंच चुकी होती है तब काशी नरेश एवं उनका परिवार सार्वजनिक रूप से अपने रामनगर दुर्ग में पचस्वरूपों का पूजन कर उनकी विदाई करते हैं। श्री रामलीला के प्रारम्भ के संदर्भ में महाराज ईश्वरी प्रसाद नारायण सिंह के समय बनी समिति द्वारा काशी, अयोध्या और मिथिला के रामायण के बड़े-बड़े विद्वान, पण्डित और महात्माओं से रामचरितमानस का शोधन कराया गया ‘जिसमें श्रीरामलीला का प्रारम्भ किस दिन से हो, किस स्थान से कितने दिनों तक और कौन-कौन सी लीलायें हों, इन सबकी व्यवस्था उसी समय उपर्युक्त महानुभावों की उपस्थिति में हुई; जो अब तक नाम मात्र के हेर-फेर के साथ वैसी ही चली आ रही है।

        वास्तविक रूप में इस धार्मिक कृत्य श्रीरामलीला के अभिनय और सम्पादन में समय की तुलना में इस लीला की तैयारी तथा समाप्ति बहुत हद तक लम्बी चलती है। श्रीरामलीला का शुभारम्भ गणेश-पूजन से होता है। लगभग दो मास पूर्व से ही श्रीरामलीला के पात्रों का प्रशिक्षण का कार्य प्रारम्भ हो जाता है। सर्वप्रथम पंच स्वरूपों के चयन हेतु पांच बालकों को (जो ब्राह्मण जाति के यज्ञोपवीतधारी होते हैं) बुलाया जाता है। उन स्वरूपों को ईश्वर के साकार रूप में आदर दिया जाता है। एक पूजा-समारोह में उन स्वरूपों को मुकुट लगाकर उनकी अर्चना की जाती है। इसके अतिरिक्त व्यास-पूजा, मुखौटे, श्रीरामचरितमानस, संवादों की पुस्तिकाओं की पूजा, बढ़ई के हथौड़े, दर्जी की कैंची, रंग-साज के ब्रश और लीला के अन्य आवश्यक सामानों की पूजा और अर्चना की जाती है।

प्रथम गणेश पूजा- सर्वप्रथम श्रीरामलीला का शुभारम्भ श्रावण मास के कृष्ण पक्ष में गणेश चतुर्थी को हो जाता है। इस दिन हनुमान और गणेश के मुखौटे को नये पीढ़े पर रखकर, उसके एक बगल ब्रश, बँसुला, कैंची (श्रीरामलीला में काम आने वाले औज़ार) आदि तथा दूसरी ओर श्रीरामलीला 

 

की पोथी (लाल रंग के वस्त्र में बँधी) रखी रहती है। एक संक्षिप्त समारोह में, जिसमें नगर के गण्यमान नागरिकों, मेलाधिकारी (महाराज के प्रतिनिधि) एवं अन्य राजकर्मचारियों की उपस्थिति रहती है; लीला के सकुशल सम्पन्नता हेतु संकल्प किया जाता है। समारोह के मण्डप में उत्तरी भाग में श्रीरघुनाथदत्त एवं सम्पतरामजी पंच स्वरूपों के साथ विराजमान रहते हैं। श्रीलक्ष्मीनारायण पाण्डेय व्यास एवं श्रीरामनारायण पाण्डेय जी पूजन एवं स्तुति तथा अर्चन आदि क्रियाएँ मेलाधिकारी के कर कमलों से सम्पन्न कराते हैं। पोथी, गणेश एवं श्री हनुमान के मुखौटे पर माला-फूल चढ़ाया जाता है। पंच स्वरूपों को तिलक लगाकर पुष्प माला पहनायी जाती है।, ब्रह्मा

जी का एक सम्वाद – ‘‘ऐ पुत्र! तुम मन इच्छित वर माँगो…’’ होता है जिसका तात्पर्य है कि पोथी पढ़ने का शुभारम्भ हो गया। अन्त में पोथी एवं गणेश-हनुमान के मुखौटे की आरती की जाती है, जिसमें सभी उपस्थित लोग खड़े होकर आदर व्यक्त करते हैं। तत्पश्चात् महाराज की ओर से प्रसाद का वितरण एवं ब्राह्मणों को दक्षिणा भी प्रदान की जाती है।

द्वितीय गणेश पूजा- पुनः भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी को विराट श्रीगणेश की मूर्ति के अतिरिक्त श्रीरामचरितमानस की पूजा एवं संकल्प किया जाता है। इस दिन से अगले दस दिन तक श्री मानस के बालकाण्ड प्रारम्भ से लेकर 175 दोहे तक श्रीरामजी पाण्डेय प्रधान रामायणी की 

अध्यक्षता में झांझ मृदंग के साथ पाठ सम्पन्न होता है। इनके साथ कुल 12 रामायणी एवं एक मृदंग बजाने वाला व्यक्ति रहता है। यह पाठ पक्की चैक पर (8 से 9.30 बजे) तक होता है।

        रामनगर की श्रीरामलीला के प्रबन्ध हेतु एक श्रीरामलीला अधिकारी की नियुक्ति की जाती है जो महाराज के बाद श्रीरामलीला सम्बन्धी मामलों का सर्वोच्च अधिकारी होता है। महाराज श्रीरामलीला करने का संकल्प करते हैं। इस संकल्प का उद्देश्य श्रीरामलीला के अभिनय से राजा, प्रजा तथा देखने, सुनने वाले और कार्यकर्ताओं का कल्याण होना है। इस पूजा और संकल्प के बाद लीला के मुख्य पात्रों का पूर्वाभ्यास तथा सहायक पात्रों एवं कार्यकर्ताओं द्वारा तैयारी आरम्भ की जाती है।

        अभ्यास का समय श्रीरामलीला-अभिनय के सम्पादन≤ में नहीं जोड़ा जाता है।

श्रीरामचरितमानस पाठ के प्रारंभिक दस दिन-

(1)     बालकाण्ड के प्रारम्भ से 7 वें दोहे तक (कृपा करहु अब सर्ब)।

(2)     बालकाण्ड के 8 वें दोहे की प्रथम चैपाई से 20 वें दोहे तक (बिराजत दोउ)।

(3)     बालकाण्ड के 21 वें दोहे की प्रथम चैपाई से 40 वें दोहे तक (मधुकर बारि बिहंग)।

(4)     बालकाण्ड के 41 वें दोहे की प्रथम चैपाई से 60 वें दोहे तक (जे पावत मख भाग)।

(5)     बालकाण्ड के 61 वें दोहे की प्रथम चैपाई से 80 वें दोहे तक (तेहि तिही सन काम)।

(6)     बालकाण्ड के 81 वें दोहे की प्रथम चैपाई से 101 वें दोहे तक (होइ प्रसन्न बरु देहु)।

(7)     बालकाण्ड के 101 वें दोहे की प्रथम चैपाई से 120 (घ) सोरठा तक (कहउँ उमा सादर सुनहु)।

(8)     बालकाण्ड के 121 वें दोहे की प्रथम चैपाई से 140 वें सोरठा तक (भजिअ महामाया पतिहि)।

(9)     बालकाण्ड के 141 वें दोहे की प्रथम चैपाई से 160 वें दोहे तक (निर्धन रहित निकेत)।

(10)    बालकाण्ड के 161 वें दोहे की प्रथम चैपाई से 175 वें दोहे तक (ताहि ब्याल सम दाम)।

        इस तरह 10 वां विश्राम होने के पश्चात् प्राचीन वैदिक ढंग से हवन करके श्रीरामलीला प्रारम्भ की जाती है।

अनंत चतुर्दशी – श्रीरामलीला के ग्यारहवंे दिन भाद्र शुक्ल अनन्त चतुर्दशी पवित्र दिन में सायंकाल पांच बजे से गायन-पारायण के साथ श्रीरामलीला अनुष्ठान भी प्रारम्भ हो जाता है। श्रीरामलीला का प्रारम्भ किस दिन से हो यह भी विद्वानों द्वारा शोध करके रखा गया है। रामचरितमानस में प्रसंग में जब ब्राह्मणों ने राजा प्रताप भानु को परिवार सहित निशाचर होने का श्राप दिया तब साथ ही यह भी श्राप दिया कि-

                ‘‘सम्वत् मध्य नास तब होऊ।

                जल दाता न रहहि कुल कोऊ।।’’

        ऊपर के चैपाई से स्पष्ट है कि सम्वत् के मध्य में राजा प्रताप भानु का परिवार सहित नाश हो गया और राक्षस योनि में उसका जन्म हुआ। भाद्रपद की पूर्णिमा को सम्वत् का मध्य होता है। अतः रामनगर की श्रीरामलीला भी सम्वत् के मध्य अर्थात् भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी अर्थात् अनन्त चतुर्दशी से प्रारम्भ होती है और अश्विन शुक्ल चतुर्दशी को समाप्त होती है। कोट विदाई को लेकर 31 लीलाएं होती है। दशरथ मरण की लीला नहीं होती है। इस प्रकार भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी तक राजा प्रताप भानु का परिवार सहित नाश हो जाता है और दूसरे दिन अनंत चतुर्दशी को रावण, कुम्भकरण और विभीषण जन्म, तप, वरदान तथा रावण द्वारा नाना प्रकार के अत्याचार, विजय, देवताओं की स्थिति, आकाशवाणी द्वारा मर्यादा पुरूषोत्तम राम की जन्म लेने की घोषणा आदि की लीलाओं से रामनगर की रामलीला आरंभ होती है। भगवान श्रीराम जन्म के पहले राक्षसराज रावण का जन्म हो गया था। अतः रावण जन्म से यहां की श्रीरामलीला आरंभ होती है।

‘‘पुर बैकुण्ठ जान कह कोई।

कोउ कह पयनिधि बस प्रभु सोई।।’’

        ऊपर चैपाई की पूर्ति और लीला भी होती है। रामबाग के बड़े तालाब में क्षीरसागर की झांकी और बुर्जी पर बैकुण्ठ है; भगवान लक्ष्मी के साथ बैठे हुए दर्शन देते हैं। अनंत चतुर्दशी वाले दिन से रामबाग की पश्चिमी चाहारदीवारी के बाहर यह चरित्रानुष्ठान ब्रह्मा के संवाद-

‘‘गयउ निकट तप देखि विधाता।

रामलीला से सम्बन्धित तिथियाँ और समय

मांगहु वर प्रसन्न मैं ताता।।’’

        बालकाण्ड के 177 वें दोहे की प्रथम चैपाई की उत्तरार्ध से प्रारंभ होकर उत्तरकाण्ड के 51 वें दोहे –

‘‘प्रेम सहित मुनि नारद, वरनि राम गुन ग्राम।

सोभा सिंधु हृदय धरि, गये जहां विधि धाम।।’’

        …..तक ब्रह्मा पुत्र नारद जी संवाद पर समाप्त हो जाता है। अब उत्तरकाण्ड के शेष 79 दोहे मूल गेय पारायण के बच जाते हैं; जिनका गायन राजमहल में कोट विदाई के पश्चात् श्रीराम जी के पुनः अयोध्या आगमन के बाद रामायणी दल द्वारा सम्पन्न किया जाता है। अयोध्या में वापस आने एवं मंगलाचरण के उपरांत उत्तरकाण्ड की समाप्ति हो जाने पर श्रीराम जी की अन्तिम आरती के साथ-साथ चरित्र प्रदर्शन (लीला) तथा पारायण अनुष्ठान दोनों की समाप्ति हो जाती है और आनन्दपूर्वक आश्विन मास भी समाप्त हो जाता है। इस लीला को निर्विघ्न सम्पन्न होने के लिए अनंत चतुर्दशी से अश्विन शुक्ल पूर्णिमा तक श्री देवी जी के मन्दिर में दुर्गा सप्तशती का पाठ भी ब्राह्मण द्वारा कराया जाता है।

        इसके अनन्तर रात्रि कृष्ण पक्ष में प्रथम या द्वितीय मंगलवार को न्यूनाधिक दोष परिहार के लिए श्रीरामचरितमानस का आद्यन्त एक आवृत्ति पारायण पुनः ब्राह्मण द्वारा कराया जाता है। यह पाठ दुर्ग के दक्षिण खिड़की के काले हनुमान जी के मंदिर पर होता है। इस पारायण के समाप्त होने पर श्रीरामलीला के व्यास जी अयोध्या जी के लीला भूमि में श्रीहनुमान जी का मुखौटा (चेहरा) सामने रखकर गणेश आदि पूजन पूर्वक हवन करके श्रीरामलीला अनुष्ठान की पूर्णाहुति करते हैं। इस प्रकार प्रतिवर्ष श्रीरामचरितमानस के पूर्ण अनुष्ठान का प्रारम्भ और उसकी समाप्ति होती है।

रामनगर की रामलीला : परम्परा एवं अनुशासन

रामनगर की रामलीला में पारम्परिक रूप से समस्त प्रक्रियाओं को आज दो सौ से अधिक सालों बाद भी यथावत दोहराया जा रहा है तथा इनके पालन में यथोचित सावधानियां भी बरती जाती हैं। रामलीला की परम्परा के अनुपालन में  पारम्परिक स्वरूप को लीला के प्रारम्भ से ही देखा जा सकता है। जैसे- पंचस्वरूपों का चयन, प्रथम गणेश पूजन, द्वितीय गणेश पूजन, रामलीला पक्की पर रामचरित मानस का पाठ, पात्रों की वेशभूषा, साज सज्जा, पात्रों का खान-पान, आचरण, प्रशिक्षण सब कुछ एक निश्चित परम्परा के अनुसार चल रहा है।

        रामलीला के पांच मुख्य पात्रों का चयन रामनगर किले में स्वर परीक्षा के बाद महाराज करते हैं, जिनमें राम सीता, भरत, लक्ष्मण शत्रुघ्न के स्वरूपों का चयन, अनेक बार चालीस, पचास यज्ञोपवीती ब्राह्मण कुमारों के बीच से होता है। जिनमें बालकों को उनके वाणी, वर्ण, आयु शारीरिक कोमलता (वपु) आदि के अनुसार चयनित किया जाता है। पंचस्वरूपों का स्वर परीक्षण व चयन की समस्त प्रक्रिया अब तक परम्परा के अनुसार महाराज बहादुर के समक्ष होता है। इसके अनन्तर श्रावण मास (सावन) के कृष्ण पक्ष में गणेश चतुर्थी के दिन ज्योतिर्विदों द्वारा निर्धारित मुहूर्त में प्रथम गणेश पूजा की जाती है। रामनगर चैक स्थित ‘पक्की‘ पर यह पूजन सम्पन्न होता है। जिसमें हनुमान और गणेश के मुखौटे को नये पीढ़े पर रखकर उसके बगल में लाल वस्त्र में बंधी रामलीला की पोथी, लिखित संवाद पुस्तक, दर्जी की कैंची, बढ़ई का बसूला, हथौला आदि, रंगसाज की रंग कूचिका, तूलिका आदि शिल्प सामग्री (औजारों) रखी होती है। साथ हीं पांचो स्वरूप राम, सीता, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न के साथ वशिष्ठादि पूज्य महर्षि पात्रों की भी पूजा की जाती है। किले के प्रतिनिधि के तौर पर ट्रस्ट का मैनेजर या लीलाधिकारी (वर्तमान में डाॅ0 जय प्रकाश पाठक) पूजा पर बैठते हैं तथा  लीला के व्यास पं0 लक्ष्मी नारायण पाण्डेय पूजन सम्पन्न कराते हैं। पंचस्वरूपों को तिलक लगाकर माला पहनाई जाती है। ब्रह्मा का एक संवाद- ‘ऐ पुत्र। तुम मन इच्छित वर मांगो…..’ होता है। जिसका तात्पर्य है कि पोथी पढ़ने का शुभारम्भ हो गया है। पूजन के अन्त में पोथी, गणेश तथा हनुमान के मुखौटों की आरती की जाती है। इस पूजा के साथ ही पांचों मुख्य स्वरूपों का प्रशिक्षण बलुआ घाट स्थित धर्मशाला में प्रारम्भ हो जाता है। पात्रों में प्रशिक्षण काल से ही रामादि की भावना और गौरव का प्रारम्भ हो जाता है। पंचस्वरूपों को उनके नाम से यथा- राम, सीता, भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न ही पुकारा जाता है। पात्रों में भी परस्पर वैसा ही व्यवहार प्रारम्भ हो जाता है। जैसे- राम के उठ खड़े होने पर अन्य सभी पात्र भी खड़े हो जाते हैं। पंचस्वरूपों को संवाद प्रशिक्षण के दौरान संवाद समाप्त होने पर गुरू (पंचस्वरूपों के व्यास) के समक्ष सिर झुकाकर प्रणाम करना होता है। जो रामलीला मे अनुशासन का अद्भुत उदाहरण है।

        इसके बाद फिर भाद्र पद के कृष्ण पक्ष को द्वितीय गणेश पूजा आयोजित की जाती है जिसमें गणेश की मूर्ति के अतिरिक्त रामचरितमानस की पूजा होती है। इसके बाद से रामलीला के शुरूआत तक इसी पक्की पर बारह रामायणियों का दल बालकांड के उन 175 दोहों का सस्वर पाठ करता है जिनका मंचन रामनगर की रामलीला में नहीं किया जाता है। प्रधान रामायणी की अगुवाई में 12 रामायणी एवं एक मृदंग वादक के दल द्वारा झांझ की आवाज में ‘‘नारदी‘‘ या नारद वाणी में सस्वर रामचरितमानस का पाठ किया जाता है। विनय पत्रिका का आदि विनय (गाइए गणपति जगबन्दन) का ताल सहित सस्वर पाठ कर गणेश जी को प्रणाम करते हैं। तदोपरान्त मानस बालकाण्ड के आदि मंगलाचरण ‘वर्णानाम् अर्थसंघानाम्‘ इत्यादि का मंगल श्लोक पाठ करके इस पारायण अनुष्ठान का श्रीगणेश होता है। दस दिनों तक होने वाले इस रामचरितमानस पाठ में क्रमशः प्रथम दिन 7 दोहे बालकाण्ड के प्रारम्भ से सातवें दोहे तक दूसरे दिन 13 दोहे- बालकाण्ड के आठवें दोहों के प्रथम चैपाई से 20वें दोहे तक, फिर 20 दोहो के हिसाब से तीसरे दिन बालकाण्ड के 21वें की प्रथम चैपाई से 40वें दोहे तक चैथे दिन 41वें दोहे के प्रथम चैपाई से 60वें दोहे तक पाँचवे दिन 61वें दोहे के प्रथम चैपाई से 80वें दोहे तक 6वें दिन बालकाण्ड की 81वें दोहे की प्रथम चैपाई से 101वें दोहे तक 7वें दिन बालकाण्ड के 101वें दोहे की प्रथम चैपाई से 120 (घ) सोरठा तक 8वें दिन बालकाण्ड के 121वें दोहे के प्रथम चैपाई से 140वें सोरठा तक 9वें दिन बालकाण्ड के 141वें दिन के प्रथम चैपाई से 160दोहे तक तथा 10वें दिन बालकाण्ड के 161 दोहे की प्रथम चैपाई से 175वें दोहे तक। प्रतिदिन प्रसंग समाप्त होने पर कर्पूर की आरती होती है। यह गायन आदि से अन्त तक केवल नारद वाणी में होता है। इस रामलीला के अनुष्ठान के प्रथम प्रतिष्ठा संकल्प मे प्रजा, परिजन, पुरजन, राष्ट्र, देश, कोष, सेना, सचिव तथा पुत्र-पत्नी सहित राजपरिवार के कल्याण की कामना और रामभक्ति की प्राप्ति की योजना रहती है। अतः इसे कामना अनुष्ठान भी कहा जा सकता है। इसके बाद बालकांड के 176वें दोहे से रामनगर की रामलीला की विधिवत शुरूआत भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष में अनंत चर्तुदशी से होती है और आश्विन मास के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तक अनवरत चलती है।

        रामनगर की रामलीला की कुछ ऐसी परम्परायें हैं जिनको किसी भी हाल में तोड़ा नहीं जाता और इसलिए ही इस रामलीला का महत्व और बढ़ जाता है। यहाँ की रामलीला पूरी तरह रामचरित मानस के पाठ पर आधारित है। पूरा रामचरित मानस पढ़ा जाता है। लेकिन जिस पाठ को रामलीला में अभिनीत नहीं किया जाता उसको अलग से पढ़ा जाता है। जैसे रामनगर की रामलीला में दशरथ मरण का प्रसंग नहीं मंचित किया जाता है अतः इस हिस्से का पाठ रामलीला के दौरान नहीं किया जाता लेकिन प्रधान रामायणी यह पाठ रामलीला समाप्ति के बाद प्रभु नारायण इण्टर कालेज के सामने स्थित प्रसिद्ध कूप के पास बैठकर पूरा करते हैं। श्रीरामचन्द्र के राज्याभिषेक के बाद अयोध्या में जाने पर मंगलाचरण के बाद उत्तर काण्ड समाप्त हो जाता है। श्रीराम जी की आरती के बाद चरित्र प्रदर्शन और पारायण दोनों की समाप्ति हो जाती है। इस लीला को निर्वघ्न पूर्ण होने के लिए अनंत चर्तुदशी से आश्विन शुक्ल पूर्णिमा तक दुर्ग स्थित देवी मंदिर में दुर्गा सप्तशती का ब्राह्मण द्वारा पाठ भी कराया जाता है इसके अनन्तर कार्तिक कृष्ण पक्ष में प्रथम या द्वितीय मंगलवार को पूरी लीला के दौरान रामचरित मानस के पाठ में हुई गलती को सुधारने के लिए पूरी रामलीला के समाप्त होने के बाद रामचरितमानस का एक आवृŸिा पारायण पुनः ब्राह्मण द्वारा कराया जाता है। यह पाठ दुर्ग के दक्षिण खिड़की के हनुमान जी के मंदिर पर होता है। जिसके समाप्त होने पर रामलीला के व्यास पं0 लक्ष्मीनारायण पाण्डेय अयोध्या जी के लीला भूमि में श्री हनुमान जी का मुखौटा रखकर गणेश आदि पूजन पूर्वक हवन करके श्री रामलीला अनुष्ठान की पुर्णाहुति करते हैं। इस प्रकार रामचरितमानस के गूढ़ अनुष्ठान का प्रारम्भ और उसकी समाप्ति होती है।

        रामलीला में राजसी परम्पराओं का पूरा ख्याल रखा जाता है। परम्परा के अनुसार काशिराज कई लीलाएं नहीं देखते जैसे कैकेयी कोपभवन, सीताहरण आदि। ऐसी मान्यता है कि एक राजा दूसरे राजा का दुःख नहीं देख सकता। उसी तरह श्रीराम राज्याभिषेक के दिन काशिराज पैदल चलकर लीला स्थल पहुँचते है और श्रीराम को राजतिलक लगाते है क्योंकि कोई राजा ही किसी होने वाले राजा का राजतिलक कर सकता है।

        रामलीला की कई ऐसी विशेषतायें है जो निर्वहन होते-होते परम्परा का रूप ले चुकी हैं और इन्हें बखूबी और कड़ाई से निभाया जा रहा है। श्रीराम और सीता के विवाह के पूर्व एवं सीताहरण के बाद तक श्रीराम, सीता अलग-अलग रहते हैं और लीला स्थल तक भी अलग-अलग साधनों (रथों से) जाते हैं। बनगमन के बाद भरत शत्रुघ्न को श्री राम, सीता और लक्ष्मण से अलग रखा जाता है। बलुआ घाट में जब इनका प्रशिक्षण रघुनाथ दŸा व्यास के सानिध्य में चलता है तो वहाँ एक परिवार की मर्यादा निभाई जाती है। जैसे-सो कर सबसे पहले राम उठेंगे उसके बाद क्रमानुसार और सब शीश नवाकर ही बैठते हैं। प्रशिक्षण के दौरान ही सभी मुख्य पात्रों को चारित्रिक नामो से पुकारा जाता है। जैसे-रामजी, जानकीजी इत्यादि।

        रामलीला के दौरान भी समाज में प्रचलित मान्यताओं को दुहराया जाता है, जैसे-श्रीराम के जन्म के समय गवनहारियों द्वारा सोहर गाना, श्रीराम और उनके भाईयों की शादी पर बारात का जाना वहाँ खिचड़ी खाना और जनकपुर में उपस्थित महिलाओं द्वारा मंगल गीत गाया जाना और खिचड़ी के दौरान जनक जी दहेज भी देते हैं, चाहे वह सांकेतिक रुप में ही सही।

        सम्प्रेषण के माध्यम के रुप में रामलीला का यह प्रभाव पड़ता है कि रामलीला के दौरान पूरा नगर जैसे राममय हो जाता है। पूरे माह तक धर्म और अध्यात्म की नदी बहती है और ऐसा लगता है जैसे हर कोई इस नदी में गोते लगाने को आतुर हो। किसी भी पात्र के संवाद बोलने के पहले व्यास द्वारा यह कहना कि, ‘‘चुप रहो…..सावधान…..‘ इतने पर हजारों की भीड़ शान्त हो जाती है और उस पात्र का संवाद दूर तक सुनाई पड़ता है।

        श्रीराम के साथ लीला देखते-देखते ऐसा तादात्म्य स्थापित हो जाता है कि कई जगहों पर मार्मिक संवाद को सुनकर लोग रो पड़ते हैं। श्रीराम बनगमन के दौरान संवाद, अशोक वाटिका में सीता का विलाप, भरत का चित्रकूट जाकर श्रीराम को वापसी के लिए मनाना आदि ऐसे प्रसंग है जिसमें उपस्थित लोग रो पड़ते हैं। राम का जीवन पूरी तरह से इस एक महीने में लोगों के साथ घुल-मिल जाता है। हर संवाद के बाद ‘बोल दे राजा राम की जय’ और ‘हर हर महादेव’ का उद्घोष ही यह प्रमाणित कर देता है कि प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में राम और शंकर वास कर रहे हैं।

        रामनगर की रामलीला की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ नित्य प्रति होने वाली आरती है। ऐसी मान्यता है कि आरती के समय साक्षात् विष्णु भगवान का वास इन स्वरुपों में हो जाता है इसलिए उस समय इनका दर्शन करना पुण्य देता है। इसलिए इसकी महŸाा सर्वाधिक है और यह बात भी देखने में आई है कि बाहर से आने वाले दर्शनार्थी और विशेष कर स्थानीय लोग और कुछ बनारसी  सिर्फ आरती के लिए हीं रामनगर की रामलीला मंे आते हैं।

        इस आरती को लेने के लिए जो भागम-भाग होती है यह अवर्णनीय और अकल्पनीय है। आरती को पाने के लिए दोपहर दो बजे से ही श्रद्धालुओं का आगमन तथा रामनगर स्थित रामबाग पोखरे, रतनबाग पोखरे, सगरा और गंगा नदी पर साफा पानी लगाना और भाँग-बूटी छनना शुरू हो जाता है। पूरे एक महीने यहाँ बहरी अलंग का मजा  लिया जाता है और दो बजे से जारी तैयारी 5 बजते-बजते पूर्ण हो जाती है। सब लोग लीलास्थल पहुँचने लगते हैं और जिनको सम्पूर्ण लीला देखनी होती है वह तो देखते हैं, लेकिन जिनको आरती लेनी होती है वह भी लीला स्थल के आस-पास ही रहते हंै।

        यहाँ की लीला का समापन प्रतिदिन आरती से होता है। आरती स्वरुपों या देवमूर्तियों के समक्ष दीप जलाकर की जाती है। जो भी हो आरती प्रतिदिन होनी ही है। बरसात आदि के कारण अगर उस दिन विशेष की रामलीला नहीं हो पाती है तो नियत समय पर आरती करा दी जाती है और उस दिन की छूटी रामलीला दूसरे दिन वही से शुरू होती है। इसके बाद में किसी दिन समायोजित कर लिया जाता है। यह समायोजन विजयादशमी की लीला से पहले ही पूर्ण कर लिया जाता है। जब रामलीला बाधित होती है और आरती के समय में अगर परिवर्तन किया जाता है तो इसकी सूचना श्रद्धालुओं को दी जाती है ताकि किसी की आरती न छूटे।

        आरती प्रारम्भ होने से पहले स्वरुपों को गजरा पहनाया जाता है, स्वरुपों को कमल का फूल दिया जाता है और फिर रामलीला का ही कोई पात्र स्वरुपों की आरती उतारता है। जैसे अयोध्या में होने वाली सारी आरती राजमाता कौशल्या करती हैं, जनकपुर जाते समय रास्ते में दो दिन कोई साधु आरती करता है, जनकपुर में राजा जनक की पत्नी सुनयना आरती करती है, वनगमन के दौरान कभी निषाद राज तो कभी सुग्रीवजी तो कभी विभीषण आरती करते हैं। जयंत नेत्र भंग तथा सीताहरण के दिन होने वाली आरती इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है कि लक्ष्मणजी स्वयं श्रीराम की आरती करते हैं। लंका पहुंचने से पहले रामेश्वर की स्थापना के बाद खुद भगवान राम शंकरजी की आरती करते हैं और यह पूरी रामलीला में पहली बार होता है जब आरती के दौरान ‘सीता-राम, सीता-राम‘ की जगह ‘हर हर महादेव‘ का जाप श्रद्धालु करते हैं।

        श्री रामलीला की कुल आरती 31 दिनों की होती है। रामलीला प्रारम्भ होने से पहले दस दिन श्रीरामचरितमानस का  जो पाठ रामलीला पक्की पर होता है तो उसमें ‘‘आरती श्री रामायण जी‘‘ की गायी जाती है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि आरती के दौरान कुल तीन प्रकार की आरती गायी जाती है जो परिस्थितिजन्य होती है। जैसे जब श्री राम की बिना सीता के आरती होती है तो रामायणी ‘‘राम आरती होने लगी है‘‘ का पाठ करते हैं। जब श्रीराम का विवाह सीता से हो जाता है तो ‘‘आरती करिये सियावर की‘‘ गायी जाती है। तीसरी आरती ‘‘आरती श्री रामायण जी की’’ रावण जन्म के दिन गायी जाती है।

        इस तरह दूसरे दिन (रामजन्म) की लीला से पाँचवे दिन (धनुष यज्ञ) की लीला तक ‘राम आरती लगी है‘ और छठवें दिन (श्रीराम विवाह) से पन्द्रहवें दिन (श्रीराम का पंचवटी निवास) तक ‘आरती करिये सियवर‘ आरती गायी जाती है। सोलहवें दिन (सीताहरण) से सŸााइसवें दिन (विजयादशमी) तक ‘राम आरती होने लगी है‘ आरती गायी जाती है। अट्ठाइसवें दिन (श्रीराम के अवध प्रयाण) से आखरी दिन तक ‘आरती श्री रामायण जी की’ गायी जाती है। इस पूरी रामलीला के दौरान चैदहवें दिन, जब भरत राम को मनाने में असफल हो कर अयोध्या वापस आते हैं और नन्दी ग्राम निवास करते हैं तो उस दिन दो आरती होती है। पहली आरती-श्रीराम की चित्रकूट में, उसके बाद दूसरी आरती नन्दी ग्राम में निवास करते भरत की होती है। रामलीला का प्रतिदिन आरती का समय रात्रि लगभग 9 बजे का होता है लेकिन विजयादशमी के दिन लगभग रात्रि 11 बजे और भरत मिलाप की आरती रात्रि 12 बजे होती है। रामलीला की सर्वाधिक पुण्यदायी और महत्वपूर्ण आरती श्री रामराज्याभिषेक की भोर की आरती होती है। जब श्रीराम का राज्याभिषेक कर दिया जाता है तो रात्रि भर श्रद्धालुओं को उनके दर्शन का अवसर मिलता है और रात्रि के बाद जैसे ही अँधेरा छँटता है और सुबह की पौ फटती है, इस रामलीला की सर्वाधिक नयनाभिराम आरती शुरू होती है। इस आरती को लेने महाराज पैदल चलकर ही रामलीला स्थल तक आते हैं। इस दिन भी राजमाता कौशल्या आरती करती हैं। फूलों से सुसज्जित शानदार राजसिंहासन पर श्रीराम सीता सहित विराजमान रहते हैं उनके पीछे हनुमान चँवर ड़ोलाते रहते हैं अगल-बगल भरतजी, लक्ष्मणजी, शत्रुघ्नजी, गुरु वशिष्ठ बैठे रहते हंै। इधर श्रद्धालु दोनों हाथ जोड़े ‘सीताराम जय सीताराम‘ के जाप के बीच श्रद्धावनत दर्शन करते रहते हैं। रामायणी आरती गाते हैं और पहले लाल महताबी और फिर सफेद महताबी जलायी जाती है। चारों ओर घण्टे-घड़ियाल और शंख की प्रतिध्वनि गंूजती रहती है। सफेद महताबी की रोशनी आरती का चरम् क्षण होता है और ऐसा लगता है जैसे इस दैदीप्यमान प्रकाश में सब स्नान कर रहे हों। आरती जैसे ही समाप्त होती है रामलीला व्यास श्रीराम के गले का पुष्पाहार लाकर महाराज को पहनाते हैं और अब चारो ओर ‘हर हर महादेव‘ का उद्घोष गंुजायमान होता है। लीला स्थल से बाहर निकलने के बाद महाराज परम्परानुसार हवाखोरी के लिए निकलते हैं और एक परम्परा यह है कि श्रीराम के राजगद्दी मिलने की खुशी में भक्त ‘बहरी अलंग‘ का आनन्द उठाते हैं। रामनगर का कोई भी तालाब, पोखरा, बगीचा ऐसा नहीं बचता जहाँ खाना बनाना-खाना न होता हो। रामनगर किले में स्थित ‘दक्षिणामुखी हनुमान‘ की काली प्रतिमा भी आम लोगों के दशनार्थ आज के ही दिन सुलभ हो पाती है। दर्शन का क्रम दोपहर दो बजे से सायं सात बजे तक चलता है।

        रामलीला में आज भी परम्परागत तरीके से महाराज की सवारी निकलती है। जब अयोध्याजी में लीला होती है तो महाराजा की सवारी हाथी से निकलती है तथा दूर की लीला में सवारी बग्घी से निकलती है और लीला स्थल पर जाकर महाराजा हाथी पर सवार हो जाते हैं और वहीं से रामलीला का अवलोकन करते हैं। यह सवारी भी पूरी तरह शाही होती है। जब सवारी बग्घी से निकलती है तो बग्घी रामनगर किले के द्वार पर खड़ी रहती है और महाराजा यहाँ तक पैदल आते हैं लेकिन जब हाथी से निकलना होता है तो उनकी सवारी किले के भीतर स्थित हाथी गेट से ही आरम्भ होती है।

        इस सवारी मंे सबसे आगे घोड़े पर सवार एक ‘डंका‘ या ‘नगाड़ा‘ लिये एक व्यक्ति होता है जो महाराज के आने की सूचना देते चलता है। इसके पीछे घोड़े पर बनारस स्टेट का झंडा लिए एक घुड़सवार चलता है, इसके पीछे चार घुड़सवार फिर हाथी या बग्घी पर सवार महाराजा फिर उसके पीछे चार या दो घुड़सवार परिस्थिति या उपलब्धता के अनुसार होते हैं। ये छह या आठ सवार नागरिक पुलिस के होते हैं जिन्हें जिला पुलिस की ओर से भेजा जाता है जबकि आगे के मुनादी और झंडा लेकर चलने वाले महाराज के किला के व्यक्ति होते हैं। महाराजा की इस सवारी को रामलीला स्थल पर छोड़कर घुड़सवार वापस आ जाते हैं। महाराजा की सवारी रामलीला का हिस्सा तो नहीं है लेकिन एक दिन की सवारी ऐसी भी है जो लगभग रामलीला का हिस्सा बन गयी है। वह दिन है- श्रीराम की रावण पर विजय का दिवस अर्थात दशहरा या विजयादशमी।

        भारत भर में दशहरा के दिन रावण पर श्रीराम की विजय के उपलक्ष्य में, बुराई पर अच्छाई के प्रतीक के रुप में रावण का पुतला जलाया जाता है। लेकिन रामनगर की रामलीला में दशहरा का दिन महाराज काशी नरेश के विजय जलूस के लिए अधिक जाना जाता है। काशीराज का इस रामलीला के साथ अटूट सम्बन्ध है और ऐसी मान्यता रही है कि काशीराज भगवान शंकर के प्रतीक हैं और इसलिए किले से बाहर निकलते ही इनका अभिवादन ‘हर हर महादेव‘ के उद्घोष के साथ किया जाता है। दशहरा के दिन महाराज काशी नरेश शस्त्र पूजा पर बैठते हैं उसी समय उन्हे नौ तोपों की सलामी दी जाती है। किले में रखे शस्त्रों की पूजा ब्राह्मणों का दल करवाता है और उसके बाद पूरी राजसी ठाट-बाट से विजय जलूस निकलता है। महाराजा भी विजय का प्रतीक हल्के नारंगी रंग के वस्त्र पहनते हैं और उनका पूरा शरीर स्वर्णाभूषणों से ढंका रहता है। ऐसा नहीं कि दशहरा के दिन सिर्फ महाराजा ही राजसी ठाठ-बाट से बाहर आते हैं बल्कि इस दिन पूरे राज परिवार का हर सदस्य चाहे महिला हो या पुरुष सभी स्वर्णाभूषणों से लदे होते हैं। सभी पुरुष सदस्य हाथियों पर सवार होकर निकलते हैं तो तीनों राजकुमारियाँ और उनके पुत्र-पुत्री गाड़ी में होती हैं। रानियाँ किले से बाहर केवल फुलवारी, धनुषयज्ञ, भरतमनावन, मुद्रिका एवं लक्ष्मणशक्ति वाले दिन बाहर आती हैं क्योंकि परम्परा के अनुसार ये पर्दे में ही रहती हैं। जबकि राजकुमारी लोग तीसो दिन रामलीला का अवलोकन करती हैं।

        विजय जलूस में निकलने वाले हाथी घोड़ों को भी सजाया जाता है। हाथियों को भी मुकुट पहनाया जाता है और सोने-चाँदी के गहने पहनाये जाते है। इस जलूस में पालकी, बग्घी, तोप गाड़ियाँ इत्यादि सब कुछ पहली बार किले से बाहर आती है। यह जलूस रामनगर किले से निकल कर लंका तक जाता है। वहाँ महाराजा रणभूमि की परिक्रमा करते हैं। उसके बाद उनका काफिला गाड़ी में वापस आ जाता है। फिर रात्रि 10.30 बजे लंका से रावण का पुतला जलाया जाता है। इस दौरान महाराजा लंका मैदान नहीं जाते और उनके पुत्र अथवा प्रतिनिधि की उपस्थिति में पुतला जलाया जाता है।

        एक सबसे खास चीज और आज के दिन परम्परानुसार निभाई जाती है कि श्रीराम के विजय के उपलक्ष्य में रामनगर के किले में दरबार लगता है जिसमें महाराज सहित परिवार के सभी पुरुष सदस्य भाग लेते हैं और इनके साथ वहाँ पर वंश परस्परा से रामनगर किले के दरबारी के रुप में जुड़े लोग शामिल होते हैं, जिनमें- देवेन्द्र बहादुर सिंह के पुत्र मुन्ना सिंह, अनिल सिंह मणि, डा0 शारदा परिवार के सदस्य और अन्य आज भी दरबारियों की वेशभूषा में वहाँ उपस्थित रहते हैं और महाराजा को परम्परानुसार अपना नजर पेश करते हैं।

        रामनगर की रामलीला का दिव्य स्वरुप उसकी सादगी मे ही निहित है। इतना विशाल आयोजन और इतनी सादगी; फिर भी भव्यता अकल्पनीय है। समस्त भारत में और विशेषकर उŸार भारत में रामलीलाएँ मंचित की जाती हंै लेकिन वहा पर गम्भीरता कम और नाटकीयता ज्यादा होती है, लेकिन रामनगर की रामलीला में नाटकीयता का रंचमात्र भी अंश नहीं है। नाटक और रामनगर की रामलीला में अगर कोई एक चीज समान है तो वह है कि नाटक में भी अभिनय होता है और रामलीला में अभिनय किया जाता है।

        क्या यह आश्चर्य नहीं है कि प्रत्येक दिवस लगभग दस हजार से ज्यादा की भीड़ वाले रामनगर की रामलीला में उपस्थित श्रद्धालुओं को पात्रों द्वारा उच्चारित किये शब्द सुनाई देते हैं और वह भी बिना माइक या लाउडस्पीकर के। रामनगर की रामलीला का कोई भी दिन ऐसा नहीं होता जिस दिन दस हजार, से कम की भीड़ होती है। इसके बावजूद संवाद प्रत्येक व्यक्ति एकाग्रचित होकर सुनता है। रामनगर की रामलीला में उसके उद्भव काल से लेकर आज तक कभी भी किसी तरह के संचार उपकरणों का इस्तेमाल नहीं किया गया है। वहाँ के लिए संचार उपकरण का कार्य दर्शकों की भक्ति भावना ही कर देती है। रामलीला के  व्यास लक्ष्मी नारायण द्वारा सभी पात्रों के संवाद कहने से पूर्व ‘चुप रहो! सावधान!’ की पुकार लगायी जाती है और रामलीला स्थल पर ऐसी शान्ति छा जाती है कि सुई भी गिरे तो आवाज हो जाय। इस पुकार के बाद लोग तन्मयता से संवाद सुनने में लग जाते हैं और अगल-बगल कोई आवाज करता है तो भक्तगण स्वतः ही डाटकर चुप करा देते हैं।

        आश्चर्य है कि राम सहित अन्य स्वरुपों की आयु 13-14 वर्ष की होती है लेकिन उनकी आवाज का हर उतार -चढ़ाव आसानी से महसूस किया जा सकता है। इस बाबत कहा जाता है कि रामलीला राम का जीवन चरित है और यहाँ  उसी वातावरण को जीने का प्रयास किया जाता है, इसलिए ये सब चीजे प्रयोग में नहीं लायी जाती और आडम्बर से मुक्त रखने का प्रयास किया जाता है। यही नहीं पूरे रामलीला क्षेत्र में किसी भी ध्वनि विस्तारक यंत्र का उपयोग लोग स्वयमेव नहीं करते। रामलीला के मंचन के साथ श्रीरामचरितमानस का पाठ भी चलता रहता है। वस्तुतः पहले रामचरित मानस का पाठ किया जाता है फिर उस अंश की लीला मंचित या अभिनीत की जाती है। यह पाठ 12 रामायाणियों का दल करता है। जिसके पास वाद्य यंत्र के रुप में झांझ और मृदंग रहता है और ये भी बिना किसी उपकरण के ही पाठ करते हैं जो दूर-दूर तक सुनाई देता है। रामलीला के संवादो को रिकार्ड करना भी निषिद्ध है।

        रामनगर की रामलीला की यह भी एक विशिष्टता है कि पूरी रामलीला के दौरान मात्र धनुषयज्ञ की लीला को छोड़कर कही भी विद्युत द्वारा चलित बल्ब का इस्तेमाल नहीं किया जाता है और अपवाद स्वरुप धनुषयज्ञ की लीला में जब यज्ञ भूमि में श्रीराम धनुष उठाते हैं तो मात्र 3 मिनट के लिए उनको प्रकाशमान दिखाने के लिए एक 500 वाट का बल्ब जलाया जाता है इसके अलावा कहीं भी विद्युत प्रकाश का इस्तेमाल नहीं किया जाता। पूरी रामलीला में पेट्रोमैक्स पंचलाइट का उपयोग किया जाता है और इसके अलावा रेड़ी व तीसी के तेल से जलती मशालें काम में लायी जाती हैं। चाहे राजा दशरथ का महल हो या रावण की नगरी, चाहे जनकपुर हो या वनगमन के दौरान पड़ने वाले जंगल-पर्वत, सभी जगहों पर पेट्रोमैक्सों का उपयोग किया जाता है। इसके पीछे भी एक तर्क दिया जाता है कि चूंकि रामजी के समय बिजली आयी नहीं थी अतः रामलीला को पूर्णता प्रदान करने के लिए संचार उपकरणों और प्रकाश के विद्युत उपकरणों का प्रयोग नहीं किया जाता और यह भी तर्क दिया जाता कि रामलीला के संस्थापको ने जिस स्वरुप में रामलीला का संचालन शुरु किया था उस स्वरुप को बनाये रखने और उनकी कल्पनाओं को मूर्त रुप देने के लिए आधुनिक प्रकाश व्यवस्था से परहेज किया जाता है। रामायणियों का दल छोटे-छोटे जलते मशालों की रोशनी में मानस पाठ करता है। पात्रों को संवाद अदायगी में सहायता करने वाले व्यास भी पेट्रोमैक्स की रोशनी में ही अपना ग्रंथ पढ़ते चलते हंै और पात्रों के साथ-साथ रामायणियों को निर्देश देते हैं। जब श्रीराम अयोध्या से वन के लिए चलते हैं तो भी रास्तो में पेड़ों आदि पर पेट्रोमैक्स पंचलाइट ही जलाये जाते हैं और उन्ही के प्रकाश में रामलीला आगे बढ़ती है। आरती के दौरान लाल और सफेद महताबी जब जलती है तो ऐसा लगता है जैसे पूरा वातावरण ही प्रकाशमान हो गया है। चूंकि रामलीला स्थल में बगैर अनुमति के फोटो नहीं लिये जा सकते अतः कैमरों की फ्लश लाइट तक नही जलती है। रामलीला प्रेमियों के हाथो में टार्च जरुर होती है जिसका उपयोग वे मानस पाठ में करते हैं। रामनगर की रामलीला में एक दृश्य आपको बहुत ही आम मिलेगा जब आप लीला स्थल पर रहेंगे श्रद्धालुओं की भारी संख्या हाथो में श्रीरामचरितमास लिए रामायणियों के साथ-साथ पाठ करती रहती है और इसलिए रात्रि में टार्च रखना उनकी आवश्यकता बन जाती है। बिना अत्याधुनिक उपकरणों के भी रामलीला का दृश्य हर आदमी देखता है, सुनता है और लीला स्थल छोड़ता है तो उसके ऊपर रामलीला के प्रभा मण्डल का प्रभाव स्पष्ट रुप से देखने को मिलता है।

रामनगर रामलीला की आरती

(1) आरति श्रीरामायनजी की। कीरति कलित-ललित सिय पी की।।(1) आरति श्रीरामायनजी की। कीरति कलित-ललित सिय पी की।। गावत ब्रह्मादिक मुनि नारद। बालमीक बिग्यान बिसारद। सुक सनकादि सेष अरु सारद। बरनि पवनसुत कीरति नीकी।। 1 ।। गावत वेद पुरान अष्टदस। छओ सास्त्र सब ग्रंथन को रस। मुनि जन धन संतनको सरबस। सार अंस संमत सबही की।। 2 ।। ब्यास आदि कबिबर्ज बखानी। कागभुसुंडि गरुड़के ही की।। 3 ।। कलिमल हरनि विषय रस फीकी। सुभग सिंगार मुक्ति जुबतीकी। दलन रोग भव मूरि अमी की। तात मात सब विधि तुलसी की।। 4 ।।(तुलसीदास-श्रीरामचरितमानस)

(2) राम आरती होन लगी है। जगमग जगमग जोति जगी है।। कंचन भवन रतन सिंहासन। दासन्ह डासे झिलमिल डासन। तापर राजत जगत प्रकासन। देखति छबि मति प्रेम पगी है।। 1 ।। महकत धूप बरत महताबी। झलकत कुंडल रबि छबि दाबी। अंग अंग सुन्दरता फाबी। आनन्दकी सरिता उमगी है।। 2 ।। घण्टा, घरी मृदंग बजावत। नूपुर पग भरि नाचत गावत। पूरत  सेवहि चँवर डोलावत। सुनतै दूरि बलाय भगी है।। 3 ।। रूप देषि जननी हरसत है। अजुरिन देव सुमन बरसत है। करि दंडवत चरन परसत है। सुमति रामके रंग रंगी है।। 4 ।।(काष्ठजिह्वा स्वामी रामसुधा पृ0-63)

(3) आरती करियै सियबरकी। नख सिख छबिधर की।। लाल पीत अम्बर अति साजै। मुष निरषत शारद ससि साजै। तिलक चिलक भालन पर राजै। कुंकुम केसर की।। 1 ।। करन फूल कुंडल झलकत है। चन्द्रहार मोती हलकत है। कर कंकनकी छबि छलकत हैं। जगमग दिनकर की।। 2 ।। मृदु तरुवनमें अधिक ललाई। हास बिलास न किछु कहि जाई। चितवनिकी गति अति सुखदाई। मनकी मन फरकी।। 3 ।। सिंहासन पर चँवर ढरत हैं। साज बजत जय-जय उचरत हैं। सादर अस्तुति देव करत हैं। लोटरनि अनुचर की।। 4 ।।(काष्ठजिह्वा स्वामी-रामसुधा पृ0-54)

रामनगर, रामलीला का रंगमंचीय पक्ष

(अभिनय] साज-सज्जा एवं संवाद)

रामनगर के रामलीला की पात्र योजना उसके संवाद, उसकी मंचीय संकल्पना, उसकी रंगशाला और दृश्य योजना यानी मोटेे तौर पर कहें तो उसकी प्रस्तुति भारतीय रंग परम्परा में एक नया अध्याय जोड़ती है। दो सौ सालों से से भी अधिक समय से चली आ रही यह लीला अपने सम्पूर्ण नाटकीय स्वरूप में भारतीय परम्परा की प्रायः सभी नाट्य शैलियों का सम्मुच्चय होते हुए भी किसी एक जैसी नहीं है। यह अपनी प्रस्तुति के लिए भारतीय रंग परम्परा का ‘कोलाज’ रचती सी प्रतीत होती है। भारतीय परम्परा की जितनी भी रंग शैलियाँ हैं उन सबसे कुछ-कुछ प्रभाव ग्रहण कर इस लीला ने अपनी अभिव्यक्ति का एक ऐसा पहल खड़ा किया जिसे देखकर ‘रिचर्ड शेकनर’ जैसा पश्चिमी रंगकर्मी भी हतप्रभ रह गया। सनद रहे कि रामनगर की रामलीला देखकर जब रिचर्ड शेकनर यहाँ से अपने देश लौटे तो उन्होंने यहाँ की रामलीला की मंच-सज्जा और दर्शक की कल्पनाशीलता का सहारा लेकर शेक्सपियर समेत दुनिया के तमाम महान नाटककारों के दुरूह नाट्यों का मंचन किया। परिचय की रंग परिकल्पना जो कि अरस्तू के संकलन त्रय (समय, स्थान और कार्य-व्यापार) के आधार पर संचालित हो रही थी, अपनी तमाम खूबियों के बावजूद कई ऐसी सीमाओं में बंधी हुई थी कि रचनाकार की अपनी वैयक्तिक छूटों को अभिव्यक्त कर पाने में असमर्थ थी। एशियाई मूल की कल्पनाशील नाट्य परम्परा का मंचन तो लगभग असम्भव था। ऐसे में भारतीय नाट्य परम्परा के एक मजबूत उदाहरण के रूप में विद्यटित रामनगर की रामलीला को देखकर भारतीय नाट्य परम्परा और खासकर रामायण और महाभारत का मंचन अन्य देशों में सम्पन्न हो सका। यह रामलीला का ही प्रभाव था कि कई सारे पश्चिमी रंगकर्मियों ने (जिनमें रिचर्ड शेकनर के साथ पीटर बु्रक जैसे महत्वपूर्ण रंगकर्मी का नाम शामिल है) भारतीय नाट्य परम्परा को आधार बनाकर अरस्तू के संकलनत्रय को धत्ता बताते हुए रामायण और महाभारत का मंचन कई पश्चिमी देशों में किया।

रामलीला भी अभिनय द्वारा श्रीराम के जीवन चरित्र को दोहराने और प्रस्तुत करने की एक घटना है लेकिन यह नाटकों या उनकी शैली से अत्यन्त अलग है। नाटक में निर्देशक कहता है- ‘‘दर्शकों को देखकर संवाद  बोलो‘‘ किन्तु यहां नियम ही अलग है, या यूँ कहें कि यहां की रामलीला में दर्शक होते ही नहीं बल्कि प्रत्येक दर्शक स्वयं में लीला का पात्र है। यहां विवाह के प्रसंग में ही जो अयोध्या के पास से बारात के साथ चला वो बाराती, जो जनकपुर में ही पहले से उपस्थित वो घराती, दरबार में है तो दरबारी, इसी तरह वनगमन में सभी लीला प्रेमी स्वरूपों के साथ वनवासी हो गये और आरती के समय भक्त।

बन्द थियेटर में खेले जाने वाले नाटकों की परम्परा से इतर रामनगर की रामलीला का कई स्थलों में विभाजित मुक्ताकाशीय मंच बहुत ही व्यापक है, जहां पात्र बिना किसी निर्देशक के अभिनय करते हैं। पात्र अपनी भूमिका जीता है। उसे कोई देखता है, सुनता है; इसकी चिंता नहीं है। कई बार तो एक साथ कई स्थलों पर दर्शक बैठे मिल जायेंगे। यथा-लंका पर रामलीला के दौरान सुबेरगिरि पर्वत पर भक्तों से घिरे श्रीराम विराजे हैं, तो वहां से अन्य स्थल अशोक वाटिका में माता सीता भक्त स्त्रियों से घिरी, कई फर्लांग दूर-रावण का दरबार है, रंगशाला है, रणभूमि है। कुल मिलाकर एक स्थल से दूसरा नहीं दिखता फिर भी दर्शक निष्ठा से सब जगह बैठे रहते हैं।

अन्य पात्रों और स्वरूपों के बीच सामंजस्य भी एक दैवीय कृपा ही है। मुख्य स्वरूप श्रीराम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और सीता को दो महीने तक बलुआ घाट धर्मशाला में व्यास प्रशिक्षित करते हैं लेकिन अन्य पात्रों से उनकी मुलाकात सीधे रामलीला स्थल पर ही होती है। वहां जाने पर ही स्वरूपों को पता चलता है कि ये दशरथ हैं, ये कौशल्या इत्यादि। स्वरूपों को भी प्रशिक्षण के दौरान संवाद याद करने पर ही ज्यादा ध्यान दिया जाता है। अन्य पात्र स्वयमेव ही तैयार होकर आते हैं और बिना किसी जटिल औपचारिक निर्देशन के लीला होती है। हालांकि संवाद अदायगी को दो-दो व्यास वही मौजूद रहते हैं, जिनके पास संवाद की पोथी रहती है। मुख्य स्वरूपों की सहायता पं0 रघुनाथ दत्त व्यास करते हैं तो अन्य पात्रों की सहायता के लिए पं0 लक्ष्मीनारायण पाण्डेय उपलब्ध रहते हैं। अभिनय के दौरान व्यास पात्रों के ठीक पीछे खड़े रहते हैं ताकि जब भी पात्र संवाद भूले उसे तत्काल स्मरण करा दिया जाये।

श्रीरामलीला के मंचन में प्रकाश या ध्वनि द्वारा विशेष प्रभाव लाने का प्रयास नहीं किया जाता है, बल्कि प्रतीकात्मक रूप से कहीं-कहीं इनका प्रयोग अवश्य किया जाता है। जैसे धनुष यज्ञ, खरदूषण वध, मेघनाद द्वारा लक्ष्मण जी को शक्ति प्रयोग की लीलाओं में तोप दागा जाता है, जिसके पीछे कारण माना जाता है कि – धनुष भंग के समय जोर की आवाज हुयी थी, खरदूषण काफी शक्तिशाली था, मेघनाद का शक्ति-बाण शक्तिशाली था; अस्तु इनके सांकेतिक प्रदर्शन के लिए तोप छोड़ा जाता है। इसी प्रकार श्रीराम द्वारा अहिल्या उद्धार के प्रसंग में तथा रावण की अन्त्येष्टि में आग के गोले से बना गुब्बारा आकाश में यह दर्शाने के लिए छोड़ा जाता है कि ये लोग गोलोकवासी हो गये, लेकिन विद्युत चलित ध्वनि एवं प्रकाश का यहां बिल्कुल प्रयोग नहीं होता। सब कुछ स्वाभाविक रूप से दिखाने का प्रयास किया जाता है।

रामलीला की साज-सज्जा साधारण है। यहां प्रयोग में आने वाले अधिकांश उपकरण वर्षों पुराने हैं और हर बार उनका रंग-रोगन द्वारा मरम्मत करके उपयोग में लाया जाता है। यथा-अयोध्या में लगने वाले खम्भे, सिंहासन, वशिष्ठ का निवास, जनकपुर में बना सिंहासन, अशोक वाटिका स्थल, श्री राम बारात, भरत मिलाप और अन्य अवसर पर काम आने वाले रथ, पुष्पक विमान आदि रामलीला संग्रहालय में रखे रहते हैं और प्रतिवर्ष रामलीला से दो माह पूर्व इनकी मरम्मत तथा रंग रोगन प्रारम्भ हो जाता है और आवश्यकतानुसार इनको रख दिया जाता है। शेषनाग, ताड़का, खरदूषण, मेघनाद, कुम्भकर्ण, अक्षय कुमार, सुरसा तथा रावण इत्यादि के पुतले बनाने का काम भी एक महीने पहले से ही ठेके पर करवाया जाता है।

पात्रों को भी उनकी भूमिकानुसार वस्त्राभूषण, मुखौटे, शस्त्र, रामलीला शुरू होने से पूर्व दे दिये जाते हैं। जैसे हनुमान को लाल वस्त्र और तलवार, रावण को मुखौटा तथा तलवार आदि। रामलीला समाप्ति पर ये सभी साजो-सामान वापस ले लिए जाते हैं। पात्रों की वेशभूषा में विशेषतः मखमली चोला, रेशमी पीताम्बर, कमर पटुका, उत्तरीय, मुकुट, हार, बाजूबंद प्रयोग करते हैं। सीता को बनारसी साड़ी पहनाते हैं। श्रीराम की सेना के वीर पगड़ी, दुपट्टा, मिर्जई, पैजामा, काछनी, फेटा इत्यादि धारण करते हैं। हनुमान जी लाल, अंगद और सुग्रीव पीला, नल-नील नीला, जामवंत काला तथा विभीषण लाल झालरदार वस्त्र पहनते हैं। राक्षसों की पोशाक काली होती है।

रामनगर की रामलीला में पात्रों के मुखौटे विशेष उल्लेखनीय हैं। मुखौटे कपड़े, पीतल और कागज की लुगदी के बने होते हैं। कुछ मुखौटे बहुत ही भव्य होते हैं मुख्य रूप से रावण का कपड़े के जरी के काम वाला और हनुमान का भारी-भरकम मुखौटा। अंगद, सुग्रीव जामवन्त का मुखौटा पीतल का होता है। राक्षसों के मुखौटे कपड़े के होते हैं।

पात्र साज-सज्जा- भगवान शंकर और नारद को छोड़ कोई भी पात्र ‘मेकअप’ का प्रयोग नहीं करता हालांकि राजा दशरथ, सुमन्त, जनक आदि अपने माथे पर चन्दन का लेप लगाते हैं। इन पात्रों को अपना ‘मेकअप’ स्वयं करना होता है। सभी पात्र अपने घरों से ही रामलीला के पात्र वाली वेशभूषा में ही रामलीला स्थल पर आते हैं।

पंचस्वरूपों की साज-सज्जा- पंचस्वरूपों का श्रृंगार लीला के प्रारम्भ काल में रामरज या गेरु से होता था, बाद में काशी के राजाराम सिंगारिया द्वारा वर्तमान श्रृंगार होने लगा। मुख्य स्वरूपों को सजाने में लगभग 4 घण्टे का समय रोजाना लगता है। मुख्य स्वरूपों को सजाने का काम भी व्यास करते हैं। बलुआ घाट धर्मशाला में पांचों पात्रों की रूप-सज्जा की जाती है। इनके हाथ, पैर एवं चेहरों पर चमक पैदा करने के लिए विभिन्न रंगों से सजी मुर्दाशंख लगायी जाती है। इसके बाद दृश्य के अनुसार धनुष-बाण, तरकस, आभूषण, माला, मुकुट आदि से सजाया जाता है, जिससे स्वरूपों का सौन्दर्य प्रभावी हो सके।

स्वरूपों के लिए प्रसंगानुसार रहने और आने-जाने के लिए अलग-अलग स्थान हैं। यथा रामलीला जब अयोध्या और जनकपुर तक रहती है तो स्वरूप एक पालकीनुमा बग्गी और साधु-संतों के कंधे पर आते जाते हैं और बलुआघाट धर्मशाला में निवास करते हैं। वनगमन के बाद ये क्रमशः रामबाग और लंका स्थित महाराज के बगीचे में निवास करते हैं और साधुओं के कंधे पर आते-जाते हैं।

संवाद- श्री रामलीला की संवाद शैली अत्यन्त ही भावपूर्ण है, जहाँ लय एवं ताल का विशेष ध्यान रखा जाता है। भाव एवं प्रसंग के अनुसार संवाद अदायगी में विराम, अल्प विराम, गति तथा उतार-चढ़ाव का यथोचित ध्यान रखा जाता है। अभिनय कर रहे पात्रों को इस बात का प्रशिक्षण दिया जाता है कि संवाद अदा करते समय उनकी आवाज यथासामथ्र्य ऊँची तथा लयबद्ध होनी चाहिए ताकि समुपस्थित श्रोतागण आसानीपूर्वक अनुश्रवण कर सकें। पीढ़ियों से परम्परा के रूप में एक ही पात्र का अभिनय कर रहे परिवार के स्थानापन्न पात्र को ये संवाद अनायास ही याद हो जाते हैं। साथ ही श्रद्धापूर्वक श्रीरामलीला का अनुश्रवण करने वाले तमाम नेमीजनों को अधिकांश संवाद अक्षरशः स्मरण है।

रामलीला के संवादों की भाषा रामायण की मध्य शैली या अवधी है जिसका शोधन काष्ठजिह्वा स्वामी ने किया था। काष्ठजिह्वा स्वामी विद्वान और सन्त थे वे देवतीर्थ और देवस्वामी के नाम से भी जाने जाते थे। वाक् साधना के लिए इन्होने अपनी जीभ को लकड़ी से वेधित कर रखा था इसलिए इनका नाम काष्ठजिह्वा स्वामी पड़ गया। वे तत्कालीन महाराज ईश्वरी नारायण सिंह के गुरु थे। श्रीरामचरितमानस पर इन्होंने ‘श्री मानस परिचर्चा’ नामक टीका टिप्पणी भी लिखी थी। काष्ठजिह्वा स्वामी की रचनाओं को प्रभु नारायण सिंह जी महाराज ने 1903 ई0 में लिखवाया था। इस रामलीला में जो संवाद प्रयोग किये जाते हैं वह काष्ठजिह्वा स्वामी द्वारा रचित और शोधित हैं। हाँलाकि संवादो में कहीं-कहीं भाषा की क्लिष्टता इसे समझने में सुगमता नहीं देती, इसके बावजूद सामान्य तौर पर अवधी की सरल भाषा में लिखे गये संवाद लोगों को आकर्षित करते हैं।

        पहले जनकपुर की लीलाओं का संवाद जनकपुर वासियों द्वारा मैथिली भाषा में किया जाता था लेकिन बाद में महाराजा प्रभु नारायण सिंह की इच्छा या आज्ञानुसार अवधी में कर दिया गया। संवाद का एक दृष्टान्त यहाँ प्रस्तुत है- श्रीराम उपवन विहार के लीला में श्रीराम से भरत जी कहते हैं-

‘‘हे नाथ मैं दास ठहरा, कृपा औ आनन्द के समूह सुनिए निःसन्देह केवल आपही देख पाते मोको स्वप्न में भी कोप और मोह नहीं है,  तथापि  हे कृपानिधि आपसे ढिठाई करता हौं काहे कि मैं सेवक हौं औ आप सेवकों को सुख देने वाले हैं वह यह कि सन्तों की महिमा बहुत रीति से वेद और पुराण ने भी कहा है औ श्रीमुख से आपने भी बड़ाई किया है औ तेहिके ऊपर प्रभु की प्रीति भी बहुत रहती है सो हे गुणग्राहक -ज्ञानसमूह  और कृपासमुद्र मैं उनका लक्षण सुनना चाहता हौं, इसलिए हे प्रनतपाल! असन्त-सन्तके भेद को बिलगाय के कहा जाय।’’

        रामलीला में गाये जाने वाले कवित्त और क्षेपक रामलीला को एक अद्भुत भाव प्रदान करते हैं। उदाहरण स्वरूप केवट द्वारा श्रीराम को गंगा पार कराने के प्रसंग में गाये जाने वाला कवित्त प्रस्तुत है-

कवित्त-

‘‘तुम तो तरनि कुल पालन करनहार,

हमहूँ तरनि ही के पार करैया हैं।।

भीम भवसागर के सुघर खेवैय्या आप,

हमहूँ सदैव देवसरि के खेवैया हैं।।

कौतुकी कुपंथिनिको पार करवैय्या नाथ,

हौं तौ जग पावनिको पार करवैय्या हैं।।

हम तुम भैया एक कर्मके करैय्या राम,

केवट सो केवट न लेत उतरैय्या हैं।।’’

क्षेपक-

        ‘‘इमि सुविचारत मुनिमन माँही।

        श्री रघुबर वर तिन्हके पाही।।

        हाथ जोरि करि ऐसे बानी। कहत भये मधुराई ज्ञानी।।

        पितु आज्ञा सों पितु बचन गौरव सो तब बैन।

        कौशिक करिबो है उचित, करिहै शंकर मैन।।’’

        इसी प्रकार श्रीराम और लक्ष्मण के रूप की प्रशंसा में घनाक्षरी द्वारा बोला गया पद लीला प्रेमियों को मुग्ध करता है-

‘‘जैसी ए ललित लड़ैती मिथिलेश जू की,

        तैसही अवधेशको दुलारो रस मीना हैं।।

        याहि देखि लाजति रति होत है विकल मति,

        याही ते विलोकत पंच बान अधीना है।।

        जबसे मुरारी यों विदेहपुर नारी कहै,

        यह तो संयोग का विधि लिख दीना हैं।।

        टूटै न टूटै धनुष बाल सखी साँची कहौ,

        सिया सोनेकी अँगूठी राम साँवरों नगीना हैं।।’’

रामनगर रामलीला का नेपथ्य

रामनगर की रामलीला मात्र रामलीला न होकर एक महाआयोजन है और किसी भी आयोजन में अलग-अलग लोगों की महत्वपूर्ण भूमिकाएं होती हैं। रामनगर की रामलीला में भी व्यास, पात्र के अलावा कुछ ऐसे भी लोग हैं जो रामलीला की परम्परा और भव्यता को बनाये हुए हैं। रामलीला की विश्व प्रसिद्धि के पीछे एक बड़ा कारण है 200 से भी अधिक वर्षों से रामलीला को यथावत बरकरार रखना। मशाल की रोशनी में रामायण पाठ, पंचलाइट की रोशनी में लीला, आरती के समय लाल और सफेद महताबी में प्रभु का दर्शन करने का आनन्द लीला प्र्रेमियों को सहज ही आकर्षित करता है। इन सभी भूमिकाओं का निर्वहन भी परम्परागत रूप से चला आ रहा है और वंशानुगत रूप से इस कार्य को किया जा रहा है। रामलीला में एक तरह से नेपथ्य में भूमिका निभाने वालों में मुख्य रूप से हैं मशालची, महताबी और पुतला बनाने वाले, तोपची और पालकी ढोने वाले। रामलीला के सम्बन्ध में लिखते समय इनका उल्लेख न करना उसी प्रकार है जैसे बिना महताबी के आरती देखना। प्रस्तुत है रामलीला से जुड़े इन महत्वपूर्ण पक्षों का

संक्षिप्त परिचय

मशाल एवं मशालची- रामनगर की रामलीला में मशाल की रोशनी में ही रामलीला सम्पन्न करायी जाती है। निश्चित रूप से रामनगर की रामलीला जब शुरू हुई होगी तो उस समय आज की तरह विद्युत व्यवस्था नहीं रही होगी और मशाल से ही लीला सम्पन्न होती रही होगी। आज भी वही परम्परा विद्यमान है। यह भी रामनगर की रामलीला को विश्व प्रसिद्ध बनने में एक बड़ा कारण है। रामलीला के दौरान कुल चार मशालों का प्रयोग होता है। जिनमें 2 मशाल रामायणी दल के लिए तथा दो मशाल पात्रों के पास जलते रहते हैं। मशाल जलाने व बनाने के लिए मशालची का काम रामनगर के ही राधेश्याम प्रजापति द्वारा किया जा रहा है। इस सम्बन्ध में पूछे जाने पर राधेश्याम प्रजापति ने बताया, ‘‘जब से रामलीला का प्रारम्भ हुआ है तब से यह कार्य हमारे परिवार द्वारा किया जा रहा है। वर्तमान में राधेश्याम प्रजापति (स्वयं), श्याम सुन्दर प्रजापति (भाई), रवि प्रकाश प्रजापति (पुत्र) तथा सुनील प्रजापति इस कार्य को कर रहे हैं।’’ वंशानुक्रम के सम्बन्ध में राधेश्याम प्रजापति ने बताया कि इनके पूर्व यह कार्य उनके पिता स्व0 बिहारी लाल प्रजापति, उनसे पूर्व दादा केदार प्रजापति तथा उनके पूर्व नजदू प्रजापति द्वारा किया जाता रहा है। मशालची की वेशभूषा पर उन्होंने बताया कि इनके लिए साफा अनिवार्य है।  यह मशाल इस परिवार को रामलीला से पूर्व दिया जाता है। शेष  समय रामनगर किले में सुरक्षित रहता है। मशाल बनाने व सामग्री के सम्बन्ध में राधेश्याम प्रजापति ने बताया कि मशाल पीतल का होता है जिसके ऊपरी सिरे को पुराने सूती कपड़े व बीच में बांस की पतली फरहटी लगाकर तैयार करते है जिसे तिसी के तेल द्वारा जलाया जाता है।

पारिश्रमिक  और वर्तमान समय में रोजगार की दौड़ भरी जिन्दगी के सम्बन्ध में पूछने पर इनका कहना था कि रामजी की सेवा में जो मिल जाता है वह  बहुत है। यह प्रभु का कार्य है और यह परम्परा हमारा परिवार निभा रहा है यही हमारा सौभाग्य है।

महताबी एवं पुतला- रामनगर की रामलीला का मुख्य आकर्षण है वहां प्रतिदिन होने वाली आरती। आरती के समय लाल और सफेद महताबी की जगमग करते ही समूचा जनसमूह ‘‘बोल दे राजा रामचन्द्र जी की जय’’ और ‘‘हर-हर महादेव’’ के उद्घोष से गूंज उठता है। कई लीला प्रेमी जो दूरी की वजह से दर्शन नहीं कर पाते या आरती के समय आगे नहीं पहुंच पाते वह महताबी के रोशनी से ही श्रीराम के दर्शन को सफल मान लेते हैं।

रामनगर की रामलीला में पुतलों का भी मुख्य आकर्षण है, जिनमें रावण, मेघनाद, कुम्भकरण, सुरसा, ताड़का, खरदूषण और शेषनाग के पुतले प्रमुख हैं। इनके अलावा हंस, गाय, चूहा, जटायू के पुतले भी बनते हैं। रामलीला के महताबी एवं पुतलों से सम्बन्धित कामों को भी परम्परागत ढंग से वर्तमान दौर में भी निभाया जा रहा है। इस कार्य को मौजूदा समय में राजू खान द्वारा किया जा रहा है। परिवार से ही जुड़े सदस्य मोहम्मद सिराज ने इस कार्य के सम्बन्ध में बताया कि लगभग रामलीला के प्रारम्भ से ही उनके खानदान द्वारा महताबी, पटाखा और पुतले का काम किया जा रहा है। राजू खान के पहले यह ठेका हाजी अली हुसैन को मिला था। राजू खान के सहयोगियों में इस समय जमील खान, फिरोज खान, आबादी खान, हलीम खान, मुन्ना खान, शेरू खान, सैफुद्दीन खान, लालू खान, गोलू खान, बच्चा खान, शकील खान, कालिया प्रमुख हैं। मुहम्मद शिराज ने बताया कि रामलीला में आरती के समय प्रतिदिन छोड़े जाने वाले लाल एवं सफेद महताबी का निर्माण इनके द्वारा होता है। इसके अलावा रामबाण (तीर के रूप में छोड़े जाने वाले पटाखे) विजयादशमी के दिन छूटने वाले पटाखे बनते हैं। इसके अलावा रामलीला के सभी पुतले, आत्मा के रूप में छोड़े जाने वाले ‘पैराशूट’ इत्यादि बनते हैं।

पुतला निर्माण- शिराज ने बताया कि इन पुतलों के निर्माण में बांस, कागज, तांत (बगरदंत) लेई इत्यादि का प्रयोग होता है। जिसमें 2 कंुतल कागज, 300 बांस, 2.5 बोरा मैदा खर्च हो जाता है। इसके निर्माण में पहले ढरकार बांस को छीलकर सांचा तैयार करते हैं। जिन्हें तांत की सहायता से बांधकर कागज चिपकाकर और रंगकर पुतलों को तैयार किया जाता है। पारिश्रमिक और फायदे के सम्बन्ध में पूछने पर बताया कि इस कार्य में नफा तो नहीं होता लेकिन यह परम्परागत रूप से चला आ रहा है और इसे आगे भी निभाते रहना है। वर्तमान में आरती के समय महताबी जलाने के लिए जमील खान प्रतिदिन लीला में रहते हैं।

रामनगर की रामलीला में मुस्लिम परिवारों द्वारा भी सहभागिता की जाती है जो कि साम्प्रदायिक सौहाद्र्र का बेहतरीन मिसाल है। पुतला, महताबी, पटाखा के कार्यों को मुस्लिम परिवार द्वारा किया जाता है। इसके अलावा एक दिन रामलीला में मुस्लिम युवकों द्वारा लंका मैदान पर रणभूमि में शस्त्र प्रदर्शन भी किया जाता है। जिसमें बाना पाटा, तलवारबाजी एवं लठबाजी का प्रदर्शन होता है। यह परम्परा गोलाघाट स्थित उन मुस्लिम परिवारों द्वारा निभायी जाती है जो मुहर्रम के दौरान महाराज का ताजिया बिठाते हैं।

तोप एवं तोपची- काशी में होने वाली रामलीलाओं में एकमात्र रामनगर की रामलीला है जहाँ कई लीलाओं के समय तोप से सलामी दी जाती है। जहां लीला में पात्र अपनी भूमिका को जीते है वहीं पाश्र्व रूप में कई लोग अपने दायित्व के निर्वहन को लेकर प्रतिबद्ध रहते हैं। तोपची का कार्य करने वाले जंग बहादुर सिंह बताते हैं कि वह लगभग 36 वर्ष से यह कार्य कर रहे हैं। इनके पूर्व उनके पिता केदार सिंह और दादा महादेव सिंह भी यह कार्य करते थे। धनुष यज्ञ, नक्कटैया व लक्ष्मण शक्ति लीला में तोप छोड़ा जाता है। पहले दशहरा पर भी 21 तोपों की सलामी होती थी। लेकिन एक दुर्घटना हो जाने के बाद यह बन्द हो गया। तोप छोड़ने के लिये दो तोपों में बारूद भरकर तैयार किया जाता है लेकिन केवल एक को छोड़ा जाता है। बारूद काशीराज दुर्ग की ओर से उपलब्ध कराया जाता है।

जंगबहादुर ने बताया कि विजय कुमार बघेल, छैबर कुमार सिंह, जितेन्द्र सिंह, मनराज बघेल उनके सहयोगी के रूप में कार्य करते हैं। तोप छोड़ने का समय भी सटीक होता है। सहयोगी द्वारा ऊँचे स्थान से ध्वज दिखाये जाने पर ही तोप के बारूद में आग लगायी जाती है। उन्होंने कहा कि जब बारूद को भरते है तो बहुत डर लगता है इस कार्य के लिये कितना पारिश्रमिक मिलना चाहिये यह बताया नहीं जा सकता। यह अमूल्य है। बस परम्परा को निभाया जा रहा है।

तोप से सम्बन्धित कार्य करने वाले सभी लोग काशीराज दुर्ग के स्थायी कर्मचारी होते हैं। तोप छोड़ने के अतिरिक्त वे दुर्ग में चैकीदारी का कार्य भी करते हैं।

पालकी- रामनगर की रामलीला के दौरान पात्रों को एक स्थान से दूसरे स्थान या लीला स्थल तक लाने के लिये पालकी का प्रयोग किया जाता है। पालकी से लाने वाले मजदूरों में से एक हैं पंचवटी के सुख्खू। 31 वर्षीय सुख्खु बताते हैं कि उनका पूरा परिवार (लगभग 20 लोग) पूरी रामलीला के दौरान पालकी उठाते हैं। यह तीसरी पीढ़ी है। उनके पिता (केरा, 63 वर्ष) व दादा भी यह कार्य करते थे। इस दौरान उनको पोशाकें काशी राज दुर्ग की तरफ से उपलब्ध करायी जाती हैं। पालकी सरायनाका के रहमान से किराये पर लिया जाता है। मेहनताना के प्रश्न पर उन्होंने बताया कि प्रभु का कार्य है, सेवा भाव से करते हैं, जो भी पारिश्रमिक मिले उसे स्वीकार करते हैं।

नाव- रामनगर की रामलीला में भगवान राम को गंगाजी, यमुनाजी पार कराने व भगवान विष्णुु के क्षीरसागर की आरती के समय नाव की आवश्यकता होती है। इस नाव की सेवा को पिछले 10 वर्षों से बबलू साहनी करते हैं। आपके साथी के रूप में आपके बड़े भाई सोपाल साहनी और सुख्खु साहनी आप का साथ देते हैं। आप रामलीला के प्रथम दिन से पहले ही अपना नाव रामबाग पोखरा पर ला देते हैं, जिसे शेषनाग के रूप में सजाया जाता है और पहले दिन की आरती इसी नाव पर होती है। इसके बाद राम वन गमन के समय एक नाव गंगा जी में जो प्रतीक रूप में सगरा पोखरा पर होता है और दूसरी यमुना जी में (रामबाग के पीछे) होती है। इसके बाद यह भरत जी के आगमन पर भी इसी प्रकार की सेवा करते हैं। मेहनताना के प्रश्न पर कहते हैं कि ‘‘जो भी कुछ आज हमारे पास है वह सब राम जी की सेवा का ही फल है।’’

नृत्य कलाकार

रामलीला में रामजन्मोत्सव व राम जी की विवाह पर नृत्य करने के लिए ग्राम सुल्तानपुर की मुन्नी देवी को बुलाया जाता है। इनके पति का नाम विजय कुमार है। ये रामलीला में ढोलक बजाते हैं। रामलीला में मुन्नी देवी ही एक ऐसी महिला हैं जो कार्य करती हैं, नहीं तो बाकी सारे कार्य पुरुष वर्ग ही करते हैं। इन लोगों के साथ हारमोनियम संगत राधेश्याम करते हैं। ये आकाशवाणी में अंशकालिक रूप में काम करते हैं। मुन्नी देवी को रामलीला में काम करते हुए लगभग 25 साल हो गए हैं। इनके पहले उर्मिलाबाई जो कि रामनगर रामपुर में स्वामी जी की कुटिया के पास की रहने वाली थीं, कार्य करती थीं।

रामलीला में मुन्नी देवी की विशेष श्रद्धा है। उनका कहना है कि भगवान के जन्म के समय एवं उनके शादी के समय मुझे नृत्य करने का सौभाग्य प्राप्त होता है, इससे बढ़कर मेरे लिए और क्या हो सकता है।

दैनिक आरती हेतु पुष्प व गजरा – (श्री नारायण झा)

रामनगर की रामलीला में प्रतिदिन की आरती में प्रयोग होने वाले माला (गजरा) को उपलब्ध कराने का दायित्व श्री नारायण झा वर्षों से निभाते आ रहे हैं । आप बाला त्रिपुर सुन्दरी मन्दिर, रतनबाग के पुजारी हैं । नेपथ्य में वर्षों से अपनी भूमिका निभाने वाले झा जी बताते हैं कि ‘‘रामलीला से हमारे परिवार का जुड़ाव परम्परागत् रुप से है। महाराज श्री विभूतिनारायण सिंह जी  के समय पिता स्व0 श्री चक्रधर झा एक वर्ष के लिए हनुमान की भूमिका भी निभाए थे। पिताजी कभी वस्त्र नही पहनते थे, जिसके कारण हनुमान की भूमिका को छोड़ना पड़ा। रामलीला के पंच स्वरुपों के माला बनाने का कार्य पिछले 25 वर्षों से मेरे द्वारा ही किया जा रहा है। पूर्व में वाराणसी के केदार मारवाड़ी पंच स्वरुपों को माला देते थे।’’

श्री नारायण झा दैनिक आरती में प्रयोग होने वाले मालाओं के निर्माण व तैयारी के सन्दर्भ में आगे बताते हैं कि – ‘‘रामनगर की रामलीला में पंच स्वरुपों के कुल मालाओं की संख्या 108 या 111 तक हो जाती है। तिथि में परिवर्तन के कारण यह विभेद आता है। यह माला चांदनी या टेंगरी के फूल द्वारा बनाया जाता है। एक माला बनाने में मुझे दो घण्टे लगते हैं और किसी अन्य सदस्य को तीन से चार घण्टे का समय लगता है। करीब डेढ़ लाख से अधिक फूलों द्वारा एक माला तैयार होता है। मालों में सफेद रंग के फूलों एवं तुलसी के पत्तों का प्रयोग होता है। सिर्फ भोर की आरती में राम और सीता जी की मालाओं में हल्का बदलाव किया जाता है, जिसकी वजह से वो हल्के गुलाबी रंग के दिखायी पड़ते हैं। दोनों स्वरुपों के मालाओं में लाल रंग के फूलों का प्रयोग किया जाता है। साथ ही भोर की आरती में फूलों से बने जो कुण्डल पहनाए जाते हैं वह भी मेरे द्वारा ही तैयार किया जाता है।’’

काशी नरेश के यहां हम दस पीढ़ी से हैं। पूर्व में हम माला नही बनाते थे। महाराज विभूति नारायण सिंह जी के कहने पर और श्रीराम कार्य होने की वजह से इस कार्य को स्वीकार किया  और यथाशक्ति इसका निर्वहन करते रहेंगे।’’

रमेश पाठक- रामलीला के दौरान पंचस्वरूपों को लगभग 3 माह तक बलुआ घाट स्थित धर्मशाला में प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रारम्भ में इन स्वरूपों के प्रशिक्षण के दौरान शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में आने वाले व्यवधान पर ध्यान नहीं दिया जाता था, परन्तु आधुनिक शैक्षणिक परिवेश में ज्यादातर स्वरूप आधुनिक शिक्षा माध्यम से शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। स्वरूप बने बालकों के अभिभावकों द्वारा बालकों के पढ़ाई छूटने और व्यवधान के सम्बन्ध में आपत्ति करने पर किले की तरफ से इन स्वरूपों के लिए एक शिक्षक की व्यवस्था की जाती है। जिसे पिछले 10 वर्षों से रामपुर, रामनगर निवासी श्री रमेश पाठक निभा रहे हैं। इस सम्बन्ध में बताते हैं कि-‘‘स्वरुपों को पढ़ाने में बहुत ही गर्व का अनुभव होता है। उस समय भी मैं इनको स्वरूपों के रूप में देखता हूं और इनका गुरु बनने का अवसर मेरे लिए सौभाग्य की बात है। नेमी के रूप मैं 1986 से लगातार रामलीला का दर्शन कर रहा हूं।’’

दयाशंकर प्रजापति- रामनगर की रामलीला में तरह-तरह के रंगे हुए पुतले, मुखौटे रामलीला में प्रयुक्त साजो-सामान जिन पर विशेष प्रकार की कलाकारी व रंगाई हुई रहती है, जो आकर्षण का केन्द्र रहते हैं; इनकी रंगाई एवं कलाकारी के पीछे एक बहुत ही सहज व्यक्तित्व है जो पिछले 40 वर्षों से इस कार्य को कर रहे हैं। 55 साल के दयाशंकर प्रजापति उर्फ ‘सपाटू’ बताते हैं कि-‘‘प्रभु श्रीराम का यह कार्य करने में मुझे सुखद अनुभूति एवं आत्मिक संतोष प्राप्त होता है। श्री रामजी की कृपा से ही मेरा काम धंधा चल रहा है। पारिश्रमिक के नाम पर जो कुछ भी मिलता है सब रामजी का प्रसाद है।’’

रामअधार यादव- सीहाबीर रामनगर के रहने वाले रामअधार यादव पिछले 14 वर्षों से स्वरुपों को ले जाने वाले रथ के वाहक हैं। अपने इस कार्य के बारे में बताते हुए इन्होंने कहा कि- ‘‘पहले 3 वर्ष रामायणी दल के रथ, 3 वर्ष जानकी जी के रथ और पिछले 8 वर्ष से मैं श्री रामजी के रथ को चला रहा हूं। प्रभु श्रीराम के इस कार्य को करने को अपना परम सौभाग्य मानते हुए इसे अपना सबसे बड़ा मेहनताना बताते हैं।

शत्रुघ्न सिंह – यहां रामलीला के उस पक्ष की भी चर्चा करना जरूरी है जिसका संबंध प्रत्यक्ष रूप से तो नहीं लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से जरुर है। रामलीला के दौरान लीलास्थल पर होने वाली साफ-सफाई, रंग-रोगन और मौलिकता प्रदान करना अपने आप में बड़ा कार्य और दायित्व होता है। इस दायित्व को निःस्वार्थ भाव से पूरा करते हैं शत्रुघ्न सिंह। रामभक्ति से ओतप्रोत शत्रुघ्न का मानना है कि लीलास्थल की साफ-सफाई या रंग-रोगन व्यवस्था कोई काम नहीं है बल्कि भगवान राम की सेवा है। कहते हैं कि- ‘‘इस काम को करने में मुझे पारिश्रमिक के रूप में रामभक्ति का प्रसाद मिलता है। शत्रुघ्न के इस सेवाकार्य में चंद्रशेखर शर्मा ‘पप्पू’ पिछले दस वर्षों से सहयोग कर रहे हैं।’’

पंचलाइट– पंचवटी निवासी संजय रामलीला के दौरान लीला स्थल को प्रकाशित करने का काम करते हैं।  प्रतिदिन लगभग पचासों पंचलाइट की प्रकृति से निकटस्थ लगने वाली रोशनी से लीला मंचन न सिर्फ सुलभ होता है अपितु भक्तजनों को भी लीला के दौरान भ्रमण करने में सहायता मिलती है। एक माह की इस वृहद रामलीला के कई प्रसंगों में एक दिन में कई स्थानों पर लीला मंचित होती है, ऐसे में उस दिन सभी स्थानों पर एक साथ कई पंचलाइट एक ही समय में लीला स्थल को दैदीप्यमान करती हैं। इसे प्रबंधन की कुशलता ही कहेंगे कि अपने दो सौ साल पुराने प्राचीनतम स्वरूप को अपरिवर्तित रखते हुये रामनगर की यह रामलीला मंचित हो रही है, जिसे पंचलाइट के प्रयोग ने अक्षुण्ण रखा है, ऐसा कहना अतिशयोक्ति नहीं।